वे प्रश्न, जिन पर हम रोज़ जीते हैं, लेकिन रुककर बहुत कम सोचते हैं..
_ मुझे लगता है, यही वे प्रश्न हैं.. जिन्हें इंसान हर दिन जीता है, लेकिन उन पर रुककर बहुत कम सोचता है.
कुछ ऐसे प्रश्न हैं :-
अगर कोई व्यक्ति इस एक प्रश्न पर भी ईमानदारी से विचार कर ले, तो उसके जीवन के कई निर्णय बदल सकते हैं.
_ मैं जो कर रहा हूँ, क्या सचमुच वही करना चाहता हूँ, या बस सबको करते देखकर कर रहा हूँ ?
_ क्या मैं जीने की तैयारी कर रहा हूँ, या सचमुच जी भी रहा हूँ ?
_ क्या मैंने घर खरीदा है, या घर ने मेरा जीवन खरीद लिया है ?
_ मैं पैसा कमा रहा हूँ, या पैसा कमाने की प्रक्रिया ही मेरा जीवन बन गई है ?
_ मुझे वास्तव में कितना पर्याप्त चाहिए ?
_ क्या मैं अपनी खुशी खरीद रहा हूँ, या सिर्फ़ अपनी इच्छाएँ बढ़ा रहा हूँ ?
_ क्या मुझे सचमुच इतनी चीज़ों की ज़रूरत है, या मैंने सिर्फ़ उनकी आदत बना ली है ?
_ मैं लोगों से प्रेम करता हूँ, या उनसे अपेक्षाएँ रखता हूँ ?
_ क्या मैं लोगों को जैसा वे हैं वैसा स्वीकार करता हूँ, या उन्हें अपनी अपेक्षाओं के अनुसार बदलना चाहता हूँ ?
_ मैं दूसरों की नज़रों में अच्छा दिखना चाहता हूँ, या अपनी नज़रों में शांत रहना चाहता हूँ ?
_ अगर मुझे किसी को कुछ साबित नहीं करना हो, तो मैं अपनी ज़िंदगी में क्या बदल दूँगा ?
_ मैं निर्णय अपने डर से ले रहा हूँ या अपनी समझ से ?
_ क्या मैं खुश रहने के लिए जी रहा हूँ, या पहले सब कुछ ठीक हो जाने का इंतज़ार कर रहा हूँ ?
_ मैं जो बचा रहा हूँ, उसका उपयोग कब करूँगा ?
_ अगर मेरे पास समय ही नहीं बचा, तो मैं यह सब किसके लिए इकट्ठा कर रहा हूँ ?
_ मैं अपने बच्चों के लिए संपत्ति छोड़ना चाहता हूँ, या उन्हें ऐसा जीवन-दर्शन देना चाहता हूँ जिससे वे स्वयं खड़े हो सकें ?
_ क्या मैं अपने अतीत को समझकर जी रहा हूँ, या उसी को बार-बार दोहरा रहा हूँ ?
– “क्या मैं जिस समस्या को हल करने में पूरी ज़िंदगी लगा रहा हूँ, वह सचमुच मेरी समस्या है भी, या मैंने उसे बिना जाँचे समाज से उधार ले लिया है ?”
– शायद इनमें से किसी एक प्रश्न का ईमानदार उत्तर भी
हमारे जीवन के कई फैसलों को बदल सकता है.



