सुविचार – भीड़ – Crowd – 132

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जो सुकून अज्ञात बन कर रहने में है न, वो भीड़ में कहाँ.!![
भीड़ अब सिर्फ जगहों में नहीं, हमारे जीवन में बस गई है –

हर मोड़ पर धक्का, हर कदम पर हुज्जत, हर दिन किसी न किसी अपमान को निगल जाना..
_ लंबी लाइनों में खड़े होना अब मजबूरी नहीं, हमारी नई आदत बन गई है.
_ अजीब बात यह है कि हम इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि यह सब अब असामान्य भी नहीं लगता.
_ मानो भीड़ सहना ही हमारी सबसे बुनियादी शर्त बन गई हो.!!
भीड़ का हिस्सा नहीं, एकांत की ताकत बनो ;
_ जहां कद्र ना हो, वहां खामोश रहना ही जीत है.!!
दूर तलक देखो तो भीड़ ही भीड़ है..

_नजदीकियां तो वीरानियों से पटी पड़ी हैं.!!
पता नहीं भारत मे कब भीड़ वाली जगहों पर टोकन सिस्टम फ़र्स्ट कम फ़र्स्ट सर्व बेसिस पर बांटना और उसके बेसिस पर लोगों को अटेण्ड करना स्टार्ट किया जाएगा.

_ इतनी विशाल जनसंख्या है, आधे लोग सिविक सेंस को फॉलो करने वाले और आधे एकदम जाहिल टाइप हैं.
_ आधे जाहिल टाइप के चक्कर मे जो लोग ठीक हैं वो परेशान होते रहते हैं, यदि वो नियम से चल भी लें तो जाहिल वाले उनको ये सिखा ही देते हैं कि तुम मूर्ख हो.
_ चाहे अस्पताल जाओ, बैंक जाओ, किसी भीड़ वाले सरकारी विभाग मे जाना पड़े, किसी टिकट बुकिंग काउंटर पर जाना पड़े, भीड़ वाले मंदिरों मे जाना पड़े या ऐसे ही तमाम विभागों मे पता नहीं क्यूँ टोकन सिस्टम से बैर हो रखा है.
_ खिड़की पर बैठा क्लर्क ये चेक नहीं कर सकता कौन बीच मे से घुस के आ गया है और जनता दबंग लोगों से खुद नहीं लड़ सकती.
– ज्यादातर जगहों के प्रशासनिक व्यवस्थापक अकुशल, अकर्मण्य और कामचोर प्रतीत होते हैं.
_ ज्यादातर जगहों की भीड़ की वजह से होने वाली अव्यवस्था को सिम्पल टोकन सिस्टम फॉलो करके और उसके सिरियस इम्प्लिमैनटेशन से सॉल्व किया जा सकता है. _ यदि चीजें क्रम से चलें तो ज्यादातर लोगों को भले कहीं 10 घंटे भी लाइन मे लगना पड़े तो आपत्ति नहीं होगी, लेकिन हमारे देश का इस चीज से बैर है.
_ मजाल जो इस देश मे कहीं टोकन देने और उसी क्रम मे लोगों को अटेण्ड करने की मशीन शत प्रतिशत लंबे समय तक काम करती दिख जाये.
_ इक्का दुक्का कहीं चल भी रहा होगा तो वहाँ सिस्टम बेहतर प्रतीत भी होता होगा.
_ इस काम के लिए कोई बहुत भारी भरकम तकनीक की जरूरत भी नहीं है, आप कहीं पर भी भीड़ को हैंडल करते हैं तो सिम्पल कुछ कागज के टुकड़े लें, उनपर क्रम से नंबर लिखें और सुबह गिनती 1 से शुरू कर बाँट दें और लोगों को उसी क्रम से आने को कहें, बस इतना सा बदलाव ज्यादातर भीड़ वाले offices के अनुभवों को बदल कर रख देगा.
_ लेकिन ऐसा लगता है हम लोगों ने गणित मे जीरो दिया फिर दुनिया को गिनती आई, लेकिन हम लोगों ने गिनती के हिसाब से खुद काम करने का प्रयास नहीं किया.
_ हम जीरो देने के बाद गिनती के हिसाब से खुद कोई काम नहीं कर रहे.
– Anurag Tiwari

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