मस्त विचार 4786
बिछड़ते वक्त सारी बुराइयाँ गिनाई उसने,
सोच रहा हूँ _ जब मिले थे तो _ कौन सा हुनर था मुझमें..
सोच रहा हूँ _ जब मिले थे तो _ कौन सा हुनर था मुझमें..
_ तो कोई बांसुरी बना कर बांस में सुर को भरता है.
_ मैं स्नेह का धागा हूँ _ मजबूरी की जंजीर नहीं..!!
ख़ाक हूँ मैं, ख़ाक पर क्या ख़ाक इतरा के चलूँ..
ख़ुशी के लिये ही अब ये तलाश बंद कर दी.”