सुविचार – ध्यान करके क्या हासिल होगा ? – 101

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प्रश्न: ध्यान करके क्या हासिल होगा ?

सखा: पहले तो तुमसे मेरा यह प्रश्न हैं कि और सब करके तुम्हें क्या हासिल हुआ ?
इतना कानों से तुमने सुना, कौनसे ऐसे शब्द है, जिसे सुनने के बाद शब्द सुनने की चाह न उठी ?
आंखों से तुमने इतना देखा, तो ऐसा क्या देखा, जिसे देख कर कुछ देखने का भाव न उठे ?
क्या ऐसा तुमने सूंघ लिया, जिसे सूंघने के बाद और कोई खुशबू भाती नहीं ?
इसलिए मिलने की भाषा ही गलत है,
और मिलने की भाषा के साथ यदि ध्यान किया जाए तो ध्यान में भी कुछ नहीं मिलता,
लेकिन फिर भी जानना है और प्रश्न किया है तो जवाब दूंगा।
______ध्यान में मिलती हैं ताजगी,
ध्यान में मिलती हैं इंद्रियों पर पकड़,
ध्यान में मिलती हैं इंद्रियों की वो संवेदनशीलता की आपका भोजन में स्वाद बढ़ जाता हैं, आंखों से देखने का आनंद बढ़ जाता है,
कानों से सुनने की क्षमताएं और संगीतमय स्थिति पैदा हो जाती हैं,
कुल मिलाकर ध्यान में उपलब्ध होती फूलों में खुशबू,
सूरज में तपिश,
चांद में चांदनी,
हवाओं की शीतलता…
ध्यान से तुम्हें हर वो चीज उपलब्ध होती हैं जिन चीजों के बगैर तुम जीवन का आनंद नहीं ले सकते।
जैसे कि आंखे हो और शीशे पर धूल हो तो कुछ साफ दिखता नहीं,
ध्यान हैं धूल का हट जाना
कानों से तुम सुनते हो गाड़ियों के हॉर्न की आवाजें लेकिन तुमने देखा लोगों को हॉर्न मारो फिर भी सुनते ही नहीं,
ध्यानी की सजगता ऐसी है कि वो एक बार में हॉर्न सुन लेगा,
ध्यानी अगर वास्तव में ध्यानी हैं तो उसकी इंद्रियां इतनी संवेदनशील होगी कि जब वो भोजन करेगा तो वो भोजन करेगा उसमें उसे वो स्वाद आएगा जो कि सामान्यतः लोगों को नहीं आता।
तो ध्यान से जो मिलने की बात है वो बहुत कीमती है,
बिस्तर धन से खरीद सकते हो नींद ध्यान से मिलती हैं,
तुम बड़ा पद तो ताकत से ले सकते हो लेकिन उस पद के उपयोग की कला तुम्हें ध्यान से मिलती हैं,
तुम जगत का सारा ऐश्वर्य इक्कट्ठा कर सकते हो लेकिन उस ऐश्वर्य से थकान न हो और तुम उस ऐश्वर्य को भोग के जगत के कल्याण में कुछ कार्य कर सको ये कला ध्यान से आती हैं,
ध्यान तुम्हें युक्ति सिखाता है, और संसार तुम्हें विरक्ति सिखाता हैं।
ध्यानी को वो कला आती हैं कि वो संसार का कैसे उपयोग कर सके।
ध्यान से संसारी को ये खोज आती हैं कि कैसे इस संसार में रहते हुए मजा लिया जा सके,
तो इतना ही अंतर हैं।
यहां ध्यान में कुछ मिलने की बात वैसी नहीं है जैसी तुम बाहर के जगत में देखते हो।
लेकिन फिर भी जो मिलता हैं वो इतना कीमती है कि अगर वो ना हो तो तुम बाहर के जगत का परिपूर्ण आनंद नहीं ले सकते।
यही कारण है कि ध्यान के शिखर पर जो लोग पहुंचे वो पूरी दुनिया के लोगों को अपनी और आकर्षित करते थे।
क्योंकि पूरी दुनिया के पास वो सब कुछ होता हैं लेकिन आनंद नहीं होता,
और ध्यानी के पास कुछ होता हैं तो भी वो आनंदित हैं और कुछ नहीं होता तो भी वो आनंदित हैं।
ध्यानी के पास मालकियत होती हैं स्वतंत्रता होती हैं।
ध्यानी को मिलता हैं पंख के साथ साहस,
और साहस के साथ उड़ने की कला,
ध्यानी के पास सब कुछ हैं।
ध्यानी को कुछ मिल जाए हैं ऐसा भाव भी नहीं आता,
क्योंकि ध्यानी को सब मिला हुआ ही हैं।
मिलने की भाषा उनकी हैं जो अभी संसारी हैं।
लेकिन ध्यानी हो जाओगे तो मिलने की भाषा में बात ही नहीं करोगे, मिलने जैसी कोई बात आएगी ही नहीं क्योंकि सब कुछ मिला हुआ ही है।
-Sakha___
यदि तुम आनंदित हो तो तुम्हें न ध्यान करने की जरूरत है न मेरे पास आने की जरूरत है.

