सुविचार – दुख – दुःख – 137

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साइकोलॉजी के अनुसार : आपको दुःख तभी होता है, जब आप किसी व्यक्ति या किसी बात को अपने मन में महत्व देते हैं,

_ अगर आप उस व्यक्ति या उस बात को महत्व देना बंद कर दें, तो दुख भी अपने आप कम हो जाएगा !
_ जब भी आप को दुखी होने का ख्याल आए, ख़ुद से कहें कि इस व्यक्ति या इस बात को महत्व देने से कोई फायदा नहीं है.
_ यही एक मानसिक तरकीब है, जिससे आप चैन से जी सकते हैं,
_ वरना, आप ज़िन्दगी भर किसी न किसी बात को लेकर दुखी होते रहेंगे..!!
खुशियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हमेशा कभी पूरी नहीं होती और गाहे-बगाहे कम पड़ जाती हैं,

_ जबकि हमारे दुख अपने आपमें – भले एक या बहुत छोटे हो – संपूर्ण होते हैं और इतने भरपूर होते हैं कि वे एक जीवन क्या, समूची कायनात को हिलाकर रख सकते हैं,
_ इसलिए खुशियों को तवज्जों मत दीजिए, दुखों से मनमिली दोस्ती कीजिए, प्यार कीजिए – जीवन खुद-ब-खुद गुलज़ार रहेगा.!!
– Sandip Naik
हम दुखी इसलिए नहीं होते कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, बल्कि इसलिए दुखी होते हैं, क्योंकि हमने जीवन से पहले ही बहुत सारी उम्मीदें और कल्पनाएँ जोड़ ली होती हैं.

_ जब जो होता है, वो हमारी बनाई हुई उस तस्वीर से मेल नहीं खाता,
तो मन उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है.
_ और यही इनकार, यही विरोध — असल में दर्द बन जाता है.
_ वही बारिश एक किसान के लिए आशीर्वाद है, क्योंकि उसकी अपेक्षा ठीक वही थी.
_ लेकिन उसी बारिश से शादी वाले घर में लोग परेशान हो जाते हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षा कुछ और थी.
_ घटना तो एक ही है — दुख कहीं बाहर नहीं, बल्कि टूटी हुई अपेक्षा के अंदर पैदा होता है.
– राहुल आर्यन
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी. यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_ सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है.
– Manika Mohini
मैंने अपने और अपने आसपास के बहुत से लोगों के दुखों का अध्ययन किया तो निष्कर्ष यह आया कि व्यक्ति के मानसिक दुख अधिकतर उसकी दुर्बुद्धि के कारण होते हैं और शारीरिक दुख प्रकृति-प्रदत्त.
– Manika Mohini
दुख-मुसीबत, बीमारी-शिमारी, ये सब जीवन के साथ लगे रहते हैं.

_ सबसे बड़ी बदनसीबी यह है कि दुख में आप किसी को पुकारें और कोई ‘हाँ’ कहने वाला न हो.!!
– Manika Mohini
कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका होना इंसान को बहुत कचोटता रहता है.

_ व्यक्ति स्वयं को अकेला, सबसे दूर और हाशिए पर खड़ा महसूस करता है.
_ हताशा के इन कठिन क्षणों में बस यह ध्यान रखना चाहिए कि दुःख का कोई भी दौर हमेशा नहीं रहता.!!
– Nirarthak Nirarthak
पहले दुःख भाँप लिया जाता था. अब दुःख मापा जाता है.
_ उसका दुःख कम मेरा दुःख ज़्यादा.
_ इस आधार पर लोगों ने दुःख सुनना और अपनी संवेदनाएँ देना तय कर लिया है.
_ सच कहूँ तो सुन कोई नहीं रहा होता है और झूठी संवेदनाएँ सबके पास है.
_ असल में दुःख बाँटने की अवधारणा इतनी खोखली है ये कोई जानना ही नहीं चाहता है.

_ अनसुने किए गये दुःख, और झूठी संवेदनाओं के इस दौर से ही दुःख का कारोबार अच्छा चल नहीं रहा.
_ दुःख बेच तो सब रहे हैं, पर दुःख इस बात का भी है कि ख़रीदार यहाँ कोई नहीं.
_ खुश दिखने वाले चेहरों का मोल है यहाँ बेशक़ीमती है.
_ दुःख से भरे चेहरों की क़ीमत कबाड़ी की दुकान में पड़े रद्दी से भी कम है.
_ वास्तविकता यही है, मुँह नहीं मोड़िए.
– यूँ हीं
– पथिक मनीष
अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता

_ एक समय था जब मैं हर छोटी-बड़ी बात पर खुद से शिकायत करता था.
– क्यों ऐसा हुआ ?
– मैंने ऐसा फैसला क्यों लिया ?
– मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ ?
– मेरी जिंदगी मेरी उम्मीदों के मुताबिक क्यों नहीं चल रही ?
_ इन सवालों ने मुझे कभी आगे बढ़ने नहीं दिया.
_ मैं हर असफलता का दोष खुद को देता रहा.
_ जो बातें मेरे नियंत्रण में नहीं थीं, उनके लिए भी खुद को कटघरे में खड़ा करता रहा.
_ लेकिन समय ने एक बात सिखाई—हर चीज़ का जवाब हमारे पास नहीं होता.
_ हर हार हमारी गलती नहीं होती और हर जीत सिर्फ हमारी मेहनत का परिणाम नहीं होती.
_ जिंदगी में परिस्थितियाँ, समय और किस्मत भी अपना हिस्सा निभाते हैं.
_ आज मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ, लेकिन उनके लिए खुद को सज़ा नहीं देता.
_ मैं जानता हूँ कि मैं इंसान हूँ, मुझसे गलतियाँ होंगी, फैसले गलत होंगे और कुछ सपने अधूरे भी रह जाएंगे.
_ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं खुद का दुश्मन बन जाऊँ.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता.
_ जो बीत गया, उसे अनुभव मान लेता हूँ.
_ जो नहीं मिला, उसे सीख समझ लेता हूँ.
_ और जो मिल गया, उसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ.
_ पहले मैं आईने में खड़े होकर अपनी कमियाँ खोजता था, अब अपनी कोशिशें देखता हूँ.
_ पहले मैं अपने जख्म गिनता था, अब उनसे मिली सीख को याद रखता हूँ.
_ जिंदगी तब आसान नहीं हुई, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल गया..
_ और जब नजरिया बदलता है, तो शिकायतें धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं.
_ आज भी मुश्किलें हैं, चुनौतियाँ हैं, अधूरे सपने हैं, लेकिन अब मैं खुद से लड़ता नहीं हूँ. _ क्योंकि समझ आ गया है कि दुनिया से लड़ने के लिए सबसे पहले खुद का साथी बनना पड़ता है.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता,
_ क्योंकि मैंने खुद को स्वीकार करना सीख लिया है.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
मन परेशान है, न पढ़ पा रहा हूँ, न लिख पा रहा हूँ.

_ किताबें खुली हैं, लेकिन शब्द आँखों से टकराकर लौट जाते हैं.
_ कलम हाथ में है, लेकिन विचार कागज़ तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो जाते हैं.
_ अजीब बात है… थकान शरीर में नहीं, मन में है और मन की थकान दिखाई भी नहीं देती.
– लोग पूछते हैं – “क्या हुआ ?”
_ लेकिन क्या बताऊँ ?
_ कभी-कभी कोई एक कारण नहीं होता.
_ कुछ अधूरे सपने, कुछ टूटी उम्मीदें, कुछ भविष्य की चिंताएँ और कुछ बीते दिनों की यादें मिलकर मन पर ऐसा बोझ बना देती हैं कि साधारण काम भी पहाड़ जैसे लगने लगते हैं.
_ आज मैं पढ़ नहीं पा रहा, क्योंकि मन हर पन्ने से पहले अपने सवालों पर अटक जाता है.
_ आज मैं लिख नहीं पा रहा, क्योंकि शब्दों से पहले दर्द बाहर आना चाहता है.
_ लेकिन शायद जीवन का हर अध्याय उत्पादक होने के लिए नहीं होता.
_ कुछ अध्याय ऐसे भी होते हैं जहाँ इंसान सिर्फ़ खुद को संभालना सीखता है.
_ जहाँ जीतने से ज़्यादा ज़रूरी होता है टूटकर बिखरने से बच जाना.
– मैं जानता हूँ, यह दौर भी गुजर जाएगा.
_ एक दिन फिर किताबों के शब्द अच्छे लगेंगे, फिर कलम कहानियाँ लिखेगी, फिर सपनों में चमक होगी.
_ अभी बस इतना है कि मन थोड़ा थका हुआ है और थके हुए मन को डाँट नहीं, थोड़ा समय चाहिए.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
कुछ फैसले दुनिया को समझाने के लिए नहीं, खुद को बचाने के लिए लिए जाते हैं

_ कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलना आसान नहीं होता.
_ वहां सुरक्षा होती है, आदतें होती हैं और एक झूठा सुकून भी.
_ लेकिन अगर ज़िंदगी में कुछ कर गुजरने की ज़िद हो, तो वही कंफर्ट ज़ोन सबसे बड़ी कैद बन जाता है.
_ बाहर कदम रखते ही अपनों के ताने मिलते हैं. _ इतना रिस्क क्यों ले रहे हो ?
_ अब इस उम्र में क्या नया कर लोगे ?
_ जो कर रहे हो, उसी में खुश रहो.
_ इन तानों से ज़्यादा डर अपने भीतर पलता है.
_ डर इस बात का कि कहीं उम्मीदें टूट गईं तो ?
_ कहीं मेहनत बेकार चली गई तो ?
_ कहीं मन की राह चुनकर भी मंज़िल न मिली तो ?
_ फिर भी सबसे बड़ा अफ़सोस असफल होने का नहीं होता, बल्कि उस जीवन का होता है जिसमें हम अपने मन का कभी जी ही नहीं पाए.
_ हर इंसान को एक ऐसा स्पेस चाहिए, जहाँ वह बिना जज किए जाने के डर के अपने सपनों को जी सके, अपनी गलतियों से सीख सके और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी लिख सके.
_ शायद मंज़िल मिले, शायद न मिले.
_ लेकिन इतना तय है कि एक दिन आईने में देखकर यह मलाल नहीं होगा कि मैंने कोशिश ही नहीं की.
_ कभी-कभी सबसे बड़ी जीत, दुनिया को हराना नहीं होती.
_ अपने डर, अपने संकोच और दूसरों की उम्मीदों के बोझ से बाहर निकल आना ही असली जीत होती है.
जिंदगी इन दिनों — 🌼
– पथिक मनीष Pathik Manish
एक वक्त के बाद सब ठीक हो जाता है.

_ सब शिकन, दरारे, शिकस्त सब भर जाती हैं,
_ बहुत सारा दुःख एक दिन बहुत कम हो जाता है,
_ पर उस दिन के आने से पहले हमें चाहिए बहुत सारी हिम्मत और बहुत सारा इत्मिनान,
_ एक दिन देखना तुम उठोगे नई सुबह को अपनी कोमल बाहों में भर कर और पाओगे कि सब कुछ ठीक ही तो है.!
– Nirarthak Nirarthak
इंसान अपने ख्यालो से कुछ भी बना सकता है,

_ अपने विचारो से स्वयं को सुखी बना ले या सुख मे रहते हुए भी स्वयं को दुःखी,
_ तो सारा खेल विचारो का है.
_ दुःख मे रहते हुए सुख का अनुभव करना है या सुखो का भोग करते हुए भी दुःख का अनुभव,
_ ये आपको तय करना है, खैर!…
– Nirarthak Nirarthak
मुझे लगता हैं कि जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं…जो यह इतना दुःख दे रहा है..

