हम ही अपने रोज़मर्रा के विचारों से – अपनी इच्छाओं, अपने आकर्षण – विकर्षण और अपनी पसंद- नापसंदगी से अपनी नियति का निर्माण करते हैं.
दरअसल, हमारी पसंदीदा चीज़ें ही हमारी हद और सीमाओं को बयान करती हैं,
_ वे हमें बताती हैं कि हमने अब तक उससे बेहतर कुछ देखा ही नहीं, कभी जिया ही नहीं, और शायद महसूस भी नहीं किया…!
इंसान पसंद नहीं आते हुए भी बहुत कुछ करता है.
_ पसंद न आते हुए भी उसी जगह पूरी जिंदगी निकाल देता है.
_ सब कुछ इंसान की पसंद से होता भी कहां है ?






