सही फैसला लेना काबिलियत नही है,
_ फैसला लेकर उसे सही साबित करना काबिलियत है…
‘सही फैसला वही’ जो लिया जाए, वरना हर ऑप्शन [option] सिर्फ सोच ही बना रहता है.
अगर किसी फैसले के बाद हर दिन आपको खुद को ही तर्क देकर समझाना पड़ रहा है, तो समझ लेना कहीं ना कहीं चूक हो गई है.
_ क्योंकि सही फैसले बार-बार सफाई नहीं मांगते, वो भीतर एक अजीब सा सुकून छोड़ जाते हैं.!!
हर इंसान अपनी आदत से चल रहा है, पर कोई भी फैसला हमें अपनी समझ से लेना चाहिए.
_ फैसला ज़ज़्बात में नहीं, समझ के साथ होना चाहिए
कोई भी फैसला दबाव और जल्दबाज़ी में लेना संभव नहीं होता, क्योंकि कुछ फैसले ऐसे होते हैं.. जिनमें वापस लौटने की कोई गुंजाइश नहीं बचती.
_ इंसान अक्सर फैसले से नहीं, बल्कि उसके बाद बदल जाने वाली पूरी ज़िंदगी से डरता है, क्योंकि कुछ मोड़ सिर्फ एक बार आते हैं.!!
कई बार कुछ फैसले हमारे सामने लिए जाते हैं.
_ उस समय न तो हमें उनकी पूरी समझ होती है और न ही उन्हें बदल पाने की क्षमता..
_ हम बस उन्हें घटित होते हुए देखते रहते हैं, लेकिन वर्षों बाद, जब उन्हीं फैसलों के दुष्प्रभाव सामने आते हैं, तब समझ तो आ जाती है..
_ पर अक्सर कुछ बदल सकने का अवसर हाथ से निकल चुका होता है.!!