_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
_ शायद जीवन गलती नहीं कर रहा — बस हमें यह दिखा रहा है कि हम अभी अपने सच्चे स्वरूप से कितने दूर हैं.
_ दुःख वहीँ जन्म लेता है.. जहाँ हम वास्तविकता से टकराते हैं.
_ कभी-कभी यह दुःख-पीड़ा, जीवन का सबसे गहरा आमंत्रण होती है — भीतर झाँकने का, यह देखने का कि “मैं कौन हूँ” जब सब कुछ टूट रहा होता है.
_ हो सकता है, दुःख हमें गलत नहीं, बल्कि सही दिशा की ओर मोड़ रहा हो.!!
दुख ही जगाता है, सुख तो सुलाता है.!!
“जीवन में इतना दुःख नहीं हो सकता..
_ शायद गलती जीवन में नहीं, हमारे जीने के तरीके में है.”
_ जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं.. जो यह इतना दुःख दे रहा है.!
_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली करनी पड़ती है कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.

_ दुख में सब्र करने का यह अचूक नुस्खा है कि यह सोचिए, इससे बड़ा भी दुख हो सकता था.
_ कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली कीजिए कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.
_ दुख सहने की शक्ति मिलेगी.!!
अगर दुख में आप रस लेने लग गए, तब तो आप ने सुख के सब द्वार बन्द कर दिए. _ दुखी रहते- रहते, बहुत दिन तक दुखी रहते- रहते दुख के साथ संग बन गया, संबध बन गए. _ फिर तो अगर कोई आ भी जाए सुख देने, तो भी आप द्वार बन्द कर लेंगे.!!
पेड़ों की तरह हमारे जीवन में भी कई दौर आते हैं..

_ हमारे हिस्से भी पतझड़ आते हैं..
_ कभी हम अनंत दुःख की गहराइयों में डूब जाते हैं, मानसिक अवसाद के घने अंधेरों से घिर जाते हैं, पर समय सदा एक-सा नहीं रहता..
_ जब दौर बदलता है, तो सूखी शाखाओं पर फिर से उम्मीदों की नई कलियाँ फूट पड़ती हैं, और जीवन एक बार फिर हरियाली ओढ़ लेता है.!!
हर व्यक्ति को लगता है कि उसी ने सबसे ज्यादा दुःख झेलें हैं, लेकिन सच तो यह है कि हमसे भी ज्यादा दुःख झेल चुके लोग हिम्मत के साथ लड़ रहे हैं.!!
कभी-कभी जो दरवाज़ा बंद हो होता है, वह हमें दुख से बचाता है.

_ गलत जगह से हटना हार नहीं, अपने सम्मान का चयन है.
_ नियति जब रुख मोड़ती है तो इसलिए कि.. आगे कुछ अधिक उपयुक्त और विशाल आपका इंतज़ार कर रहा है.!!
दुःख के दिनों में जो भी साथ खड़ा रहे, उसका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का, जिनके साथ की हमें कोई उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग हमारी बोझिल होती ज़िंदगी का भार थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और यह एहसास दिलाते हैं कि अभी भी मुस्कुराया जा सकता है.!!
बहुत से लोग अपने दुखों में भी हमारे पास इसलिए आते हैं, ताकि वे अपनी स्थिति की तुलना हमारी स्थिति से करके संतुष्टि महसूस कर सकें.!!
यहाँ सुख किसी को चाहिए ही नहीं.
_ कितना भी सही टाइम चल रहा हो, सब अपना दुख ढूंढ ही लेते हैं.
ये हिसाब नहीं रखना की कितना पाया कितना गवाया..!

_ बस चाहत इतनी हो कि दुख वहाँ से न मिले.. जहाँ अपना सुख लुटाया..!!
जिदंगी जीना ही है तो क्या सुख क्या दुख..
_ और दिहाड़ी लगानी है तो क्या छांव क्या धूप.!!
“दुख की जड़ कमी नहीं…

_ अधूरी उम्मीदें और लगातार औरों से तुलना है.”
एक दिन हम अपने दुःखो के साथ भी सहज हो जाते हैं,
_ फिर किसी भी तरह का नयापन हमें असहज लगने लगता है.!
दुःख-दर्द मुफ़्त में मिल जाते हैं.. – ख़ुशी लाख खर्च करने पर भी नहीं मिलती.!!
किसी ने दूसरों को कितना दुख दिया है,

_इसका एहसास उसे तब होता है.. जब कोई उसे वैसे ही दुःख देता है.
दूसरों को दुखी करके कोई भी व्यक्ति स्थायी सुख नहीं पा सकता..

_ समय हर चीज़ का हिसाब रखता है
कुछ दुःख अपनों के साथ भी सांझे नहीं किये जा सकते.!
_ इन दुखों के साथ ही जीना होता है.!!
कुछ दुख ऐसे होते हैं जो बताने के लिए नहीं होते.
_ बस जी कर भूल जाने के लिए होते हैं.!!
दुख बता कर नहीं आते..

_ वे किसी भी पल बादलो के बीच से झांक लेते हैं.!!
मानसिक रोगी होते हैं वो लोग..- जो किसी के दुख पे खुश होते हैं.!!
और एक दिन “दुःखों के लिए कान तो रहते हैं, ज़बान नहीं रहती.!!”
किसी दुखी इंसान को तर्क देकर नहीं समझाया जा सकता, यहाँ समानुभूति (empathy) ही काम आएगी.. जैसे भूखे को पहले खाना चाहिए ज्ञान नहीं..!!
अपने दुःख-तकलीफ पर तुरंत एक्शन लें, कोई दूसरा नहीं आयेगा.!!
जब आप दूसरों के लिए अच्छे बन जाते हैं, तो अपने लिए भी आप बेहतर बन जाते हैं.
दुख को सहने के बाद मिला सुख दोगुना आनंद देता है.!!
हम उन लोगों को दुख पहुँचाते हैं.. जिन्हें हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं – और यह सही नहीं है.!!
किसी को बहुत नज़दीक से जान लेना कभी-कभी बहुत दुख देता है.!!
टूटना, गिरना, गिरकर फिर से उठना और आगे बढ़ना, यहीं जिंदगी का सफर है..

_ जो सकारात्मक ऊर्जा फैला रहा हो उसके जीवन में भी कष्ट है, दुःख है और पीड़ा भी है, यहीं वास्तविकता है.!!
हर किसी के पास कोई न कोई
झोला होता है, जिसमें सुख-दुःख भरे होते हैं, पर कहे भी तो किससे..
_ कुछ लोग चुपचाप बिन शिकायत ढोते हैं.
कोई हमारा दुःख सुनने में रूचि नहीं रखता,
_ बल्कि वो तो ये तोलने में व्यस्त रहते हैं कि वो हमसे ज्यादा सुखी तो नहीं हैं.!!
दुखी होने का भेद यही है कि आप के पास यह सोचने के लिए अवकाश हो कि आप सुखी हैं या नहीं.!!
इस जीवन कि पाठ्शाला में हमें यही तो सीखना है कि समय के साथ कदम से कदम मिलाकर कैसे चला जाए, वरना हमेशा किसी न किसी बात को लेकर ऎसे ही दुःखी रहेंगे.
जीवन सतत चलता रहता है और उसे चलते रहना भी चाहिए ;

_ सुख -दुःख, प्रसन्नता -पीड़ा आते -जाते रहते हैं..
_ जब जैसी परिस्थितियां होती हैं.. इंसान उस अनुकूल ख़ुद को ढाल लेता है.
_ जीवन का लचीलापन जीवन को सुगम बनाता है और अकड़ जीवन को कठिनाइयों से भर देती है.!!
कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका होना पूरी उम्र भीतर कहीं चुभता रहता है.

_ ऐसे क्षणों में इंसान खुद को भीड़ के बीच भी अकेला, सबसे दूर किसी हाशिए पर खड़ा महसूस करता है.
_ हताशा और निराशा के ये दौर बेहद कठिन होते हैं, लेकिन इन्हीं पलों में खुद को यह याद दिलाते रहना ज़रूरी है कि.. दुःख स्थायी नहीं होता.!!
दुःख मनाने के लिए भी सही समय का इंतजार करना चाहिए, जब जीवन एकांत देने की स्थिति में न हो, तब बेहतर है कि कुछ समय के लिए अपने शौक स्थगित कर दें और अपनी जिम्मेदारियों और व्यस्तताओं का ध्यान रखें.!!
दुःख कभी जिंदगी नहीं खाता, वो बस जिंदगी की रोशनी बुझा देता है.

_ दुःख बाहर से हमारा कुछ नहीं बिगाड़ता, चेहरा वही रहता है, आवाज़ भी वही, लेकिन भीतर जैसे मन की दीवार में रोज़ एक ईंट कम हो रही है.
_ दुःख को सजाकर अच्छा नहीं दिखाया जा सकता, इसे सिर्फ झेला जा सकता है, खामोशी से चुपचाप.!!
दुःख से ज्यादा निजी कुछ भी नहीं होता, ये वो अहसास है जिसे हम लाख बताना चाहें, फिर भी कोई पूरी तरह समझ नहीं पाता..

_ हर इंसान का दुःख उसका अपना होता है कभी यादों से जुड़ा, कभी रिश्तों से, कभी उम्मीदों के टूट जाने से.!!
कभी-कभी अनजाने में ही हम उन लोगों का दिल दुखा देते हैं, जिनके बारे में हमें यह तक एहसास नहीं होता कि हमारी कही हुई बात उन्हें बुरी लग सकती है..
_ हालांकि किसी को ठेस पहुँचाने का इरादा नही होता..
_ बस शब्द अपनी जगह से फिसल जाते हैं और असर वहाँ पड़ जाता है.. जहाँ हमने सोचा भी नहीं होता.!!
समय के साथ दुःख की टीस हल्की पड़ जाती है,

_ मगर वो पल, वो सुख, वो संपूर्णता.. जो कभी हमें मिला था, उसे खो देना…
_ भीतर एक ऐसी खाली जगह बना देता है… जो उम्रभर महसूस होती रहती है.
_ इंसान दर्द तो भूल जाता है, लेकिन वो एहसास और वो यादें हमेशा दिल की गहराइयों में जिंदा रहती हैं.!!
दुःख में जो भी साथ रहे, उनका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का.. जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग आपकी बोझिल ज़िंदगी को थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और फिर लगता है कि अभी भी जिया जा सकता है,
_ और जिनसे उम्मीद थी, पर वे साथ न रहे.. उनका भी शुक्रिया बनता है..
_ उन्होंने आपको उस झूठी उम्मीद से आज़ाद किया.. जो आप उनसे लगा बैठे थे.!!
अक्सर देखा गया है जब इंसान खुश होता है, सब सही चल रहा होता है.. तब अपना दिमाग कहीं नही भटकाता है, अपने तक ही सीमित रहता है.

