सुविचार – आख़िर जीवन इतना कठिन क्यों है ? – 252

आख़िर जीवन इतना कठिन क्यों है ?

_ क्योंकि जीवन हमें हर पल सिखाने के लिए बना है, सुख देने के लिए नहीं..
_ हर कठिनाई में एक गुप्त पाठ छिपा होता है — जो हमें भीतर से और सच्चा, और गहरा बनाता है.
_ कठिनाई तब तक कठिन लगती है, जब तक हम उसे बाहरी दृष्टि से देखते हैं.
_ पर जब भीतर से देखने लगते हैं — वही दर्द बोध बन जाता है, वही संघर्ष साधना बन जाता है.
“जीवन कठिन नहीं, वह हर पल हमें सिखाता है.”

सुविचार – काश………कि……मै इंसान न होता. – 251

काश…………….कि……….मै इंसान न होता.

खुद से फिर अनजान न होता.
क्यों आया इस धरा पर मै.
सोच – सोच परेशान न होता.
तन की काया मन की माया.
घर वाले और बाहर वाले.
कितने टुकड़े करूँ मै खुद के.
करूँ मै खुद को किस के हवाले.
इसलिए मै अक्सर ही,
सोचा ये करता हूँ कि………..
कि काश कि मै होता एक पंछी.
फिर मुझे कोई रोक न पाता
सरहद के उस पार भी मै.
अपनी मरजी से जा पाता.
मिलता वहाँ मै सब से पर,
जंग की कोई बात न करता.
प्रेम के गीत उन्हें सुना कर.
अपने घर में आ जाता.
या काश कि मै होता एक वृच्छ……
देता सब को शीतल छाया.
भेद- भाव ना किसी से करता.
क्या अपना और क्या पराया.
पथिक जो मेरे पास आता.
सब को मीठे फल मै देता.
बदले में कुछ भी न लेता.
और काश कि मै होता एक बूंद……
तृष्णा किसी की मिटा तो पाता.
तृप्ति भले न कर पाता पर,
काम तो कुछ पल आ जाता.
और काश मै होता…..
काश कि होता एक कोरा पन्ना.
कोई मुझ पर तो कुछ लिख पाता.
वेद, पुराण और ग्रन्थ न सही,
एक छोटी- सी कविता ही.
जिसे पढ़ कर प्रेरित तो कुछ लोग होते.
और मै एक प्रेरक अंश बन जाता.
और भूल वश गर जुड़ जाता मै,
इतिहास के पन्नों संग.
फिर कोई तमन्ना शेष न होती,
क्यों कि…………………….
युगों तलक मै अमर हो जाता.
काश………कि……मै इंसान न होता.

सुविचार – मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि… – 250

मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…

_ किसी का दिल जीतने के लिए बहुत कठोर प्रयास करना, समय और ऊर्जा की बर्बादी है और यह आपको कुछ नहीं देता, केवल खालीपन से भर देता है.
_ मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…
जवाब नहीं देने का अर्थ यह कदापि नहीं कि यह सब मुझे स्वीकार्य है, बल्कि यह कि मैं इससे ऊपर उठ जाना बेहतर समझता हूँ.
_ मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…
कभी-कभी कुछ नहीं कहना सब कुछ बोल देता है.
_ मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…
किसी परेशान करने वाली बात पर प्रतिक्रिया देकर, आप अपनी भावनाओं पर नियंत्रण की शक्ति किसी दूसरे को दे बैठते हैं.
_ मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…
मैं कोई प्रतिक्रिया दे दूँ, तो भी कुछ बदलने वाला नहीं है इससे लोग अचानक मुझे प्यार और सम्मान नहीं देने लगेंगे.
यह उनकी सोच में कोई जादुई बदलाव नहीं ला पायेगा।
_ मैं धीरे-धीरे सीख रहा हूँ कि…
जिंदगी तब बेहतर हो जाती है, जब आप इसे अपने आस-पास की घटनाओं पर केंद्रित करने के बजाय उस पर केंद्रित कर देते हैं, जो आपके अंतर्मन में घटित हो रहा है.
_ आप अपने आप पर और अपनी आंतरिक शांति के लिए काम करिए और आपको बोध होगा कि….
चिंतित करने वाली हर छोटी बड़ी बात पर प्रतिक्रिया नहीं देना, एक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन का ‘प्रथम अवयव’ है.
जीवन हर कदम पर हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है.

