सुविचार – धारणा – 133

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जीवन एक बहुरूपी दर्पण है.

_ हम जो देखते हैं, वह अक्सर हमारी अपनी सोच और अनुभवों का प्रतिबिंब होता है.
_ हम हर व्यक्ति को अपनी धारणाओं के चश्मे से देखते हैं..
_ लेकिन क्या यह धारणा उस व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप होती हैं ?
_ या यह केवल हमारे पूर्वाग्रह और कल्पनाओं का परिणाम होती हैं ?
अनुभूति के आधार पर ही, धारणाएं निर्मित होती है,
विवेक की कसौटी पर कसा विचार ही सच्चा-ज्ञान है.
धारणाएं एक जाल हैं, जिसमें हम खुद को कैद कर लेते हैं.
_ सच वह रोशनी है, जो हर अंधेरे को मिटा सकती है.
गलत धारणा दूसरे को कम, खुद को अधिक पीड़ा पहुंचाती है.
_ अपनी धारणा को सच में तब्दील कीजिए या फिर उसे बदलिए.
किसी भी व्यक्ति के लिए आप जैसा सोचोगे, आप बस वही धारणा बनाओगे.!!
हमारी जो खुद की धारणा होती है हम सिर्फ उसे ही सच मानने लग जाते हैं..

_ और जब उसके विरोध में कोई बात कहता है तो हम उस पर यकीं नहीं करते, चाहे वह सच ही क्यों न हो..
_ और जब कोई छोटी सी भी बात हमारी धारणा के समर्थन में कही जाती है तो हम उस पर तुरंत यकीं कर लेते हैं और खुश हो जाते हैं…!
कुछ लोगों को दूसरों को जज करने में महारत हासिल होती है.

_ अपने गिरेबान में झांकते नहीं और दूसरों की पूरी कुंडली निकाल कर रख देते हैं..
_उनका स्वभाव है ये..
_अपनी धारणाओं से खुद की शांति भंग करते ही हैं, नेगेटिव वाइब्ज दूसरों तक भी भेजते हैं.
_ अपना चैन बनाए रखने के लिए ऐसों को इग्नोर करना बेहतर होता है.!!
लोगों के बारे में एक ही धारणा कायम न कर लें. न ही सबको एक ही तराज़ू में तौलें. – हर परिस्थिति अलग होती है और अलग-अलग परिस्थिति में लोग अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. मन में एक ही बात बैठाकर उसी नज़रिए को सही न मानें.

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