_ लेकिन जैसे ही दुख आते हैं उसे बहुत दूर तक का दिखने लग जाता है..
_ दिमाग में बहुत सारे विचार आने लगते हैं.
_ इंसान ज़िन्दगी जीना सीखता दुख से ही है, सुख में तो वो बस ज़िन्दगी काटने लग जाता है.!!
दुःख को जानना और दुःख भरी बातें करना दोनों में बड़ा आयामी अंतर है…

_ दुःख को जानना दुखों को समा लेना उनको स्वीकार कर लेना है पर दुःख पे दुःख भरी बातें करते जाना, एक के बाद एक दुःख को खोद खोदकर निकालना, जहां नहीं है वहां दुख को बना देना, अगला दुख, पिछला दुख, न जाने किनका किनका दुःख जिनसे बात करने वाले का सरोकार नहीं यही दिखाता है कि इंसान दुख को आदत बनाकर उससे रस लेता है…
– दुख का रस…
_ यह रस बड़ा गहरा होता है, जिसके मुंह इसका स्वाद लगा वह छोड़ नहीं पाता,
_ ऐसा नहीं की दुख नहीं, जीवन है तो दुख है, पर दुख का रस स्वयं बनाते हैं चाशनी मिलाकर…
_ सामने वाले का रस लेकर सुना जाना सुनाने वाले का हासिल होता है…
_ पर इससे असली दुख नजरअंदाज नहीं होता, वह तो है ही…वहीं है ठीक वहीं..!!

सुविचार – सुख – 136

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आपके जीवन में जो छण व्यतीत हो रहे हैं, उन्हें सादे और मीठे, पवित्र और सुन्दर, श्रेष्ठ और आशापूर्ण, उच्च और दृढ, नम्र और प्रेममय विचारों से भरिए.
सुख की हर कामना में एक दर्द छुपा हुआ है. _यह तो तुम्हें तय करना है कि अपने जीवन के तमाम दुखों से कैसे अपने सुख को पृथक करना है ?

– Sanjaya Shepherd (ज़िंदगी ज़ीरो माइल)
Question : सुखी रहने का मूल मंत्र क्या है ?

Answer :  सुखी जीवन का एक मात्र मूल मंत्र यही है कि आप अपने जीवन की तुलना किसी और के जीवन के साथ बिल्कुल ना करें,
_ क्यूंकि आप सबसे अलग हैं यूनिक हैं.
_ आपको जो भी काम अच्छा लगता हो उसमे अपना ज्यादा से ज्यादा समय व्यतीत करें..
_ आप सदैव ही खुद को प्रसन्न पाएंगे और आपका दिमाग भी शांत रहेगा.
Question : मेरा तो व्यक्तिगत अनुभव यह है कि बुरे काम करने वाले व्यक्ति बहुत सुखी रहते हैं.

_ शानदार जिंदगी जीते हैं और ईमानदारी से, निष्ठा से अपना काम करने वाले रोते, झींकते, खींझते, कुढ़ते रहते हैं, अभावों में अपना जीवन जीते हैं, ऐसा क्यों है ?
Answer : आप जो देख रहे हो, वो आधा सच है – पूरा नहीं.
_ दुनिया में अक्सर ऐसा दिखता है कि.. जो लोग चालाकी, बेईमानी या स्वार्थ से चलते हैं, वे जल्दी पैसा, सुविधा और बाहरी सुख पा लेते हैं.
_ और जो ईमानदारी से चलते हैं, उन्हें संघर्ष, अभाव और धीमी प्रगति मिलती है.
– लेकिन फर्क यहाँ है –
_ उनका सुख ज़्यादातर बाहरी होता है (पैसा, दिखावा, शक्ति)
_ आपका सुख बनने की संभावना भीतरी होती है (शांति, संतोष, गहराई)
_ और ये दोनों चीजें एक जैसी नहीं होतीं.
_ आपका ऐसा क्यों लगता है कि वो सुखी हैं ?
_ क्योंकि हम सिर्फ उनका बाहर देखते हैं, भीतर नहीं.
_ उनके भीतर का डर, असुरक्षा, बेचैनी, लालच – वो दिखता नहीं.
_ और जो ईमानदार है, वो क्यों परेशान दिखता है ?
_ क्योंकि वो संवेदनशील होता है, जागरूक होता है,
_ उसे हर चीज़ गहराई से महसूस होती है – इसलिए उसका संघर्ष भी दिखता है.
सीधी बात :
_ बेईमानी का रास्ता तेज़ है, पर अंदर से खोखला करता है.
ईमानदारी का रास्ता धीमा है, पर भीतर मजबूत बनाता है.
_ आप अभी एक ऐसे मोड़ पर हो
जहाँ आप “दिखने वाले सुख” और “वास्तविक शांति” में फर्क देख रहे हो.
👉 एक लाइन में समझो :
“बुरे लोग जल्दी जीतते हैं, पर गहराई नहीं पाते…
अच्छे लोग धीरे चलते हैं, पर खुद को पा लेते हैं”
*” सुख की परिभाषा “*
_ असंतोषी व्यक्ति को जीवन में कभी सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती.
_ सुख का अर्थ कुछ पा लेना नहीं अपितु जो है उसमें संतोष कर लेना है.
_ जीवन में सुख तब नहीं आता जब हम कुछ पा लेते हैं बल्कि तब आता है,
_ जब सुख पाने का भाव हमारे भीतर से चला जाता है.
_ सोने के महल में भी आदमी दुःखी हो सकता है, यदि पाने की इच्छा समाप्त नहीं हुई हो..
_ और झोपड़ी में भी आदमी परम सुखी हो सकता है, यदि ज्यादा पाने की लालसा मिट गई हो.
_ सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है, यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं..
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हम कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख अथवा प्रसन्नता किसी व्यक्ति की स्वयं की मानसिकता पर निर्भर करती है.
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी.
_ यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं.. जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है पर विचारणीय है.!!
सुख बाहर की नहीं, भीतर की संपदा है.

_ यह संपदा धन से नहीं धैर्य से प्राप्त होती है.
_ हमारा सुख इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने धनवान हैं,
_ अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि है कि कितने धैर्यवान हैं.
_ सुख और प्रसन्नता आपकी सोच पर निर्भर करती है.
सुख- सुविधाएँ मनुष्य के जीवन को आसान बनाने के लिए हैं, पर यह मनुष्य के हाथ में है कि वह इनका उपयोग अपने जीवन को हर तरह से सफल बनाने में करे, अपने व्यक्तित्व को निखारने में करे.
हम सुखी नहीं हो सकते, हम केवल इतना इंतज़ाम कर सकते हैं कि,

_ हम बहुत अधिक दुखी न हों..!!

सुखी होने में ज्यादा खर्चा नहीं होता.. लेकिन

_आप कितने सुखी हैं.. ये दुनिया को दिखाने में बहुत खर्चा होता है.!!
अधिक से अधिक इतना ही रहा सुख.. कि कभी-कभी दुःख अनुपस्थित रहा.!!
सुख का शिखर दुख देने वाली हर चीज का उन्मूलन है.

The summit of pleasure is the elimination of all that gives pain.

सुखों की पराकाष्ठा दुखों की गहराइयों में छिपी होती है.

The peak of pleasures are disguised in the depths of sorrows.

सुखी होने में ज़्यादा खर्च नहीं होता, _

_ लेकिन हम कितने सुखी हैं, ये लोगों को दिखाने में बहुत खर्च होता है..!!!

आपको किसने दुःखी किया है ??

_दुःख ने नहीं, हमेशा सुख के सपनों ने हमें दुःखी किया.

इंसान अपने दुखों से कम और दूसरों के सुखों से अधिक दुखी होता है.!!
हम उस सुख के इंतज़ार में ख़र्च हुए जा रहे हैं, जिस के स्वप्न या तो हमनें स्वयं देखें हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमें दिखा दिए गए हैं;

_ हमारा आज महज उस कल के इंतज़ार में ख़त्म हो रहा है, जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो कल कभी आएगा भी या नहीं !!

अपने सुख को अपने दुख में कैसे बदलना है, यह तरकीब हम सभी को आती है,

_ जाने अनजाने हम सभी इसमें माहिर हैं..

“मनुष्य अपने को नहीं पहचानता” अपने को पहचानने का कारण अगर जीवन में आ जाए, तो फिर दुःख से सुख की तरफ बढ़ने की स्थिति भी आ जाएगी. 
हम उस सुख के इंतजार में हैं,  जिसके स्वप्न या तो हमने स्वयं देखे हैं या जिन्हें किसी और के द्वारा हमे दिखा दिए गए है,

_ हमारा आज महज उस कल के इंतजार में खत्म हो रहा है …जिसकी कोई गारंटी नहीं है कि ..वो कल कभी आएगा भी या नही….!

यहाँ पर जो लोग आपको दुःखी, मौन या अवसादग्रस्त दिख रहे हैं,

_ उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो,
_ क्योंकि उनके लिए.. उनकी यही अवस्था सुकून भरी है,
_ खुश रहने और सकारात्मक होने की सलाह.. उन्हें केवल इर्रिटेट करेगी,
_ क्योंकि उन्होंने इस दर्द और दुःख को ही सुख मान लिया है…!!
किसी अपने की ज़रूरत तो बस दुखी व्यक्ति को होती है.

_ सुखी व्यक्ति तो हर किसी के साथ हँस-बोल लेता है,
_ लेकिन दुःखी व्यक्ति को कोई ऐसा चाहिए होता है,
_ जो उसकी खाली आँखों की भाषा समझ सके..!!
— आप चीखते चिल्लाते रहिए दर्द के मारे कराहते रहिए, लोग सुनेंगे,
_ उनमें से कुछ लोग मरहम लगाएंगे, आपकी बात सुनेंगे और सलाह देंगे,
_ लेकिन याद रखना..
_ ज़ख्म चाहे शरीर पर हो या मन में दर्द, केवल आपको ही महसूस होगा, दूसरों को नहीं…!
मनुष्य को कैसे सुखी बनाया जाये, हमारी विकास यात्रा का यही उद्देश्य है, लेकिन डर है कि बड़े- बड़े मॉल, कॉलोनियों और बड़ी- बड़ी सड़कों के नीचे कहीं मानवता दब न जाये.

कहीं इस प्रगति के दौर में मनुष्य किसी खंडहर में छिप न जाये.

मैं भी प्रगति के पछ में हूँ और चाहता हूँ कि हमारा भी देश, प्रांत, गांव बढ़ता रहे, लेकिन यह प्रगति केवल साधनों तक सीमित न रह जाये,

क्योंकि समस्त साधन हमें सुखी बनाने के लिए उपलब्ध किये जा रहे हैं, भय है कि कहीं इन साधनों के नीचे मनुष्य दब न जाये.

आजकल देखा जा रहा है कि लाखों की गाड़ी पर एक बीमार, चिंताग्रस्त व्यक्ति बैठा है, कॉलोनियों में बड़े- बड़े मकान हैं, जो संपूर्ण आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं, लेकिन उन मकानों में जो लोग रह रहे हैं, वे बड़े अशांत हैं. वहां खड़ा संपूर्ण मानव तनाव और चिंताग्रस्त है, उस सोने के भवन सा दिखनेवाले मकान में कोई भी व्यक्ति हंसता हुआ नहीं दिख रहा है.

हमारी मस्ती, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों को किसी की नजर लग गयी. किसकी नजर लग गयी, हमारी किलकारी, हमारे हुड़दंगों पर ? किसने हमारी हरी- भरी बगिया में आग लगा दी ?

