सुविचार 730

 अक्सर मनुष्य का आचरण दूसरों की अपेछाओं के दबाव के कारण सहज नहीं रह जाता. हम अपनी सोच को अथवा अपने विचारों को पहले दूसरों की आशाओं के तराजू में तोलते हैं और फिर उन्हें प्रस्तुत करते हैं. हम हर विषय पर सोच- विचार कर वही प्रतिक्रिया देते हैं जिसकी हमसे उम्मीद की जाती है, न कि वो जो हमारे अंदर स्वभावतः आती है. और इस प्रकार हम धीरे- धीरे एक झूठा आवरण ओढ़ लेते हैं जिसके पश्चात हम अपना नैसर्गिक स्वभाव भी खो देते हैं. अपेछाओं का जंजाल उस दलदल की भांति है जिसमे यदि मनुष्य फंस जाये तो फिर उस से बाहर आना मुश्किल हो जाता है. यह ध्यान दें कि कहीं आप इस दलदल में पैर तो नहीं दे रहे ? कोशिश करें कि आप अपने स्वाभाविक व्यवहार को बनाये रख सकें.

सुविचार 729

अगर किसी में गुण होंगे तो वे अपने आप सामने आ जायेंगे. कस्तूरी को अपनी उपस्थिति कसम खा कर नहीं साबित करनी पड़ती.

सुविचार 727

चिंता को रोकने का सब से उत्तम तरीका है रूचि या शौक. चाहे वह संगीत हो या किताबें पढ़ना या यात्रा करना, उसे पूरा करें. इस से आप अनावश्यक चिंताओं से बचे रहेंगे.

सुविचार 726

किसी की भी जिंदगी एक खुली किताब है……… जिसमे दर्ज है सब कुछ. हार- जीत, उतार- चढ़ाव, यश- अपयश, नफरत- मोहब्बत. हमारे सारे कार्यकलाप, सुख और संताप,   हमारा जीवन केवल हमारा नहीं अपितु परिवार का, समाज का और देश का भी है. हमारे कार्यकलापों से ये सभी प्रभावित होते हैं. हमारे सद्कर्म इनका यश बढ़ाते हैं, तो दुष्कर्म इन्हें कालिमा से ढक देते है……………अतः हमारा आचरण महत्वपूर्ण है.

सुविचार 725

सत्य शेर की तरह होता है, इसे बचाने की जरुरत नहीं है ;

इसे खुला छोड़ दो _ यह अपना बचाव खुद कर लेगा..

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