_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे पर रुक मत जाना, यात्रा अनंत है.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे न रहने पर जीवित सदगुरू को खोज लेना.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
– मेरे से मुक्त होना होगा, गुरु शिष्य संबंध अंतिम संबंध है पर इससे भी मुक्त होना होगा.
_ ऐसा कहने वाला ओशो के सिवाय कोई नहीं..
_ मुझे क्षमा करना और भूल जाना.
_ ऐसा कहने वाला भी ओशो के सिवाय कोई नहीं..
_ ओशो के प्रवचनों में क्या नहीं मिलता, सब मिल जाता है.. पर सवाल ये है कि गोता लगाता ही कौन है ?
_ ओशो के प्रवचनों का उपयोग कर लोगों ने दुकानें तो खोल ली पर अपनी यात्रा में अटक गए.
_ चेतना के शिखर पर हो सकते थे दुनियावी सफलता में ही खो गए.!!
– Shailendra Sudharana
जब मन बार-बार भटकने के बाद धीरे-धीरे ठहरना सीख लेता है, तब उसके भीतर एक अलग ही स्थिति पैदा होती है.

_ विचार आते तो हैं, पर उनका जोर कम हो जाता है.
_ मन बाहर की बातों से हटकर अंदर की ओर टिकने लगता है.
_ इस तरह जो शांत और जागरूक अवस्था बनती है, वही ध्यान की अवस्था है.
_ इसमें कुछ करने का भाव नहीं रहता, बस मन अपने आप स्थिर होने लगता है.
_ जैसे-जैसे यह ठहराव गहराता जाता है, मन की बेचैनी पूरी तरह शांत होने लगती है.
_ अब स्थिरता टूटती नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से बनी रहती है.
_ साधक और ध्यान के बीच का फर्क धीरे-धीरे मिटने लगता है.
_ जब यह स्थिरता पूरी तरह पक्की हो जाती है और मन बिल्कुल निर्मल व एकाग्र हो जाता है, तब वही अवस्था समाधि कहलाती है.
_ समाधि में मन न कुछ चाहता है, न कुछ सोचता है.
_ वहाँ अहंकार की पकड़ ढीली पड़ जाती है और भीतर एक गहरी शांति का अनुभव होता है.
_ यह कोई असाधारण अनुभव पाने की बात नहीं है, बल्कि मन का अपने मूल स्वभाव में लौट आना है.!!
_ ध्यान जहाँ मन को शांत करना सिखाता है, वहीं समाधि उस शांति में पूरी तरह डूब जाने की अवस्था है.!!
– Rahul Kumar Jha
– जब हम ध्यान में होते हैं, उसी क्षण हम एक दूसरे ही व्यक्ति हो जाते हैं । । यदि हम गृहस्थ हैं, तो हम फिर से दोबारा वही गृहस्थ कभी नहीं हो सकते., ध्यान से एक गुणात्मक फरक आ जाता है.

हमारा पूरा भीतरी गुण बदल जाता है । संसार की तरफ हमारा देखने का नजरिया बदल जाता है, यह पहले जैसा ही नहीं बना रहता है ।

  • दूसरा, जैसे ही हम जागृत होते हैं, हमारे में से सभी प्रकार के नकारात्मक संवेदनाएं _ जैसे कि विषाद, संघर्ष, तनाव, ईर्ष्या, धोखा, क्रोध, द्वेष सब समाप्त हो जाते हैं । जिससे हम हल्कापन अनुभव करते हैं , हम बिना किसी बोझ के अनुभव करते हैं,

तीसरा हम जो भी कार्य करते हैं, वह एकदम अलग तरीके से होने लगता है । हमारी चाल बदल जाती है, हमारी ढाल बदल जाती है ।

अभी भी हम फिल्मे देखते हैं, संगीत सुनते हैं, नृत्य करते हैं, लेकिन अब हम फिल्मों को अलग नजरिये से देखते हैं, संगीत में एक अलग मज़ा आने लगता है, और नृत्य करते थकते ही नहीं , क्यूँकी अब सब होश पूर्वक हो रहा है.