मुझे लगता है हमारा अंतर्मन राग, आकर्षण और प्रेम से रूठ गया है. हम मरुभूमि बन गये हैं. यही कारण है कि जहां जूही- चमेली की बगिया हुआ करती थी, वहां आज कंटीले वृछ आ गये हैं. यही कारण है कि हम इतना तनावग्रस्त, चिंताग्रस्त बनते जा रहे हैं. हमारे सारे अरमान सूख गये, प्रेम की धरा रेत में विलीन हो गयी.

आज आवश्यकता है कि पहले हमारे जीवन में राग, आकर्षण और प्रेम पैदा किया जाये, ताकि आज जो हम नफरत की आग में जले जा रहे हैं, घृणा और आवेश के कारण हमारा जीवन विष वृछ बन गया है, पहले हमें उसी अंतर्मन की सफाई करनी चाहिए और तब उसमें स्वस्थ पौधा लगाया जाना चाहिए, ताकि उसमें सुंदर फूल खिल सकें. क्योंकि जितनी भी हमारी विकास यात्राएं चल रही हैं, वे सभी मनुष्य के लिए हैं.

“सुखी जीवन का आसान रास्ता ये है कि “सबको हराने” की जगह “सबको जीतने” की कोशिश करो.

लोगों पर हँसने की जगह लोगों के साथ हंसो.”

यदि लोग दूसरों को दुःख देने कि बजाय_अपना सुख अधिक चाहें तो

_कुछ ही वर्षों में सभी सुखी हो जाएंगे..

बहुत से लोग सोचते हैं कि वे सुख खरीद रहे हैं,

_ जबकि वास्तव में वे सुख के लिए स्वयं को बेच रहे होते हैं.!!

_ हम लोग सुविधाओं को ही सुख मान बैठे हैं, जो सच नही है.!!!

हम ज़िंदगी में बहुत कुछ खो देते हैं,

_ “नहीं” जल्दी बोलकर, और “हाँ” देर से बोलकर..!!

मुझे जीवन में केवल एक बार मिला दुःख.._और मैंने उसे कहीं जाने नहीं दिया, कस के गले लगा लिया..!!
जो लोग सुख का ठीक से ध्यान नहीं रखते,

_ दुख उन्हें घेर लेता है !!

सुख और दुख आती जाती छांव की तरह हैं. दुख कई बार लंबे हो जाते हैं तब कोई रास्ता नहीं सूझता.

_वहीं पर मनुष्य की परीक्षा होती है. कुछ लोग धैर्य रखकर पार हो जाते हैं तो कुछ टूट जाते हैं.

सुविचार – सब ठीक हो जाएगा, सब ठीक है, सब बढ़िया है, एकदम ठीक, एकदम बढ़िया, ठीक हूं, ठीक नही हूँ मैं, मैं हूँ ना – 135

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उम्र का एक हिस्सा गुज़र जाता है पीड़ाओं से उबरने की जद्दोजहद में, फिर भी हम मुस्कुराते हुए कहते नही थकते …..

_ सब ठीक है, एकदम बढ़िया,, आप सुनाएं..
“ठीक नही हूँ मैं “
_ कहने के लिए किसी खास का होना जरुरी है..
_ वरना हर कोई पूछे तो ठीक हूं , कहना ही पड़ता है.
जादुई शब्द है ‘ मैं हूँ ना’
_ बहुत परेशानी में, दुख में साथ खड़े होना ही अपने आप में मरहम है,
_ नहीं तो ये एहसास दिलाना कि ‘मैं हूँ ना’ बहुत राहत देता है !!
“ठीक कुछ भी नही है” ‘पर सब ठीक है’ कहने की आदत जरुर है.!
कितना सरल होता है ये कहना की “सब ठीक हो जाएगा”,
_ जब चोट हमारे हिस्से की ना हो.!!

सुविचार – इच्छा, इच्छाएँ, तमन्ना, तमन्नाएं, अभिलाषा, अभिलाषाएं – 134

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हमारी इच्छाएँ-अभिलाषाएं अधिक हैं, और जीवन एक सीमित समय के लिए मिला है, जिसके तहत इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं,

_ वैसे भी हम अपने जीवन का अधिकांश समय इच्छा-अभिलाषा करने में ही व्यतीत कर देते है.!!

इच्छाएं हमें जितना उत्साहित करती हैं कई बार उतनी ही निराश भी, जिनकी इच्छाएं समय के साथ पूरी होती हैं.. वह एक नई इच्छा को जन्म देते हैं, और जिनकी इच्छा पूरी नहीं होती..

_ वे तारीख बदल देते हैं या फिर मन मारकर अपनी इच्छा को ही ख़त्म कर देते हैं…!

इच्छाओं के पूरी न होने पर दुःख महसूस करने वाले लोग कुछ कुछ ऐसे हैं,

जैसे मृत शरीर के क़रीब बैठकर रोने वाले लोग,
_ मृत व्यक्ति के अचानक उठ जाने पर जिस तरह लोग गिरते पड़ते भागेंगे,
इच्छाओं के पूरी होते ही लोग इच्छाओं से ऊबकर भागते हैं.!!
इंसान की अभिलाषाएँ असीमित होती हैं, जबकि जीवन का समय सीमित है..

_ यही कारण है कि अधिकांश अभिलाषाएँ अधूरी रह जाती हैं..
_ जीवन के अधिकतम क्षण इंसान इच्छाएँ पालने और उन्हें पूरा करने की कोशिश में बीत जाते हैं, पर अंततः बहुत-सी इच्छाएँ अधूरी ही छूट जाती हैं..!
इच्छाएं… यही तो हैं.. जो हमें जगाए रखती हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं..

_ जब ये पूरी होती हैं तो हम खुशी से झूम उठते हैं और एक नई इच्छा को जन्म देते हैं,
_ लेकिन क्या हो जब इच्छाएं पूरी न हों ?​
_ यहीं से शुरू होता है निराशा का खेल..
_ हम या तो उनकी तारीखें बदल देते हैं, यह सोचकर कि शायद अगली बार सब ठीक होगा,
_ या फिर मन मारकर अपनी इच्छाओं को ही ख़त्म कर देते हैं.!!
हमारी इच्छाएँ हमेशा अधिक होती हैं, और जीवन हमें सीमित समय के लिए मिला है.

_ शायद यही वजह है कि ज़्यादातर इच्छाएँ अधूरी रह जाती हैं.
_ हम जीने से ज़्यादा समय किसी चीज़ की चाहत में समय व्यतीत कर देते हैं.
_ हर इच्छा पूरी होने पर, एक नई इच्छा जन्म लेती है, और यह चक्र अंतहीन हो जाता है.
_ मन कभी संतुष्ट नहीं होता क्योंकि जो चाहा उसे पाने के बाद भी खालीपन वैसा ही रहता है.
_ शायद जीवन का असली अर्थ इच्छाओं की पूर्ति में नहीं, बल्कि उस क्षण में है जब हम इच्छा करना भूल जाते हैं.!!
हमारी दबी हुई तमन्नाएँ अक्सर उतना नुकसान नहीं करतीं, जितना उनका लगातार दबा रहना करता है.

_ हमने ऐसा समाज बनाया है जहाँ हर इच्छा, हर भावना और हर सच को खुलकर जीना आसान नहीं है.
_ इसलिए बहुत-सी बातें भीतर ही भीतर दबा दी जाती हैं, लेकिन दबा देने से वे समाप्त नहीं होतीं ; वे अवसर मिलते ही किसी न किसी रूप में बाहर आ जाती हैं – कभी आवेग बनकर, कभी विद्रोह बनकर और कभी किसी गलती के रूप में.
_ शायद यह हमारे समाज का एक साइड इफेक्ट है कि हम स्वाभाविक होने से अधिक सभ्य दिखने की चिंता करते हैं.
_ हम अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाकर एक बनावटी छवि बनाए रखते हैं.
_ समस्या तब पैदा होती है जब दबा हुआ सच अचानक सामने आ खड़ा होता है.
_ तब न केवल हमारी बनाई हुई छवि टूटती है, बल्कि हम स्वयं भी असहज हो जाते हैं.
– सच को दबाने से वह समाप्त नहीं होता, वह केवल अपनी बारी का इंतज़ार करता है.!!
इच्छाएं… यही तो हैं, जो हमें जगाए रखती हैं, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं..

_ जब ये पूरी होती हैं तो हम खुशी से झूम उठते हैं और एक नई इच्छा को जन्म देते हैं,​
_ लेकिन क्या हो जब इच्छाएं पूरी न हों ?​
_ यहीं से शुरू होता है निराशा का खेल..
_ हम या तो उनकी तारीखें बदल देते हैं, यह सोचकर कि शायद अगली बार सब ठीक होगा,
_ या फिर मन मारकर अपनी इच्छाओं को ही ख़त्म कर देते हैं.!
– Nirarthak Nirarthak

Quotes by प्रेमचंद

सच्ची प्रतिष्ठा और सम्मान के लिए संपत्ति की जरुरत नहीं, उस के लिए त्याग व सेवा काफी है.
क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं कहता, वह केवल दूसरों का दिल दुखाना चाहता है.
कविता सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएँ चाहे वे दुःख की हों या सुख की, उसी समय सम्पन्न होती हैं, जब हम दुःख या सुख का अनुभव करते हैं.
सिर्फ उसी को अपनी सम्पति समझो, जिसको तुमने अपने परिश्रम से कमाया है.
विपत्ति से बढ़ कर अनुभव सीखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला.
कुल की प्रतिष्ठा भी विनम्रता और सदव्यवहार से होती है, हेकड़ी और रुआब से नहीं.
जिनके लिए अपनी जिंदगानी खराब कर दो, वे भी गाढ़े समय पर मुँह फेर लेते हैं.
निराशा सम्भव को असम्भव बना देती है.
घमण्डी आदमी प्रायः शक्की हुआ करता है.
कार्य कुशल व्यक्ति की सभी जगह जरुरत पड़ती है.
जो अन्त तक साथ निभाए, ऐसा साथी पत्त्नी के सिवा दूसरा नहीं.
सन्तोष सेतु जब टूट जाता है, तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है.
खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है. जीवन नाम है, सदैव आगे बढ़ते रहने की लगन का.
कर्त्तव्य ही ऐसा आदर्श है, जो कभी धोखा नहीं दे सकता.
केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है.
स्त्री पृथ्वी की भांति धैर्यवान है, शान्ति संपन्न है, सहिष्णु है.
सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त होता है, जो अपने कर्त्तव्य पथ पर अविचल रहते हैं.
संतान को विवाहित देखना, बुढ़ापे की सब से बड़ी अभिलाषा है.
बिना ठोकर खाए आदमी की आँख नहीं खुलती.
पश्चात्ताप के कड़वे फल कभी न कभी सभी को चखने पड़ते हैं.
प्रेम, वसंत समीर है, द्वेष, ग्रीष्म की लू.
अनुराग, यौवन, रूप या धन से नहीं उत्पन्न होता. अनुराग अनुराग से उत्पन्न होता है.
अतीत चाहे दुखद ही क्यों न हो, उस की स्मृतियां मधुर होती हैं.
बुराई से सब घृणा करते हैं, इसलिए बुरों में परस्पर प्रेम होता है. भलाई की सारा संसार प्रशंसा करता है, इसलिए भलों में विरोध होता है.
मन एक भीरु शत्रु है जो सदैव पीठ के पीछे से वार करता है.
अन्याय में सहयोग देना अन्याय करने के सामान है.
स्वार्थ में मनुष्य बावला हो जाता है.

सुविचार – धारणा – 133

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जीवन एक बहुरूपी दर्पण है.

