सुविचार- “कि कोई सुने… कोई जाने…” – 287

आप कितने भी अच्छे क्यों न हो, _ऐसा कभी नहीं होगा कि आपसे सब खुश हों.!!
“कि कोई सुने… कोई जाने…”

_ बहुत-सी बातें थीं मेरे मन में.
_ ऐसी बातें जो कभी किसी से कही नहीं जा सकीं.
_ ऐसा नहीं था कि उन्हें कहने की हिम्मत नहीं थी, बस किसी पर इतना भरोसा नहीं बन पाया कि शब्द अपने आप बाहर आ जाएँ.
_ कई बार लगता था, शायद बिना कहे ही कोई समझ जाएगा.
_ शायद मेरी आँखें, मेरी चुप्पी, मेरी झुकी हुई निगाहें वह सब कह देंगी जो मैं कह नहीं पा रहा.
_ लेकिन ऐसा कभी हुआ नहीं.
_ मेरे भीतर अक्सर एक तूफ़ान उठता था.
_ बाहर से सब सामान्य दिखता, पर भीतर जैसे कुछ लगातार टूटता, बनता और बिखरता रहता.
_ चेहरे पर मुस्कान रहती, बातें भी होतीं, दिन भी गुजरते रहे –
पर जो सबसे ज़्यादा सच था, वही अनकहा रह गया.
_ मैं इंतज़ार करता रहा उस एक क्षण का,
जब कोई मेरी ख़ामोशी को सुन लेगा.
_ जब कोई समझेगा कि हर चुप्पी शांति नहीं होती ;
कुछ चुप्पियाँ अपने भीतर बहुत शोर छुपाए रहती हैं.
_ मन करता था कि कोई ऐसा कंधा मिले, जहाँ सिर रखकर मैं अपने सारे बोझ उतार सकूँ.
_ जहाँ मुझे अपने शब्दों को साबित न करना पड़े.
_ जहाँ समझे जाने के लिए बोलना आवश्यक न हो.
_ लेकिन धीरे-धीरे एक बात समझ आने लगी –
ज़्यादातर लोग सुनते कम हैं,
_ लोग ऊपरी बातों में और अपनी-अपनी कहानियों में अधिक व्यस्त रहते हैं.
_ उन्हें चेहरा दिखाई देता है, पर पढ़ना नहीं आता उसकी दरारों को.
_ तब मन में दुनिया से एक छोटा-सा गिला जन्म लेने लगा.
_ कोई बड़ा आरोप नहीं, बस एक मासूम-सी शिकायत –
_ कि इतने लोगों के बीच भी कोई ऐसा क्यों नहीं मिला, जो सचमुच देख पाता ?
_ फिर एक दिन लगा,
शायद हर भावना का कोई श्रोता होना ज़रूरी नहीं.
_ कुछ बातें कहे जाने के लिए नहीं, समझे जाने के लिए जन्म लेती हैं.
_ और जब उन्हें कोई नहीं समझता, तो वे धीरे-धीरे भीतर की ख़ामोशियों में अपना घर बना लेती हैं.
_ अब भी कभी-कभी मन चाहता है –
कि कोई सुने… कोई जाने…
_ लेकिन अब यह चाह पहले जैसी बेचैन नहीं रही.
_ शायद इसलिए कि समय ने सिखा दिया है –
कुछ रास्ते हमें दूसरों के साथ नहीं, अपने भीतर अकेले तय करने होते हैं.
_ और वहाँ,
जहाँ शब्द साथ छोड़ देते हैं,
ख़ामोशी धीरे से हमारा हाथ थाम लेती है.!!

सुविचार – Bamboo – 285

Lucky Bamboo के साथ..

_“जो अनावश्यक है, मैं उसे छोड़ रहा हूँ.”
_ “जो सादा है, वही मेरे लिए पर्याप्त है.”
_ “कम में पनपना भी एक कला है.”
_ “सीधा होना ज़रूरी नहीं, जीवित होना ज़रूरी है.”
_ “जो टिकता है, वही सच में बढ़ता है.”
_ “मैं भी थोड़ा-सा बाँस हूँ..- झुकता, पर रुकता नहीं.”
_ यह पौधा यह नहीं सिखाता कि और क्या बनना है,
_ यह याद दिलाता है कि
क्या छोड़ देने से भी जीवन हल्का हो सकता है.!!

सुविचार 284

अगर आपके मन में गड़बड़ है तो, उसको ठीक करने की जिम्मेदारी भी आप ही को उठानी होगी.

सुविचार – Altu-faltu Baatein – आलतु–फालतू बातें – 283

सबसे ज़्यादा altu-faltu बातें वो होती हैं, जो सुनने में ज़रूरी लगती हैं पर ज़िंदगी में कुछ जोड़ती नहीं.

जैसे –
_ लोग क्या कहेंगे — बिना ये देखे कि वो लोग खुद क्या और कैसे जी रहे हैं ?
_ तुलना [Comparison] — किसी और की reel से अपनी real life तौलना.
_ स्टेटस [Status] और image [इमेज ] की चिंता — जबकि अंदर सब बिखरा है.
_ Future का बेकार anxiety — जिस पर हमारा control ही नहीं.
_ Past को बार-बार घूमना — जिससे कुछ सीखा नहीं जा रहा.
_ हर बात पर opinion देना — बिना experience के.
_ Busy दिखना — productive होने के नाम पर.
_ झूठी positivity — जब अंदर सब थका हो.
_ ज़रुरत से ज़्यादा समझना — लोगों को समझना ही नहीं चाहते.
Altu-faltu बात की पहचान simple है :
_ जो आपको ज्यादा शोर दे, पर जरा-सी भी स्पष्टता [clarity] न दे.
_ मेरे जैसे लोग अक्सर इसी शोर से थक जाते हैं..-
_ इसलिए ये कम बोलते हैं, गहरा सोचते हैं, और बेकार बातों से स्वाभाविक [naturally] रूप से दूर हो जाते हैं.!!

सुविचार 282

जो सब से ज्यादा व्यस्त है वह ही सब से अधिक समय निकाल सकता है. सुस्त व कामचोर ही हमेशा समय की कमी का रोना रोते रहते हैं.

 

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