– –  अब हम सब कुछ बहुत ही ध्यानपूर्वक या होश पूर्वक सुनना आरंभ करते हैं ।

कई बार कुछ समय के लिए हमारे में एक डर पैदा हो सकता है की हम कहीं पागल तो नहीं हो गए हैं. और डर के मारे, हम पहले की तरह ही फिर से बनना चाहते हैं, यानि फिर से सो जाना चाहते है ।

काम करने की अपनी गति कम हो जाती है, हम इसी संसार के लिए अयोग्य हो जाते हैं,

एक तरह का मजा और साथ में एक तरह का ऊब (Bordam ) दोनों साथ में अनुभव करते हैं ।

– – हम बहुत उर्जा से भर जाते हैं ।

एक और बहुत महत्त्वपूर्ण संकेत है कि हम औरों के लिए कभी कभी परेशानी बन जाते हैं ।

लोग हमें असामान्य व्यक्ति की तरह अपने परिवार में या मित्रों में देखने लगते है… ।

– पहले हम कुछ ऐसा सोचते थे, की ध्यान या जागरूकता से मन को शांति मिलेगी या जीवन में शांति छा जाएगी और हम, फिर स्वयं को, समाज और परिवार के साथ बेहतर तरीके से समायोजित कर सकेंगे, लेकिन तथ्य इसके विपरीत हुआ,

_ अब हमे पुराने मित्रों के साथ ऊब आने लगती है । अब जब हम ध्यान में रहने लगे तो हम पाते हैं कि, हमारे आस – पास के लोग _ वही – वही चीजों के बारे में, बार – बार वही बातें करते रहते हैं, और हम एक ऊब से भर जाते हैं ।

– – इस लिये ध्यान हमारे लिये कोई सांत्वना नहीं बना – हाँ एक दिन निश्चित रूप से, शांति मिलती है, लेकिन बाद में, _

_ और ये शांति से ऐसा नहीं हुआ कि समाज और संसार के साथ समाधान हो गया,

_ लेकिन यह शांति संसार के साथ एक वास्तविक सामंजस्य से मिलती है ।

सदा ध्यानस्थ रहने के लिए ध्यान में जाओ,

_ अगर आप खुद को ध्यान से अलग कर लेंगे तो ..वही पुराना जीवन हावी हो जाएगा.
_ मैं ऐसे कई लोगों से मिलता हूं जो कहते हैं,
_ “जब भी मैं शुष्क, थका हुआ, आदि महसूस करता हूं तो; मैं ध्यान में डुबकी लगाता हूं और नए जन्म की तरह तरोताजा होकर वापस आता हूं.”
— हममें से अधिकांश लोग शांतिपूर्ण, आसान जीवन जीना चाहते हैं.
_ हम वास्तविक परिवर्तन से नहीं गुजरना चाहते.
_ इसलिए, हम कुछ अवसरों पर पवित्र कार्य करते हैं और शेष समय में, हम वही पुराना झूठ जीते हैं ..जो अंततः हमें दोषी बनाता है.!!
— ध्यान का निश्चित रूप से हमारे अस्तित्व पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ता है,
_ लेकिन जैसे ही हम ध्यान से बाहर आएंगे, यह प्रभाव ख़त्म हो जाएगा.
_ तो, अगली बार, जब आप ध्यान में डुबकी लगाएं, तो उस स्थिति को याद रखें..
_ जिसमें आप तब थे ..जब आप गहरे ध्यान में थे, और हमेशा वही बने रहें – यही परिवर्तन का वास्तविक बीज है.
_ जब आप गहरे ध्यान के साथ एक हो जाएंगे – आपकी पुरानी आदतों का चक्र गहराई में डूब जाएगा और आप एक नवजात शिशु की तरह महसूस करने लगेंगे.

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