_ हम जो देखते हैं, वह अक्सर हमारी अपनी सोच और अनुभवों का प्रतिबिंब होता है.
_ हम हर व्यक्ति को अपनी धारणाओं के चश्मे से देखते हैं..
_ लेकिन क्या यह धारणा उस व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप होती हैं ?
_ या यह केवल हमारे पूर्वाग्रह और कल्पनाओं का परिणाम होती हैं ?
अनुभूति के आधार पर ही, धारणाएं निर्मित होती है,
विवेक की कसौटी पर कसा विचार ही सच्चा-ज्ञान है.
धारणाएं एक जाल हैं, जिसमें हम खुद को कैद कर लेते हैं.
_ सच वह रोशनी है, जो हर अंधेरे को मिटा सकती है.
गलत धारणा दूसरे को कम, खुद को अधिक पीड़ा पहुंचाती है.
_ अपनी धारणा को सच में तब्दील कीजिए या फिर उसे बदलिए.
किसी भी व्यक्ति के लिए आप जैसा सोचोगे, आप बस वही धारणा बनाओगे.!!
हमारी जो खुद की धारणा होती है हम सिर्फ उसे ही सच मानने लग जाते हैं..

_ और जब उसके विरोध में कोई बात कहता है तो हम उस पर यकीं नहीं करते, चाहे वह सच ही क्यों न हो..
_ और जब कोई छोटी सी भी बात हमारी धारणा के समर्थन में कही जाती है तो हम उस पर तुरंत यकीं कर लेते हैं और खुश हो जाते हैं…!
कुछ लोगों को दूसरों को जज करने में महारत हासिल होती है.

_ अपने गिरेबान में झांकते नहीं और दूसरों की पूरी कुंडली निकाल कर रख देते हैं..
_उनका स्वभाव है ये..
_अपनी धारणाओं से खुद की शांति भंग करते ही हैं, नेगेटिव वाइब्ज दूसरों तक भी भेजते हैं.
_ अपना चैन बनाए रखने के लिए ऐसों को इग्नोर करना बेहतर होता है.!!
लोगों के बारे में एक ही धारणा कायम न कर लें. न ही सबको एक ही तराज़ू में तौलें. – हर परिस्थिति अलग होती है और अलग-अलग परिस्थिति में लोग अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. मन में एक ही बात बैठाकर उसी नज़रिए को सही न मानें.

सुविचार – भीड़ – Crowd – 132

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जो सुकून अज्ञात बन कर रहने में है न, वो भीड़ में कहाँ.!![
भीड़ अब सिर्फ जगहों में नहीं, हमारे जीवन में बस गई है –

हर मोड़ पर धक्का, हर कदम पर हुज्जत, हर दिन किसी न किसी अपमान को निगल जाना..
_ लंबी लाइनों में खड़े होना अब मजबूरी नहीं, हमारी नई आदत बन गई है.
_ अजीब बात यह है कि हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि यह सब अब असामान्य भी नहीं लगता.
_ मानो भीड़ सहना ही हमारी सबसे बुनियादी शर्त बन गई हो.!!
भीड़ का हिस्सा नहीं, एकांत की ताकत बनो ;
_ जहां कद्र ना हो, वहां खामोश रहना ही जीत है.!!
दूर तलक देखो तो भीड़ ही भीड़ है..

_नजदीकियां तो वीरानियों से पटी पड़ी हैं.!!
जो शख़्स अपनी क़ीमत लोगों की वाहवाही से तय करता है,
_ वह हर भीड़ का ग़ुलाम बन जाता है.
पता नहीं भारत मे कब भीड़ वाली जगहों पर टोकन सिस्टम फ़र्स्ट कम फ़र्स्ट सर्व बेसिस पर बांटना और उसके बेसिस पर लोगों को अटेण्ड करना स्टार्ट किया जाएगा.

_ इतनी विशाल जनसंख्या है, आधे लोग सिविक सेंस को फॉलो करने वाले और आधे एकदम जाहिल टाइप हैं.
_ आधे जाहिल टाइप के चक्कर मे जो लोग ठीक हैं वो परेशान होते रहते हैं, यदि वो नियम से चल भी लें तो जाहिल वाले उनको ये सिखा ही देते हैं कि तुम मूर्ख हो.
_ चाहे अस्पताल जाओ, बैंक जाओ, किसी भीड़ वाले सरकारी विभाग मे जाना पड़े, किसी टिकट बुकिंग काउंटर पर जाना पड़े, भीड़ वाले मंदिरों मे जाना पड़े या ऐसे ही तमाम विभागों मे पता नहीं क्यूँ टोकन सिस्टम से बैर हो रखा है.
_ खिड़की पर बैठा क्लर्क ये चेक नहीं कर सकता कौन बीच मे से घुस के आ गया है और जनता दबंग लोगों से खुद नहीं लड़ सकती.
– ज्यादातर जगहों के प्रशासनिक व्यवस्थापक अकुशल, अकर्मण्य और कामचोर प्रतीत होते हैं.
_ ज्यादातर जगहों की भीड़ की वजह से होने वाली अव्यवस्था को सिम्पल टोकन सिस्टम फॉलो करके और उसके सिरियस इम्प्लिमैनटेशन से सॉल्व किया जा सकता है. _ यदि चीजें क्रम से चलें तो ज्यादातर लोगों को भले कहीं 10 घंटे भी लाइन मे लगना पड़े तो आपत्ति नहीं होगी, लेकिन हमारे देश का इस चीज से बैर है.
_ मजाल जो इस देश मे कहीं टोकन देने और उसी क्रम मे लोगों को अटेण्ड करने की मशीन शत प्रतिशत लंबे समय तक काम करती दिख जाये.
_ इक्का दुक्का कहीं चल भी रहा होगा तो वहाँ सिस्टम बेहतर प्रतीत भी होता होगा.
_ इस काम के लिए कोई बहुत भारी भरकम तकनीक की जरूरत भी नहीं है, आप कहीं पर भी भीड़ को हैंडल करते हैं तो सिम्पल कुछ कागज के टुकड़े लें, उनपर क्रम से नंबर लिखें और सुबह गिनती 1 से शुरू कर बाँट दें और लोगों को उसी क्रम से आने को कहें, बस इतना सा बदलाव ज्यादातर भीड़ वाले offices के अनुभवों को बदल कर रख देगा.
_ लेकिन ऐसा लगता है हम लोगों ने गणित मे जीरो दिया फिर दुनिया को गिनती आई, लेकिन हम लोगों ने गिनती के हिसाब से खुद काम करने का प्रयास नहीं किया.
_ हम जीरो देने के बाद गिनती के हिसाब से खुद कोई काम नहीं कर रहे.
– Anurag Tiwari

सुविचार – जनसंख्या – आबादी – Population – 131

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आज समूचा विश्व कई समस्याओं से जूझ रहा है, सृष्टि अपने सबसे भयानक दौर में है.

_ अगर सभी समस्याओं के मूल में जाएं, तो अत्यधिक आबादी को पायेंगे.
_ पृथ्वी की छमता सीमित है और मनुष्य की आबादी असीमित.
_ इतने सुंदर ग्रह को हमने बर्बाद कर दिया और रहने लायक नहीं छोड़ा है.
_ हम ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण, बढ़ते समुद्री जल स्तर, ओजोन लेयर में छेद, भुखमरी, आतंकवाद, परमाणु खतरा इत्यादि समस्याओं से घिरे हैं.
_ इन सबकी जड़ में जनसंख्या है.
_ अगर हम अपना अस्तित्व बचाये रखना चाहते हैं, तो सोच समझकर इस दुनिया में बच्चे लाएं और उनके लिए अच्छी दुनिया छोड़ जाएँ.
_अगर जनसंख्या इसी तरह बढ़ती रही तो हमारे पास आर्थिक, सामाजिक और व्यक्तिगत रूप से भी ज्यादा बेहतर भविष्य नहीं है.
इस धरती पर आठ सौ करोड़ की जनसँख्या destructive [विनाशकारी] है.. प्रकृति के लिए, जो पहले कभी नहीं थी.

_ चाहे जैसे हो, चाहे जिस विधि से हो, जनसंख्या एक बार कम हो और होनी ही चाहिए.!!
प्रकृति अपना संतुलन स्थापित स्वयं करती है और संभावना है कि प्रकृति आने वाले कुछ वर्षों में जनसंख्या संतुलन भी अपने दम पर कर लेगी.!!
बाजारवाद और जनसंख्या विस्फोट ने मनुष्य से सब कुछ छीन लिया है.!!
आज आबादी का ये हाल है कि चाहे कितनी भी ट्रेनें, बसें और हवाई जहाज चला लें,

_ कहीं जगह नहीं है.
_ स्कूल और कालेज खोल दिए जाएं,- सीट नहीं है,
_ हर जगह भीड़ ही भीड़ और चारों ओर पसरी अव्यवस्था..!!
बाजारवाद और आबादी के विस्फोट ने

इंसान से उसका सुकून छीन लिया है.
_ बाजारों की यह भीड़… उफ़!
मेले हों या फेस्टिवल,
_ अब कभी-कभी उत्सव भी जी का जंजाल लगते हैं..
_ लगता है, दुनिया में सबके लिए जगह है,
बस सुकून से जीने के लिए जगह कम पड़ती जा रही है.!!
प्राइवेट जॉब में कब जॉब चली जाए, पता नहीं.!

_ दूसरी कब मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं, पता नहीं..
_ सभी कुछ व्यवसाय कर पायें, संभव नहीं..
_ इसीलिए सारी मारामारी और समस्यायें..
_आबादी पर नियंत्रण, कानूनन और समुचित औद्योगिकीकरण ही राहत दे सकता है.!!
अगर एक नाव में जरुरत से ज्यादा लोगों को बैठाते हैं तो उसका डूबना तय है,

_ तो अत्यधिक जनसंख्या ले कर विकसित होना कैसे सोचा जा सकता है.

आप 100 रूपए 10 लोगों में बांटते हैं, और अगर वही 100 रूपए 100 लोगों में बांटते हैं तो एक के हिस्से कितने आएंगे,

_ बस यही है जनसंख्या का गरीबी से रिश्ता.

देश एक silent crisis की तरफ इंच दर इंच खिसक रहा है.

_ ज्यादातर ये जो हैवी जनसंख्या हमारे यहाँ इकट्ठा हो चुकी है, उसको कोई दूसरा देश तो लेने से रहा और न ही ये जनसंख्या स्वयं कहीं और जाने वाली है.
& समय के साथ ये जनसंख्या बूढ़ी हो रही है और आगे और बूढ़ी होती जाएगी.
_ न इनके पास सेविंग्स हैं और न इनके लिए कोई social security set up है.
_ एक सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी हुआ करती थी बच्चों की माँ बाप को पालने की वो भी अब वाली तीन एज की जनसंख्या के कंधों से हटने लगी है.
_ अगले 25-30 सालों मे जो लोग मरने की कगार पर बूढ़े होंगे, उनमे से ज्यादातर के हालात बहुत खराब हो सकते हैं.
_ ये जनसंख्या इतनी ज्यादा होगी कि सरकारी खजाने से इनको बेसिक्स दे पाना भी बहुत कठिन होने वाला है.
_ सरकार को कोई वर्किंग प्लान पर काम करना चाहिए.
_ कोई कंपलसरी बिल जिससे प्राइवेट सैक्टर मे जीवन खपा रहे लोगों को भी पेंशन दी जा सके.
_ EPFO मे फॅमिली पेंशन का प्रावधान तो है जोकि 10 साल काम करने के बाद mandatory मिलेगी, लेकिन मुझे वो नाकाफी लगता है.
_ सरकार को थोड़ा सा इनवेस्टमेंट अभी से भविष्य के बूढ़ों के लिए करना शुरू करना चाहिए.
_ कोई वर्किंग और कन्विंसिंग प्लान बनाया जाना आवश्यक है.
– Anurag Tiwari

सुविचार – स्मृति, स्मृतियाँ, स्मृतियां, स्मृतिया, स्मृतियों, यादें, यादों, याद, फोटो, तस्वीर, तसवीर, तस्वीरें – 130

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स्मृतिया….यादें…..