_ यह हम पर निर्भर करता है कि या तो हम उसे अपना लें या फिर अनदेखा करके आगे बढ़ जाएं.. यह हमारे हाथ में है.!!

सुविचार 249

बहुत से कामों को पूरा करने का सब से आसान तरीका है, एक समय में एक काम को ही हाथ में लेना.

सुविचार 248

आप के आस पास के जो लोग नकारात्मक सोच रखते है. आप यह पक्का फैसला कर लें कि उन से सिर्फ ” हाय हैल्लो ” तक ही वास्ता रखेंगे, क्योंकि ऐसे लोग आप की सोच को भी अपने जैसा ही बना देंगे. अपने या किसी के भी बारे में नकारात्मक सोच रखने से आदमी कभी भी जीवन के प्रति उत्साहित नजर नहीं आएगा बल्कि उसे हर चीज दुखी व गलत नजर आएगी. जबकि सकारात्मक सोच वाले लोगों से आप हर पल कुछ न कुछ सीखेंगे और अपने को सफल बनाने के लिए हमेशा कोशिश करेंगे .

सुविचार – “”चमकीले पॉलिश्ड लोग”” – Shiny polished people – 247

“”चमकीले पॉलिश्ड लोग””

_ इनके पास तमाम विमर्श होते हैं, तमाम बातें जिनमें दुनिया भर का साहित्य होता है, सिनेमा होता है, कला होती है और होते हैं तमाम व्यंजनों, शराबों की बातें..
_ इनका पहनावा, इनके चलने फिरने, उठने बैठने के ढंग बेहद नफीस होते हैं और इनकी दोस्तियां बड़े और सम्मानित लोगों से होती हैं..
_ वह नाम जो आम नहीं ख़ास होते हैं.. उनके साथ इनका घरदारी का रिश्ता होता है,
_ वह चेहरे जो पेज थ्री पर दिखते हैं.. उनके साथ इनके याराने होते हैं..
_ कैसी झिलमिल सी हँसी होती इनकी, कैसा सुबुक सा रंग पहनते ये लोग..
_ कैसी तो क्राकरी, कैसी तो सजावट, कैसी तो कपड़ों की क्रीज होती इनकी….
_ इन्हें सुबह देखो तो ये सूरज से दमकते दिखते और सांझ में देखो तो सितारों से चमकते लगते.. इनमें आभा है, क्लास है, ग्रेस है..
_ इनकी दोस्तियों के लिए वजहें होनी चाहिए दुश्मनियां भले बेवजह हों इनकी..
_ इनका एक मजबूत इनर सर्कल होता है जिसको भेदा नहीं जा सकता
_ भले उसके बाहर खड़े होकर इन्हें देख देख मुग्ध हुआ जा सकता है, ताली बजाई जा सकती है, घबराया जा सकता है.
_ इनके साथ होने, इन्हें छूने, इनका दोस्त कहलाने के लिए बहुत सारे लोग प्रयासरत रहते हैं – पर यह नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते..
_ यह हर जगह दिखेंगे वह चाहे सोशल मीडिया हो, चाहे साहित्यिक कार्यक्रम या कि सांस्कृतिक कार्यक्रम हो..
_ इनके गिर्द भीड़ होती है फॉलोअर की, प्रशंसकों की और एक दृष्टि अनुकम्पा की चाहने वालों की..
_ यह मृदुभाषी होते, मितभाषी होते हैं..एक पल यूं तपाक से मिलेंगे.. जैसे आप बचपन के बिछड़े सखा हों..
_ दूसरे पल यूं उकताए दिखेंगे.. जैसे आपने कुछ कीमती चीज मांग ली हो..
_ यह चमकते पॉलिश्ड लोग स्त्री भी हो सकती हैं और पुरुष भी..
_ यह जितना बोलकर हर्ट नहीं करते.. उतना अपनी सेलेक्टेड चुप्पियों से वार करते हैं..
_ आम लोगों को इनसे एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखनी चाहिए..
_ क्योंकि सितारे दूर से ही भले लगते हैं.. वह हथेली पर आते ही अंगारे बन जाते हैं..
_ मेरा ठीक है.. मैं खुद में ही डूबा रहता हूं, दुनिया के नज़ारे मेरे लिए अर्थहीन हैं..!!
– Mamta Singh
सौंदर्यबोध के लिए मन की रईसी चाहिए,

