Quotes by – ओशो – A

‘ठोकरे खा कर भी ना संभले तो मुसाफ़िर का नसीब, वरना पत्थरों ने तो अपना फर्ज निभा ही दिया!’ 
अगर आप सच देखना चाहते हैं, तो न अपनी सहमति और न असहमति में राय रखिए.
जिन्दगी में आप जो करना चाहते है, वो जरूर कीजिये, ये मत सोचिये कि लोग क्या कहेंगे. क्यों कि लोग तो तब भी कुछ कहते है, जब आप कुछ नहीं करते.
सारी शिक्षा व्यर्थ है, सारे उपदेश व्यर्थ है, अगर वे तुम्हें अपने भीतर डूबने की कला नहीं सीखाते.
कोई आदमी चाहे लाखों चीजें जान ले. चाहे वह पूरे जगत को जान ले. लेकिन अगर वह स्वयं को नहीं जानता है तो वह अज्ञानी है.
असली सवाल यह है कि भीतर तुम क्या हो? अगर भीतर गलत हो, तो तुम जो भी करोगे, उससे गलत फलित होगा. अगर तुम भीतर सही हो, तो तुम जो भी करोगे, वह सही फलित होगा.
जो इंसान जिंदगी के मज़े ले रहा हो उसे मालिक बनने की कोई चाह नहीं होती है, क्योंकि वह जीवन के असली आनंद के बारे में जानता है, वह जानता है की ख़ुशी कभी खरीदी नहीं जा सकती.
जिंदगी कोई मुसीबत नहीं है बल्कि ये तो एक खूबसूरत तोहफा है.
जीवन ठहराव और गति के बीच का संतुलन है.
हमारे दुःख की वजह में से एक वजह दूसरों का सुख है,

जब दूसरे हमें खुश दिखाई पड़ते हैं तो हम और दुःखी होते चले जाते हैं.

दूसरे लोग क्या सोचते हैं इसकी नाहक चिंता न लो,

सिर्फ यह देखो कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है.

कीचड़ को मत देखो, उसमें जो कमल छिपा है उसे देखो. तुम्हारी दृष्टि ऐसी हो जाए तो तुम पूरे जीवन का सार निचोड़ ले सकते हो.
भीतर ‘ध्यान’ का दिया जला हो तो तुम चाहे पहाड़ पर रहो या बाज़ार में कोई अंतर नहीं पड़ता तुम्हारे पास ‘ध्यान’ हो तो कोई गाली तुम्हे छूती नहीं, ना अपमान, ना सम्मान ना यश, ना अपयश कुछ भी नहीं छूता अंगारा नदी में फेंक कर देखो जब तक नदी को नहीं छुआ तभी तक अंगारा है, नदी को छूते ही बुझ जाता है तुम्हारे ध्यान की नदी में सब गालियाँ, अपमान, छूते ही मिट जाते हैं…तुम दूर अछूते खड़े रह जाते हो में इसी को परम स्वतंत्रता कहता हूँ, जब बाहर की कोई वस्तु, व्यक्ति, क्रिया तुम्हारे भीतर की शान्ति और शून्य को डिगाने में अक्षम हो जाती है तब जीवन एक आनंद है.
“जैसे ही मन पूरी तरह से खाली हो जाता है, तुम्हारी पूरी ऊर्जा जागरण की एक लौ बन जाती है। यह लौ ध्यान का परिणाम है।”
सिर्फ आवश्यक बातें सुनो और करो, और धीरे-धीरे तुम शुद्धता की एक सफाई देखोगे, ऐसे जैसे कि तुमने अभी-अभी स्नान लिया है, तुम्हारे भीतर संकल्प पैदा होने लगेगा. वह ध्यान के विकसित होने के लिए आवश्यक मिट्टी बनेगा. यदि तुम अपने मन में कुछ अंतराल खाली छोड़ देते हो, वे चेतना के खाली क्षण ध्यान की झलकें बन जाएंगे, उस पार की पहली झलक, अ-मन की पहली चमक.
हम जिसके लिए लड़ते है, अंततः वही हम हो जाते है ;

लड़ो सुंदर के लिए और तुम सुंदर हो जाओगे,

लड़ो सत्य के लिए और तुम सत्य हो जाओगे,

लड़ो श्रेष्ठ के लिए तुम श्रेष्ठ हो जाओगे.

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