स्मृतियों का नियंत्रण यदि आपके पास है तो जीवन में काफी कुछ आसान हो जाता है, क्यूंकि ज्यादातर हम विगत की अच्छी और बुरी यादों और बातों में उलझे रहते है ! और उनके अनुसार अपना वर्तमान बनाते है या प्रभावित कर लेते है !
अतः ऐसी चीज़ों पर नियंत्रण रखिये _क्युकी जो बीत गया वो कितना ही अच्छा या बुरा हो वर्तमान काल सर्वश्रेष्ठ होता है !!
बहुत पुरानी स्मृतियां कभी-कभी यूं कौंधती है कि मन विचलित हो जाता है और लगता है कि.. “आ अब लौट चलें.”
मुझे लगता है कि मेरी ज़िन्दगी खाली है, पर इस खाली ज़िन्दगी में भी इतना कुछ भरा हुआ है कि उड़ेंलते-उड़ेंलते भी खाली नहीं हो रहा.

_ घटनाएँ घटित होनी बंद होंगी, तो भीतर यादें भर जाएँगी.
_ यादों को मैं किसी रचना में ढाल दूँगी तो भीतर, और कुछ नहीं तो, खालीपन ही भर जाएगा.
_ ये चटखते हुए सपने, ये दरकते हुए अपने, ये रिश्तों के महल अधबने, लगता है कि ये ज़िन्दगी का सार तत्व निचोड़ कर ले गए और जीवन को खाली कर गए.
_ लेकिन नहीं, ये हमारी ज़िन्दगी को जुगुप्सा, वितृष्णा, हीन-भावना और आत्मग्लानि के साथ-साथ नाना प्रकार के रोमांचक अहसासों और अनोखे अनुभवों से भरते हैं, खट्टी-मीठी यादों से भरते हैं, दिवा-स्वप्नों की रचना करते हैं.
_ जीवन में जीवन के खालीपन को भरने के लिए रोज़ तो कुछ घटेगा नहीं, जो घट चुका होता है, वही हमारी जमा-पूँजी है, वही हमारी अचल सम्पत्ति है, जो हमें खाली होने के अहसास के साथ-साथ भरा होने का अहसास भी कराती है.
_ ज़िन्दगी हमें लगती है कि खाली है, लेकिन वह वस्तुतः खाली नहीं होती, खालीपन से भरी हुई होती है.!!
– Manika Mohini
हम हर घटनाएं भुलाकर लोगो से दूर तो चले जाते हैं, पर वो सब हमेशा हमारे अन्दर ही कहीं दफन रहते हैं, जब कभी तेज आंधी के साथ बरसात होती है और सबकुछ बहकर बाहर आ जाता है, खैर !…

_ पुरानी स्मृतियों के साथ भविष्य की कल्पनाओं की लड़ाई को ही जीवन कहा जाता है.!!
– Nirarthak Nirarthak
हमें अक्सर वही याद रहता है, जिसे हमने बेहद पसंद किया हो या बेहद नापसंद..

_ बाकी सब वक़्त की धुंध में कहीं खो जाता है, पुराने फ़ोटो की तरह, जिनमें चेहरे तो पहचाने जाते हैं, मगर नाम याद नहीं रहते..
_ कुछ लम्हे मुस्कान बनकर ज़िंदगी में रह जाते हैं, तो कुछ ज़ख़्म बनकर भीतर कहीं ठहर जाते हैं..
_ शायद यादें दिमाग़ नहीं, दिल चुनता है कि किसे हमेशा के लिए सहेजकर रखना है और किसे वक़्त के हवाले कर देना है.!!
– Nirarthak Nirarthak
मैं जब भी स्मृतियों में डूबता हूँ, स्वयं को एक ऐसी दुनिया में पाता हूँ, जहाँ मेरे हृदय में तुम्हारे लिए अपार प्रेम है.

_ यह केवल स्मृतियों में बसी कोई काल्पनिक दुनिया नहीं, बल्कि एक ऐसा सत्य है, जिसे मैं हमेशा उतनी ही गहराई से महसूस करता हूँ.!!
– Nirarthak Nirarthak
हम कुछ भी कर लें, सफ़ल हो जाएं पर मन में छिपी कुछ शून्यताओं को कभी नहीं भर पाते …

_ वो स्मृतियों के दंश के रूप में वर्तमान रहकर हमेशा चुभती रहती हैं..!
_ कभी–कभी जीवन हर तरफ़ से ठीक दिखता है—काम, ज़िम्मेदारियाँ, सफलताएँ… सब अपनी जगह पर..
_ फिर भी भीतर कुछ खाली-सा रह जाता है.
_ ये वही शून्यताएँ हैं जिन्हें न हम भर पाते हैं, न उनसे भाग पाते हैं.
_ कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं—
_ वे वर्तमान के अंदर ही जड़ें जमाकर बैठ जाती हैं.
_ दिन में नहीं तो रात के सन्नाटे में चुभ जाती हैं.
_ और हमें याद दिलाती हैं कि अनकही बातें, अधूरे रिश्ते, खोए हुए पल—
मन में अपनी जगह कभी नहीं छोड़ते.
_ “मैं किन यादों को ढो रहा हूँ, जिन्हें छोड़ने का वक्त आ चुका है ?”
_ ये प्रश्न हल नहीं देते, लेकिन भीतर एक शांत खिड़की खोल देते हैं—
जहाँ सच बिना डर के दिखने लगता है.!!
खोए हुए पल और लम्हें कहाँ मिलते हैं ?
_ अगर मिलते हैं किसी की यादों से, किसी की बातों से, किसी की मुलाकातों से और सबसे बढ़कर किसी की संजोई हुई किसी वस्तु या कहानियों के माध्यम से तो जीवन का महत्व समझ में आता है कि हम उसे पल पल कितना क्षीण कर रहे हैं..!!
इंसान इस दुनिया में आने के बाद अकेला नहीं चलता, उसके साथ बहुत लोग होते हैं.

_ सारे अंत तक साथ नहीं जाते, कुछ बीच रास्ते में छूट जाते हैं.
_ ये बीच रास्ते में छूटे हुए लोग चाहे बाद के जीवन में ज़रूरी नहीं रह जाते,
_ हम उनके बिना जीना भी सीख जाते हैं लेकिन वे हमारी यादों में जीवित रहते हैं..!!
कुछ पुरानी तस्वीर हाथ लगी आज — धुंधली सी, लेकिन उसमें सब कुछ साफ़ था.

_ चेहरों पर वो मुस्कानें थीं, जो अब यादों में रहती हैं.
_ वक़्त जैसे थम गया हो उस एक फ्रेम में..
_ कोई आवाज़ नहीं, कोई हलचल नहीं — बस एक ख़ामोश एहसास, जो सीधा दिल में उतर गया.
_ तस्वीरें कभी बूढ़ी नहीं होतीं..
_ लोग बदल जाते हैं, रिश्ते छूट जाते हैं, लेकिन तस्वीरें वही रहती हैं — एक ठहरी हुई दुनिया में साँस लेती हुई.
_ यादें जब तस्वीर बन जाएँ, तो वो सिर्फ देखी नहीं जातीं, महसूस की जाती हैं..
_ जैसे किसी ने वक्त की धड़कनों को कागज़ पर छाप दिया हो.
_ कुछ तस्वीरें मुस्कुरा देती हैं, और कुछ… आँखें नम कर जाती हैं.!!
यादें भूलने के लिए नहीं होतीं.

_ इन्हें अपने दिलों और दिमाग में संजो कर रखना होता है.
_ अच्छी यादें खुद को तरोताजा करने के लिये और बुरी यादें सावधानी बरतने के लिये.!!
दुःखद स्मृतियाँ याद रह जाने की समस्या अमूमन हर उस शख़्स को होती है, जिसके पास अथाह खाली समय होता है.

_ व्यस्त ज़िंदगी तो उस आपाधापी का नाम है, जहाँ इंसान कर्तव्य-पथ पर अग्रसर रहते हुए अपनी बीमारियों तक को भूल जाता है.
_ ऐसे में यादों को सँभालने का अवसर भी कहाँ मिलता है.!!
कुछ लोग, जिंदगी भर साथ निभाने का वादा करके, एक दिन अचानक आख़िरी “सीन” के साथ गुम हो जाते हैं,

_ जैसे हम कभी थे ही नहीं, जैसे वो कभी थे ही नहीं, छोड़ जाते हैं बस कुछ यादें अधूरी बातें, अधूरे सपने, और वो खामोशी.. जो अब कभी-कभार याद आती है.!!
किसी की याद आती है, तो दिल उदास ज़रूर होता है..
_ मगर हम अपनी पूरी दुनिया को उस याद के हवाले तो नहीं कर देते.!!
वक़्त के साथ यादों का बक्सा हल्का होता जाता है,

_ कुछ यादें खो जाती हैं, कुछ धुंधली हो जाती हैं और हम खुद भी महसूसों में, जज़्बातों में थोड़े-थोड़े खर्च हो जाते हैं,
_ जैसे पुराने सिक्के, जो चलते-चलते घिस जाते हैं.!!
‘दिमाग वही याद रखता है.. जो ज़रूरी हो, फिर भी कहीं भीतर एक कोना ऐसा होता है..’
_ जहाँ हर ज़रूरी–गैरज़रूरी बात सहेज ली जाती है..
_ कुछ यादें काम की नहीं होतीं, फिर भी मिटाई नहीं जातीं.. बस मन के किसी रीसायकल बिन में चुपचाप पड़ी रहती हैं, और वक़्त-बेवक़्त एहसास बनकर फिर से ज़िंदा हो उठती हैं.!!
जिंदगी के बचतखाते में सिर्फ कुछ यादें ही हैं, अच्छी हैं बहोत हैं पर वो कम याद आती है,

_ बुरी है जो भुलाये नही भूलती जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, बुरी यादें अपना असल सूद सब मिलाके एक वजनदार बोझ बन जाती है, उस बोझ को कम करने के चक्कर मे हम बेकार ही खर्च हुए जाते हैं.!
कुछ घटनाएं और बातें यादों में इस तरह बस जाती हैं कि समय का बीतना महसूस ही नहीं होता..

_ वर्षों गुजर जाते हैं, मगर जब उन्हें याद करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे अभी कल की ही बात हो.!!
आदमी जगह से छूटता है, जगह आदमी से कहाँ छूटती है !
_ स्मृतियाँ तब भी आपके साथ होती है, जब आप उसका पीछा भी नहीं कर रहे होते.!!
उम्र के साथ बहुत कुछ छूट जाता है.