_ जब जीवन में सादगी हो, उल्लास हो, उत्सुकता हो, प्रकृति से साहचर्य हो तथा कलाकारों की सुहबत हो तभी सौंदर्यबोध पनप सकता है…
_ पहले जनजीवन में सादगी थी और सादगी का सौंदर्य था..मेहनत थी और उससे उपजा सुख था..
_ कच्ची ज़मीन को लीपकर और दीवारों को तालाब की चिकनी मिट्टी से पोतकर घर चमकाए जाते थे..
_ आले, ताखों के कटाव में ग़ज़ब का सौंदर्य होता था और खिड़की-दरवाज़ों की नक्काशी मोहक…
_ अब पक्के मकानों में वॉल पुट्टी से चिकनी दीवारों पर महंगे पेंट और प्लाई के डिजाइनर दरवाज़ों को देखकर मन में अजीब सी अरुचि उत्पन्न होती है..
_ तिसपर रही सही कसर प्लास्टिक के फूलों से पूरी हो जाती है..
_ अपने आसपास देखता हूँ तो अधिकारी, अध्यापक, व्यापारी, नेता सब दिखते हैं..
_ पर कोई चित्रकार, संगीतकार, नर्तक, मूर्तिकार नहीं दिखता…जो लेखक हैं उन्हें कोई नहीं जानता…
_ इतनी बड़ी जनसंख्या में कलाओं के प्रति उपेक्षा और मानसिक दरिद्रता के ही कारण कोई कलाकार नहीं उपजता..
_ हालांकि बड़े से बड़े रईस, बाहुबली, राजे महाराजे अभी भी शान से यहाँ पूजे जाते हैं.!!
– Mamta Singh
कुछ लोगों का जीवन झूठ और बड़बोलेपन से भरा होता है..

_ झूठ भी ऐसा कि जो आदत में शुमार हो और बिना ज़रूरत बोला जाता हो…
_ व्यक्तित्व पर, चेहरे पर, विचार पर, व्यवहार पर जब झूठ की परत चढ़ी हो तो एक झूठ को जस्टिफाई करने, छुपाने के लिए सौ झूठ और बोलने पड़ते हैं…
_ हालांकि सभी को चाहे अनचाहे कई बार झूठ बोलना ही पड़ता है, इसलिए इसे आपदा में भी बोलते हुए कोशिश करनी चाहिए कि झूठ आदत में शुमार न हो पाये..
_ मुझसे जो लोग आदतन झूठ बोलते हैं, भले दिखने की झूठी कोशिश करते हैं और यह समझते हैं कि मुझे उनका झूठ, फरेब समझ में नहीं आता तो यह उनकी भूल है..
_ मैं समझती सब हूँ पर ज़ाहिर इसलिए नहीं करती कि सामने वाले को शर्मिंदगी होगी…
_ मेरा जीवन सरल और सादा है इसलिए मुझे इसमें जोड़तोड़ करने, मैं जो नहीं हूँ उसे दिखाने, जताने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती सो इसमें झूठ की भी गुंजाइश न्यूनतम रहती है…
_ चालाकी, कुटिलता, कृपणता, झूठ, दिखावा, अहम, दोहरा तिहरा व्यक्तित्व, मीठी चापलूसी भरी वाणी यह सब मेरे सिलेबस के बाहर के विषय हैं, जो इनमें डॉक्टरेट हैं उन्हें उनकी मेधा मुबारक…
– Mamta Singh
किसी भी इंसान की लोकप्रियता की शुरुआत तेज़ चमक और शोर से होती है,

_ हर तरफ नाम और तारीफ.. लेकिन वक्त के साथ वही चमक धीमी पड़ जाती है,
_ भीड़ छंटने लगती है और अंत ऐसा होता है, जैसे कोई थका हुआ इंसान आख़िरी सांसें ले रहा हो.. खामोश, शांत, और लगभग भुला हुआ.!!
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