सुविचार – यात्रा के लिए सलाह/टिप/ट्रिक – advice/tip/trick for travelling – 066

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सफ़र में खुद की ही सारी तैयारी रखनी चाहिए, _ किसी के भरोसे नहीं रहा जा सकता.
1. Do a detailed research on the specific location

विशिष्ट स्थान पर विस्तृत शोध करें.
2. Carry map (in print out version) नक्शा साथ रखें ( प्रिंट आउट संस्करण में )
3. Be aware of crimes that happens in that area
उस क्षेत्र में होने वाले अपराधों से अवगत रहें.
4. Carry Tripod – Tripod ले जाना.
5. Keep money in separate places पैसों को अलग-अलग जगहों पर रखें.
Carry travel card, avoid carrying much cash.

ट्रैवल कार्ड कैरी करें, ज्यादा कैश ले जाने से बचें.
6. Book accommodation before the trip यात्रा से पहले आवास बुक करें.
7. Be alert always हमेशा सतर्क रहें.
8. At last take care of your belongings. अंत में अपने सामान का ख्याल रखना.
What’s your best advice/tip/trick for solo travelling?
1. Don’t plan too much ahead. बहुत आगे की योजना न बनाएं.
2. Socialize with locals and get to know the local culture. If you want to eat Indian food, do it in India.
स्थानीय लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाएं और स्थानीय संस्कृति को जानें। अगर आप भारतीय खाना खाना चाहते हैं, तो इसे भारत में करें.

3. Meet other travelers, exchange experiences, and even join some of them on the next day excursion.
अन्य यात्रियों से मिलें, अनुभवों का आदान-प्रदान करें, और उनमें से कुछ को अगले दिन भ्रमण पर भी शामिल करें.
4. Travel light. यात्रा प्रकाश
5. Use public transportation. सार्वजनिक परिवहन का प्रयोग करें.
6. Respect the local culture/ rules even if it doesn’t go down smoothly with your bundle of values and habits.
स्थानीय संस्कृति/नियमों का सम्मान करें, भले ही वह आपके मूल्यों और आदतों के बंडल के साथ आसानी से नीचे न जाए.
7. Lower your expectations, you’ll only enjoy more.
अपनी अपेक्षाओं को कम करें, आप केवल अधिक आनंद लेंगे.
Long journey by Car

अगर कोई कार से लंबा सफर तय करते हैं, तो उन्हें इन जरुरी चीजों को रखने की जरुरत है….
कार की सर्विसिंग की हुई हो,
फुल टैंक पेट्रोल या डीजल भरा होना,
ड्राइविंग लाइसेंस (खैर आजकल तो Digilocker App है, जिसे सरकारी मान्यता प्राप्त है, उसमें सारे ज़रुरी कागज रखे जा सकते हैं।)
गाड़ी की PUC वैलिड होोनी चाहिए,
गाड़ी की इंश्योरेंस के पेपर,
बिना सीट बेल्ट लगाए आगे की सीट पर‌ न बैठें। ड्राइवर के अलावे बगल वाली सीट पर बैठने वाले भी सीट बेल्ट जरूर लगाएँ।
गाड़ी में फास्ट टैग होना चाहिए with balance,
क्रेडिट कार्ड, और कैश,
बच्चे साथ में हैं तो उनकी पसंद का खाने-पीने का सामान, पानी, कुछ घर के बने नाश्ते,
पॉली बैग जिसमें कचरा जमा करके रख सकें,
मास्क और सैनीटायजर‌,
गूगल मैप एक्टिव होने के बावजूद भी रोड पर लिखे गए डायरेक्शन पर भी जरूर ध्यान दें, वरना गूगल मैप कभी – कभी लंबे चक्कर कटवा देता है।
कुछ जरुरी दवाइयाँ जैसे- पेरासिटामोल, उल्टी बंद होने की दवा, सर्दी से बचने की दवा रखना, साथ ही किसी की जरुरी दवा जो खाते हैं, वो रखना चाहिए।
एक एक्स्ट्रा हवा भरी हुई टायर ( स्टेपनी), और जैक जो हर कार में होता ही है।
जब भी ऐसा लगे कि गाड़ी चलाकर थकान हो रही है तो कहीं रूककर चाय कॉफी पीना सही है।
पानी हमेशा पीते रहना चाहिए।
बस ! हो गई तैयारी सफर‌ पर जाने की।
कुछ छूट गया हो तो सुझाव आमंत्रित है।
तीन बिंदुओं पर संक्षिप्त जानकारी दें :-
किसी भी होटल या रेस्टोरेंट का सम्पूर्ण नाम लिखें जिसे गूगल मैप में ढूंढ सकें, साथ ही किराया, खाने के खर्च पर भी प्रकाश डालें.
ये इस तरह हों:
स्थान का परिचय, मौसम कैसा था, क्या क्या देखने योग्य है, लोकल घूमने के लिए किस सवारी का उपयोग बेहतर है और सवारी में क्या खर्च आया.
ठहरने की सुविधा: आप कहां ठहरे और क्या खर्च आया और अन्य सुविधाएं क्या थी.
खाने की सुविधा: आपको किस रेस्टोरेंट में खाना अच्छा लगा और क्या खर्च आया.
_ और वहां के कुछ नामी गिरामी जायेके का नाम, स्थान की जानकारी क्या है इसे दें.
__ ( जैसे प्रसिद्ध चाट, लस्सी, थाली, मिठाई आदि जो उस जगह का फेमस जायका हो )
उपरोक्त तीनों प्वाइंट की संक्षिप्त जानकारी दें.