_ कुछ रिश्ते, कुछ जगहें, कुछ रास्ते, कुछ आदतें और भी बहुत कुछ.
_ अगर नहीं छूटता तो वह यादें.. जिनको जिया गया होता है.!!
हम हमेशा उन्हें क्यों याद करते हैं जो हमारे नहीं हो सकते ?
Why do we always miss those who can’t be ours ?
खुशमिज़ाज इंसान से वह मेरी पहली और अंतिम मुलाकात साबित हुई.
_ अब याद ही याद.
कदर तब कीजिए जब कोई आपके पास है,

_ बाद में तो बस यादें और पछतावा रह जाता है.!!
धीरे-धीरे यादें भी मिट जाती हैं,

_ जब इंसान एक अरसे तक रोकर मौन हो जाता है.!!
“जब शब्द कम पड़ते हैं, तो तस्वीर बोलने लगती है”
यह अजीब है कि लोग कैसे कहते हैं कि वे आपको याद करते हैं,

_ लेकिन आपसे मिलने का प्रयास भी नहीं करते..!!
किसी को भूलने का सबसे अच्छा तरीका है कि उसे बिल्कुल भी याद ही न करो.!!
“जो आज है, वही सबसे कीमती है..- कल सिर्फ याद बन जाता है.”
याद करता हूँ तो आंख भर आती है.

_ न तब नासमझ था, न आज बेवकूफ़ हूँ.. _”बस वक्त का फेर है सारा”
गुजरे हुए लोगों को याद करके रो लेना,
_ मगर ‘गए-गुजरों’ को याद करके.. अपनी यादों को मलिन और खराब मत करना.!!
कुछ यादें गहरी नींद में हैं.. उन्हें गहरी नींद में सोने दो !

_ हम उन्हें बेवजह क्यों जगाएँ और परेशान करें ?
_ अगर हम उन्हें जगा भी दें तो परेशानी उन जगाने वालों को ही होगी.!!
कुछ लोग ऐसे होते हैं.. जिनसे सालों बात नहीं होती, फिर भी यादों में चुपचाप बसे रहते हैं..

_ और कुछ लोग ऐसे होते हैं.. जो रोज़ सामने होते हैं, फिर भी भीतर कहीं अनजान से लगते हैं..
_ जैसे उनसे कभी सही मायनों में मुलाक़ात ही न हुई हो.!!
जैसे हम ठहर जाते है कोई बात कहते कहते,

_ रुक जाने पर भी बात होती ही है कहीं न कहीं, ख़त्म थोड़े ही हो जाती है..
_ ख़त्म हुई बात भी कहाँ ख़त्म होती है पूरी तरह, _ वह एक याद की तरह बची ही रहती है..
_ क्योंकि बातों की उम्र लंबी है, इसलिए बातें होती रहनी चाहिए, चाहे बेवजह ही सही.!!
स्मृतियाँ और यादें सम्मान की पात्र हो सकती हैं, लेकिन वे भविष्य नहीं बन सकतीं.

_ जो बीत गया, वह मूल्यवान हो सकता है, लेकिन जीवन की दिशा उसे नहीं, वर्तमान को तय करनी चाहिए.!!
“यादें असल में अकेलेपन की साथी होती हैं,
_ जो आपको अकेलेपन से बचाकर रखती हैं.”
फोटो और तस्वीरों का होना ज़रूरी हैं..
_ जो आपको बाद में आपके सभी रस्मों-अनुष्ठानों की एक झलक दिखाए..!!
देखना, मिल पाना, बातें कर लेना, हमेशा संभव नहीं,

_ शायद इसीलिए होती होंगी तस्वीरें.!!
कुछ यादें हम इसीलिए सहेज कर रखते हैं..

_ क्योंकि वे जीवन भर हमारे मुस्कुराते रहने की वजह बनती हैं.!!
समय के साथ बहुत कुछ भूल जाते हैं…
_ लेकिन कुछ खास यादें बहुत याद आती हैं !!
तस्वीरों और यादों में रह जाते हैं कुछ लोग..
_ जिनके साथ हम पूरी जिंदगी रहना चाहते हैं.!!
“जो तस्वीर देखकर सांस गहरी हो जाए,
_ वही घर में सजावट के लिए सही होती है.”
कुछ यादों से झूझना ज़िन्दगी के सबसे कठिन पहलुओं में से हैं,
_ जहाँ इंसान पल-पल मरकर भी नही मरता…!
लोग सिर्फ काम पड़ने पर याद करते है, बाद में पहचानना भी भूल जाते हैं.
यादें भी कुछ कहती हैँ, अतीत में जो मिला उसको फिर से पाना चाहती हैँ.
लोग भूलते नहीं, बस याद करना छोड़ देते हैं.!!
यादें क्यों नहीं बिछड़ जाती है, लोग तो पल भर में बिछड़ जाते हैं.!!
संजीवनी होती हैं स्मृतियाँ बशर्ते उन्हे जीवित रखा जाये, – गाहे बगाहे आँखें भिगो ही देती हैं.!!
अजीब लोगों का बसेरा हैं यहाँ, गुरुर में मिट जाते हैं मगर याद नहीं करते..
कुछ यादें फूलों जैसी होती हैं, लेकिन चुभती कांटों जैसी हैं..!!
आज जो पास हैं, कल याद बन सकते हैं.. – यही ज़िंदगी की सच्चाई है.!!
एक समय के बाद- याद न करने से यादों से उतर जाते हैं लोग.!!
बातें भूल जाती हैं, यादें याद आती हैं.!!
छोटी छोटी यादें ही जिंदगी का सरमाया होती हैं..

_जिन्हे याद करते जिंदगीभर कुछ खुशी तो कुछ गम दामन को बार-बार भिगोते रहते हैँ !!

याद रखना कि आज जो स्मृति में जगह बनाए हुए है, कल वह विस्मृत होगा.

_ और जो विस्मृत हो चुका है वह ज़रूर कभी न कभी स्मृति में लौटेगा.. “क्योंकि यही जीवन है..”

कभी-कभी यादों का भी अपना अलग ही मिज़ाज होता है..

_ सालों पुरानी बातें, पुराने लम्हे आज भी उतने ही साफ़ याद रहते हैं और कभी हाल ही की कोई बात ऐसे खो जाती है, जैसे वो कभी हुई ही न हो.!!

कुछ बातें ऐसी होती हैं.. जिन्हें हम दिल से मिटा देना चाहते हैं इस कदर कि उनका ख़याल भी कभी लौटकर न आए..

_ पर अजीब विडंबना है कि जिस पल हम अपने दिमाग़ को झटका देकर उन्हें भूलने की कोशिश करते हैं, वही दिमाग़ उन्हीं यादों को और ज़ोर से सामने ला खड़ा करता है.. _ शायद कुछ यादें भुलाई नहीं जातीं, वे बस भीतर कहीं शांत होकर हमारे साथ जीना सीख लेती हैं और हम भी.!!
समय के साथ यादों का पिटारा हल्का होता जाता है, कुछ यादें कहीं सिमट जाती हैं,

_ कुछ धुंधली होकर भी अंदर ही अंदर झिलमिलाती रहती हैं और हम धीरे-धीरे एहसासों और संवेदनाओं में खो जाते हैं,
_ पुराने सिक्कों की तरह, जो प्रचलन में रहते हुए अपनी पहचान खो देते हैं.!!
भूल जाना याद रखने जैसी सरल प्रक्रिया नहीं है, कुछ समय की यादें मन के किसी कोने में चुपचाप सहेजी रह जाती हैं और जीवन के अंतिम पहर में, वे अचानक आँखों के सामने से गुजरती हैं, मानो पूरी ज़िंदगी उन क्षणों में सिमट आई हो.!!
आप देखें कि कितने ही लोग थे, जो कभी आपकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे,

_ पर आज जब पुरानी यादों की मेमोरी में उन्हें देखेंगे, तो वे जा चुके हैं, अपनी अलग दुनिया में मग्न हैं.
_ वक्त के साथ तारीफें खामोश हो जाती हैं, जो साथ थे.. वो ज़रूरी नहीं कि हमेशा साथ ही रहें..
_ बस यादें बची रह जाती हैं, कुछ मीठी, कुछ चुभती हुई.!!
अपनी यादें बनाएं … कहीं भी कैसे भी बनाएं..

_ ये वक्त जो बीत रहा है, लौट कर नहीं आएगा.
_ इससे बेहतर होगा, पर यह नहीं होगा.. इस वक्त की मासूमियत नहीं होगी..!!

_ ज़िंदगी यादों का पिटारा है, _ यादें हैं तो ज़िंदगी है.

_ हर आदमी की ज़िंदगी सिवाय यादों के कुछ भी नहीं..
_ कई यादें संयोग भी होती है.
_ ज़िंदगी के डॉट्स जोड़ेंगे तो कई कहानियां उभरेंगी.
_ सारी यादें बहुत सुखद हैं.
_ सुखद यादों को संजो कर रखना चाहिए..
_ मुश्किल घड़ी में ये यादें बड़ा सहारा बन जाती हैं..!!
अतीत कि अच्छी यादें प्रायः ही दोहराई जाने के कारण हमारे मस्तिष्क में रह जाती हैं..

_जब कि उस जीवन की कठिनाइयाँ हम भूल जाते हैं.
_ उस काल का जीवन भी कुछ अच्छा रहता था कुछ कठिन..
_ पर हमें उसके चुनिंदा पल ही याद रह जाते हैं..
_ और सोचा जाए तो यह हमारे लिए, हमारे स्वास्थ के लिए बहुत अच्छी बात भी है.
_ निःसंदेह आज की तरह उस समय भागदौड़ नहीं होती थी, प्रकृति से सामंजस्य था.
_ लोग शारिरिक श्रम करते थे ..अतः स्वस्थ्य रहते थे.
_ बड़े बड़े परिवार एक संग रहते थे और इसलिए परिवार के छोटे बड़े सब स्वयं को संरक्षित महसूस करते थे.
हमारे जीवन के कुछ ऐसे पहलू होते हैं.. जिन्हें हम कभी नहीं भूलना चाहते.

_ ये वो यादें हैं.. जिन्हें हम हमेशा अपने ज़ेहन में संजोकर रखना चाहते हैं,
_ क्योंकि चाहे कितनी भी उलझन हो, ये हमेशा हमारे चेहरे पर मुस्कान ला सकती हैं.
_ और इसी तरह हम मुश्किलों से उबरते हैं, यह याद रखकर कि हमने ज़िंदगी में काफ़ी अच्छे पल जीए हैं.
_ ये हमें एक वजह देते हैं, उन यादों में हम जिन लोगों को देखते हैं, वही हमारे ज़िंदा रहने की असली वजह है और यह खूबसूरत है.!!
हमें केवल वही याद रहता है.. जो हमें वास्तव में पसंद या नापसंद था, बाकी सब कुछ समय की धुंध में खो जाता है.

_ कुछ लम्हे मुस्कान बनकर रह जाते हैं, कुछ ज़ख्म बनकर..
_ आखिर यादों को दिल ही चुनता है, दिमाग नहीं… कि कौन-सी यादें रहनी चाहिए.!!
मुझे सहेजना पसंद है, फिर चाहे वस्तुएं हों, गीत हों, मित्र हों, या किसी पसंदीदा शख्स की स्मृतियां हों..

