सुविचार 2029
इस “आरंभ और अंत” के बीच का समय भरपूर हास्य भरा हो.
..बस यही सच्चा जीवन है.
इस “आरंभ और अंत” के बीच का समय भरपूर हास्य भरा हो.
..बस यही सच्चा जीवन है.
मनुष्य जैसी संगति करता है, जैसे वातावरण और माहौल में रहता है, जैसे विचार करता है, जैसा जैसे विचार सुनता है वैसे ही संकल्प करने लगता है, वैसा ही आचरण करने लगता है और जैसा आचरण करता है, फिर वैसा ही उसका रूप और स्वभाव बन जाता है. जिन बातों का बार-बार विचार करता है, धीरे-धीरे वैसी ही इच्छा हो जाती है, फिर उसी के अनुसार वार्ता, आचरण, कर्म और गति होती है.
उनको जीवन भर दूसरों की थाली की केवल झूठन ही मिलती है..
तो वो नफरत का नही दया का पात्र होता है,
क्योंकि कोई भी समझदार इंसान कभी किसी को दुख नही दे सकता.
हम क्यों किसी के बारे में बुरा सोच कर अपना “वक्त” और “कर्म” खराब करें..
मैं उनके कारण क्रोधित हूं…मैं उनके कारण खुश हूं…
हम अपने जीवन को, अपने आप की भावनाओं को,
दूसरों के द्वारा संचालित होने पर निर्भर कर देते हैं,
आप स्वयं अपनी भावनाओं के निर्माता हैं,
इसलिए दूसरों पर निर्भर न रहें..