_ क्योंकि शांति परिस्थितियों की उपलब्धि नहीं है.
_ शांति चेतना की अवस्था है
_ ध्यान हमें यह समझाता है कि हम अपने विचार नहीं हैं.
_ हम अपनी भावनाएँ नहीं हैं.
_ हम अपने भय नहीं हैं.
_ हम अपनी कहानी भी नहीं हैं.
_ इन सबके पीछे एक साक्षी है.
_ एक मौन उपस्थिति.
_ एक ऐसा केंद्र जो कभी घायल नहीं हुआ.
_ एक ऐसी जगह जहाँ कोई संघर्ष नहीं पहुँच सकता.
_ अधिकांश लोग पूरी जिंदगी अपने मन की आवाज़ को ही स्वयं समझते रहते हैं.
_ वे हर विचार पर विश्वास कर लेते हैं.
_ हर डर को सत्य मान लेते हैं.
_ हर कल्पना को वास्तविकता समझ लेते हैं.
_ ध्यान पहली बार उनके और उनके विचारों के बीच दूरी पैदा करता है.
_ और यही दूरी स्वतंत्रता है.
_ जब तुम बैठते हो और अपने भीतर उठते विचारों को देखते हो, तब तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारा मन एक आकाश है.
_ विचार बादल हैं.
_ भावनाएँ मौसम हैं.
_ स्मृतियाँ हवाएँ हैं.
_ लेकिन तुम इनमें से कुछ भी नहीं हो.
_ तुम वह आकाश हो जिसमें यह सब घटित हो रहा है.
_ यही ध्यान का रहस्य है.
_ यह तुम्हें कुछ नया नहीं देता.
_ यह केवल वह हटाता है जो तुम नहीं हो.
_ एक-एक करके पहचानें गिरने लगती हैं.
_ डर ढीला पड़ने लगता है.
_ अहंकार की पकड़ कम होने लगती है.
_ और भीतर एक ऐसी जगह प्रकट होती है जो हमेशा से मौजूद थी.
_ वहाँ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है.
_ कोई तुलना नहीं है.
_ कोई प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं है.
_ वहाँ केवल होना है.
_ शुद्ध होना.
_ यही वह स्थान है जहाँ रचनात्मकता जन्म लेती है.
_ यहीं से प्रेम बहता है.
_ यहीं से करुणा आती है.
_ यहीं से बुद्धि प्रकट होती है.
_ आज का मनुष्य जानकारी से भरा हुआ है, लेकिन स्वयं से दूर है.
_ उसने दुनिया को जीतना सीख लिया है, लेकिन अपने मन को समझना नहीं सीखा.
_ उसने तकनीक बना ली है, लेकिन मौन खो दिया है.
_ उसने गति पा ली है, लेकिन दिशा खो दी है.
_ ध्यान इस खोई हुई दिशा की वापसी है.
_ यह भागने का मार्ग नहीं है.
_ यह वास्तविकता से सामना करने का साहस है.
_ यह किसी धर्म, विचारधारा या विश्वास की संपत्ति नहीं है.
_ यह मानव चेतना की सबसे प्राचीन और सबसे आधुनिक तकनीक है.
_ हजारों वर्ष पहले भी इसकी आवश्यकता थी.
_ आज शायद पहले से अधिक है.
_ क्योंकि शोर बढ़ गया है.
_ विकर्षण बढ़ गए हैं.
_ लेकिन मनुष्य का हृदय अब भी उसी शांति की तलाश में है.
_ और वह शांति किसी पर्वत की चोटी पर नहीं है.
_ किसी पुस्तक में नहीं है.
_ किसी गुरु के शब्दों में नहीं है.
_ वह तुम्हारे भीतर उस स्थान पर है, जहाँ तुमने बहुत समय से जाना बंद कर दिया है.
_ इसलिए प्रतिदिन कुछ समय बैठो.
_ कुछ मत करो.
_ कुछ मत बनो.
_ कुछ मत खोजो.
_ सिर्फ देखो.
_ सिर्फ उपस्थित रहो.
_ सिर्फ श्वास को महसूस करो.
– राहुल कुमार झा

Rahul Kumar Jha