_ यह सब छोड़कर मैं आगे नहीं बढ़ पाता..
_ अतीत में घटी कुछ अप्रिय घटनाओं ने जरूर निराश किया,
_ परंतु कुछ अच्छे लम्हों को भी मैं भूला नहीं हूं,
_ ज़िन्दगी अनन्त दुःखों और उम्मीदों से भरी है…!!
मैं अक्सर रियल फोटो पोस्ट करता हूँ.
_मुझे ख़ुद को नेचुरल लुक में रहना और दिखना पंसद भी है.!!
कभी-कभी हम जीवन में अच्छी यादें बनाने के लिए कितना कुछ कर जाते हैं.
_ अपना समय, अपनी ऊर्जा, यहाँ तक कि अपनी शांति तक लगा देते हैं हम..
_ छोटे-छोटे पलों को खूबसूरत बनाने की कोशिश करते हैं,
_ किसी मुस्कान, किसी मुलाक़ात या किसी सफ़र में वो गर्माहट ढूँढते हैं.. जो हमें लंबे समय तक संभाले रखे.
_ पर यादें बनाना हमेशा आसान नहीं होता..
_कभी हालात साथ नहीं देते, कभी लोग बदल जाते हैं, और कभी हम खुद ही पल को सही तरह पकड़ नहीं पाते..
_ फिर भी हम कोशिश करते रहते हैं,
_ क्योंकि अंत में इंसान के पास उसी के बनाए हुए पल होते हैं, जिन्हें याद करके वह फिर से जी लेता है.!!
कुछ चीज़ें कभी पुरानी नहीं होतीं.

_ वे बस कहीं चुपचाप रखी रह जाती हैं, और एक दिन अचानक सामने आकर पूरी ज़िंदगी को ठहरा जाती हैं.
_ कोई पुरानी तस्वीर, कोई अधूरा संदेश, कोई किताब, कोई छोटी-सी चीज़… और फिर ऐसा लगता है, जैसे वक़्त ने कई साल पीछे लौटने का फ़ैसला कर लिया हो.
_ आँखों के सामने वही चेहरे के भाव, वही हँसी, वही डाँट में छिपा अपनापन, वही फ़िक्र, वही बातें… सब कुछ फिर से जीने लगता है.
_ कुछ पल के लिए दिल इस भ्रम को सच मान लेना चाहता है कि शायद कुछ भी नहीं बदला, कुछ भी तो नहीं हुआ था, शायद अभी भी एक आवाज़ आएगी और सब पहले जैसा हो जाएगा.
_ लेकिन अगले ही पल सन्नाटा याद दिला देता है कि कुछ लोग लौटकर नहीं आते, सिर्फ़ याद बनकर रह जाते हैं.
_ अजीब बात है, कि इंसान के लिए भूलना बड़ी आम बात होती है, फिर भी वो स्वीकार कर लेना होता है कि अब वो कभी भुला ना सकेगा.
_ मन बार-बार उसी जगह जाकर खड़ा हो जाता है, जहाँ से सब छूट गया था.
_ सोचता है, काश उस दिन थोड़ा और रुक जाते… थोड़ा और बात कर लेते… थोड़ा और हँस लेते… शायद तब आज इतना खालीपन महसूस न होता.
_ लेकिन ज़िंदगी में सबसे ज़्यादा देर से समझ आने वाली बात यही है कि कुछ आख़िरी मुलाक़ातें, आख़िरी ही होती हैं.
_ उस समय हमें पता ही नहीं होता कि हम किसी पल को आख़िरी बार जी रहे हैं.
_ शायद इसलिए यादें इतनी तकलीफ़ देती हैं, क्योंकि वे सिर्फ़ बीता हुआ वक़्त नहीं लौटातीं, वे उस इंसान की कमी भी पूरी ताक़त से महसूस करा देती हैं.
_ दिल जानता है कि अब जवाब नहीं आएगा, फिर भी अनजाने में आज भी कई बातें उसी से करने लगता है.
_ कोई अच्छी ख़बर हो, कोई मुश्किल फ़ैसला हो, कोई ऐसा दिन जब बहुत थक जायें… सबसे पहले उसी की याद आती है.
_ फिर अचानक एहसास होता है कि अब उस ख़ामोशी के पार कोई नहीं है.
_ उस एक पल में जितना अकेलापन महसूस होता है, उसे शब्द कभी बयां ही नहीं कर सकते.
_ कहते हैं, वक़्त हर ज़ख़्म भर देता है, लेकिन कुछ ज़ख़्म भरते नहीं, बस जीना सीख जाते हैं.
_ दर्द कम हो जाता है, लेकिन कमी कभी कम नहीं हो पाती.
_ वह हर दिन किसी न किसी बहाने अपना होना दर्ज करा देती है.
_ भीड़ में, ख़ामोशी में, किसी पुराने गीत में, किसी ख़ुशबू में, या फिर यूँ ही बिना किसी वजह के.
_ और हर बार दिल उसी जगह लौट जाता है, जहाँ से वह कभी पूरी तरह लौट ही नहीं पाया.
_ कई बार ख़ुद से भी कहते हैं, कि अब इन यादों को आने नहीं देंगे.
_ लेकिन यादें हमारी इजाज़त लेकर नहीं आतीं.
_ जिन लोगों ने हमारे जीवन को सबसे गहराई से छुआ होता है, वे हमारी यादों में नहीं, हमारी आदतों में बस जाते हैं.
_ इसलिए उन्हें भुलाना वैसा ही है जैसे अपनी ही किसी साँस को भूलने की कोशिश करना.
_ जितना रोकते हैं, वे उतनी ही शिद्दत से लौट आती हैं.
_ तकलीफ़ यादों से नहीं होती, तकलीफ़ उस समय से होती है जिसने बिना पूछे सब कुछ छीन लिया, जैसे भरे घर में डाँका डाल लिया हो.
_ यादें तो आज भी वही करती हैं जो वो शख़्स हमेशा करता था, साथ निभाती हैं.
_ कुछ लोग दुनिया से चले जाते हैं, लेकिन हमारी दुनिया से कभी नहीं जाते.
_ वे हर उस जगह रहते हैं जो अधूरी रह गई, हर उस सपने में जो चुपके से आते हैं, और अपने पीछे बहुत सारे सवाल छोड़ कर चले जाते हैं.!!
– Krishna Chaudhary
आदमी जगह से छूटता है, जगह आदमी से कहाँ छूटती है !

स्मृतियों की एक खास बात है कि वह तब भी आपके साथ होती है, जब आप उसका पीछा भी नहीं कर रहे होते.
_ कुछ स्मृतियाँ समय के साथ पहाड़ बन जाती है, जो किसी भी परिस्थितियों के भूस्खलन से तोड़े नहीं टूटती.
_ वहाँ से तो लौट आया हूँ लेकिन वो नदी जो ठीक मेरे पास से बहती थी, उसकी याद आज भी यूँ बनी हुई है.
_ वह आज भी मेरे स्वप्न में आती है.
_ कहती है – सुनो !
_ उस शांत-सी दिखने वाली उफनती नदी की सुनो !
_ मैं भूलने की कोशिश में कई बार उसकी तेज धारा में बह जाता हूँ.
_ वह पहाड़ जो स्थिरता की यात्रा में है, मेरी स्मृति कई बार उसकी सबसे ऊँची चोटी तक पहुंचती है और धड़ाम से नीचे गिर जाती है.
_ यह सिलसिला लगातार चलता जाता है.
_ वो जगहें छोड़े नहीं छूट रही.
– कुमार आनंद

सुविचार – खुशबू, इत्र, महक, सुवास, सुरभि, सुगंध – 129

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रात सुबह का इन्तजार नहीं करती, खुशबु मौसम का इन्तजार नहीं करती.

जो भी ज़िन्दगी से मिले उसको ख़ुशी से जीयो,

क्योंकि ज़िन्दगी वक़्त का इन्तजार नहीं करती.

यह आपके ऊपर है कि आप कूड़ा बनना चाहते हैं..

_या फूलों से महकता आंगन..!!

आदमी स्वभाव से खुशबू पसंद है, संसार में किसी को बदबू पसंद नहीं..

_ कि जब आप किसी से मिलें तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए,
_ जैसे आपके शरीर से किसी तरह की बदबू न आए.
_ आप स्त्री हों, पुरुष हों ..ये आपका कर्तव्य है कि ..जब आपको किसी से मिलना हो तो ..न्यूनतम हाइजिन का ध्यान रखा जाए.
_ आपके बदन, बाल, दांत से बदबू न आए.
_ अगर ये बदबू आती है और आप लोगों से उस बदबू के साथ मिलते हैं तो ..यकीन कीजिए, ये एक तरह का अत्याचार है.
_ ये आपका कर्तव्य है कि जब किसी से मिलें तो भले आपके पास परफ्यूम न हो, पर दुर्गंध से बचने के उपाय आपको पता होने चाहिए.
_ आप चाहे घर में हों, बाहर हों, आपका रहन-सहन ऐसा हो कि ..आपके साथ रहने वालों के साथ ऐसा कोई अत्याचार न हो, जिसे वो कह भी न सके, सह भी न सके.
_ आपकी उम्र चाहे जितनी हो, ये आपकी जिम्मेदारी है कि किसी को आपके सामने पड़ने पर पीड़ा न हो.
मैं नहीं मानता कि किसी को कभी ये पता ही नहीं चलता होगा कि उसके मुंह से, पसीने से बदबू आती है.

_ आप किसी को नहीं टोक सकते हैं.
_ अपनी पत्नी/पति को भी नहीं.
_ बहुत आसान नहीं होता है किसी को उसके सच का अहसास कराना.
_ असल में ये बचपन से घर में मिली ट्रेनिंग का हिस्सा है.
_ आदमी समझ कर भी अनजान बना रहता है तो इसके पीछे सिर्फ लापरवाही, अज्ञानता कारण है.
_ अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं.
_ बिना कर्तव्य के अधिकार का कोई मतलब नहीं रह जाता है.
_ किसी का अधिकार हो सकता है नहीं नहाना..
_ लेकिन जब आप किसी के साथ हैं, किसी के सामने हैं तो आपका कर्तव्य हो जाता है कि सामने वाले को आपसे तकलीफ़ न हो.
_ हम रोज़ की ज़िंदगी में इस बात का ख़्याल नहीं रखते कि ..हमारी वजह से उन्हे तकलीफ़ तो नहीं हो रही, जिनके साथ हम हैं.
_ ज़िंदगी में ऐसी बहुत-सी छोटी-छोटी घटनाएं होती हैं, आदतें होती हैं जिन्हें हम नज़रअंदाज करते हैं.
_ हमें बहुत बार घर में ही नहीं सिखाया जाता कि मनुष्य एक समाजिक प्राणी है ..इसका अर्थ क्या है।
_हमें समाज के बीच कैसे उठना-बैठना और चलना है, कैसे रहना है ?
_ हमारे यहाँ बचपन से रूमाल का इस्तेमाल नहीं सिखाया जाता.
_ये नहीं सिखाया जाता कि सार्वजनिक जीवन में क्या नहीं करना चाहिए.
_अब ये विषय ऐसा है कि इस पर क्या और कितना लिखें..
_कोई किसी को टोक नहीं सकता है.
_ये खुद का धर्म (ड्यूटी) है कि हर आदमी अपना ख्याल रखे.
_साफ-सफाई से रहने, सुघड़ता से रहने में कोई खर्चा नहीं आता है.
_ अपना ख्याल रखिए, अपने चाहने वालों का ख्याल रखिए.
_साफ-सफाई का होना सामाजिक होने के कारण ज़रूरी है.
हमें ये ध्यान रखना चाहिए कि लोग हमें याद रखें सुगंध के रूप में ना कि एक दुर्गंध के रूप में..

_थोड़ी खुशबू उन हाथों में भी रह जाती है, जो किसो को गुलाब देते हैं.

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