अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
मुझे राहों में देखने के लिए, अब ठहरना कैसा,
चुप चाप मुझे न देखते हुए, अपने काम निकल जाओ तुम॥
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
आज भी जहन में आपके, मेरी ये सोच कैसी,
कोई नया दोस्त ढूँढ कर, अब तो उसके साथ निभाओ तुम॥
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
मैने दरवाजे बन्द कर लिए हैं, अब तो अपने घर के,
कहीं ऐसा न हो पहले कि तरह, मेरे घर आ जाओ तुम॥
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
जो मेरे पैसे लूटे हैं तुमने, धोखा मुझको देकर यहाँ,
अब कुछ दिन तो उन पैसों से, चुपचाप बैठ कर खाओ तुम॥
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
ये जख्म तुम्हारे ही दिए हुए हैं, मेरे दिल जहन शरीर पर,
अब लोक दिखावा करने के लिए, इन पर मरहम न लगाओ तुम॥
मैं तो वक्त हूँ गुजरा हुआ, मुझे भूल जाओ तुम॥
अब ये मुनासिब नहीं, मेरी यादों को दिल में सजाओ तुम।
Lekhak MAHESH KUMAR CHALIA.