सुविचार 3566
नदी के समान गतिशील रहो, ठहरे पानी में सड़ान्ध आती है.
_ और लोग अंत में कहते हैं ” यह तो बहुत आसान था “
आखिकार जीवन न तो पीड़ा है और न ही आनंद, _ यह वैसा बन जाता है जैसा आप उसे बनाते हैं !!
_ उसके शरीर से वैसी ही तरंगे भी निकलती हैं.
_ या तो अपने रहेंगे या फिर मुश्किलें..
_ माफ़ करके शर्मिंदा करने का तरीका भी बुरा नहीं…
सोचने, काम करने और सफल होने के लिए अपनी खुद की शक्ति से खुद को सक्रिय करें…
_ अपने समय का उपयोग खुद को और बेहतर करने में करें..