कभी-कभी यूँ ही चलते चलते मैं अचानक ठहर जाता हूँ.
_ न जाने क्यों कदम अपने आप रुक जाते हैं, और भीतर कहीं से एक सवाल उभर आता है.. आख़िर जाना कहाँ है ?
_ क्या कोई निश्चित मंज़िल है, या ये रास्ते ही मंज़िल बन जाते हैं ?
_ ज़िंदगी भी तो एक अनवरत यात्रा है, जहाँ हर ठहराव हमें सोचने पर मजबूर करता है .. कि हम जिस ओर बढ़ रहे हैं, वह सच में हमारा होना चाहिए या नहीं..
_ शायद पहुँच जाना कहीं दूर नहीं, बल्कि सही दिशा में बढ़ते रहना ही असली पहुँच है.!!