सुविचार – यात्रा – घुमक्कड़ी – घूमना – 065

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जीवन में यात्रा करना एक अलग ही सुंदर अनुभव होता है, यात्रा करने से हर किसी व्यक्ति को देश- दुनिया के विषय में बहुत कुछ सीखने को मिलता है,

इससे व्यक्ति एक सीमा के अंदर बंधे रहने से मुक्त होता है और जीवन में नई चीजों के बारे में जानता है.

-“यात्रायें मनुष्य जीवन को बहुत कुछ अवलोकन तथा मूल्यांकन करने में सहायक होती हैं.”

जो आपको थका दे, जिससे आपको मानसिक तनाव हो, जिससे आपकी सेहत का नुकसान हो, उसे यात्रा मानना ही नहीं चाहिए ;

_ हुल्लड़ बाजी टूर नहीं होता ; यात्रा वही है जिससे आप कुछ सीखते हैं, जिससे आपको सुकून का अनुभव होता है, जिससे आप तरोताजा अनुभव करते हैं ;

_दूसरी संस्कृति या सभ्यता को जानना, दूसरी भाषा वाले लोगों से मिलना और जहाँ गए हैं वहां का भोजन करना ;

_ यात्रा करने से पहले खुद से एक सवाल कीजिए कि आप यात्रा कर क्यों रहे हैं ? इसके बाद ही यात्रा कि जगह फाइनल कीजिए..!!

मैं घुम्मक्कड़ों को सबसे अमीर समझता हूं, ये तिजोरी में सिक्के नही बल्कि किस्से जमा करते हैं.

कभी कभी अंदर से मन करता है कि कहीं दूर घूमने का, इंसानी दुनियाँ से बिल्कुल अलग, कुछ मालूम नही होता है जाना कहाँ हैं, घूमने की तीव्र इच्छा _ घर की चार दिवारी से आज़ाद होने का विगुल फूंक देती हैं.

हम मनुष्य आनुवांशिकी तौर पर घुमंतू ही तो थे, लेकिन वर्षो पहले एक दिन मनुष्य ने आग जलाई, फिर अपनी कुटिया बनाई, खेत और खूंटा बांधा और स्थाई हो गया, घुमंतू मन पीछे छूट गया.

लेकिन वही जब कभी हमारा पुरातन मन वापस लौटता है तब कहता है” चल घूमने चलें …

जो लोग अधिक यात्रा करते हैं , _ वे समय को धन के बराबर होने के सभी तर्कों को झुठलाते हैं ; _ उनके लिए समय ही जीवन है और उनके समय में धन का कोई स्थान नहीं है.

_ वे न्यूनतमवादी जीवन जीते हैं, उनके पास लेने के लिए कम देने के लिए अधिक होता है ; अनुभव बताते हैं कि जो लोग अधिक यात्रा करते हैं _वे कम आलोचनात्मक, अधिक लचीले और महान सहानुभूति रखने वाले होते हैं;

_ वे सभी रूढ़ियों को तोड़ते हैं और दुनिया को बताते हैं कि दुनिया के लोगों में कोई अंतर नहीं है ; दिल की गहराई से हम सब एक जैसे हैं और हम सभी अच्छे लोग हैं ; हमारी मूल प्रवृत्ति दूसरों की सहायता करना है.

घुमक्कड़ी सिर्फ आनंद और विलास का माध्यम नही, बल्कि, घुमक्कड़ी आपका ज्ञानवर्धन भी करती है ; _ आपका सांसारिक और व्यवहारिक ज्ञान बढ़ता है ; _ नई जगहों पर जाना, नये लोगों से मिलना, कई चुनौतियाँ, कई अच्छे – बुरे अनुभव आपको मानसिक रूप से मजबूत बनाते हैं, आपके निर्णय लेने की छमता बढ़ जाती है.

आप कई तरह के मौसम और अलग-अलग जलवायु मे रहते हैं, कई तरह से शारीरिक श्रम करते है ; _ ये सभी आपकी शारीरिक क्षमता का विकास करती है आप शारीरिक रूप से सुदृढ़ बनते हैं, _ जिससे आप किसी भी तरह के मौसम और परिस्थिति को झेल सकते हैं.

तो घुमक्कड़ी, सिर्फ आमोद-प्रमोद और विलासिता का साधन ना होकर, हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा है ; _ घुमक्कड़ी हमारे सुखी जीवन के लिए नितांत आवश्यक है.

मेरा मानना है कि थोड़ा घूमिए… It’s Never Too Late to Start Traveling

हाँ घूमते और लोगों से मिलते हुए आप सुख-दुःख दोनों का अनुभव करेंगे, आपने लाइफ़ में जो प्रिंसपल बनाए हैं जीने के _ वो कई बार टूटेगें, जिसको अकड़ और औक़ात समझते हैं, वो समझ आने लगेगा.

_ यात्राएँ सिर्फ़ खूबसूरत दृश्य नहीं दिखाती हैं, असल में आईना दिखाती हैं…

कई लोग यात्राओं को फिजूल मानते हैं, पर ये वो ही लोग होते हैं जो कहीं जाते नहीं हैं,

_ मेरे हिसाब से यात्राओं से इतना कुछ सिखने को मिल सकता हैं जितना और कहीं नहीं मिलेगा.

जीवन यात्रा है, यात्राएं जीवनभर चलती रहेंगी ; _ यात्राएं जीवन सिखाती हैं ; _यात्रा ही मंजिल हो जाए तो मंजिल की चिंता नहीं रह जाती ; _ यात्राएं मंजिल हो जानी चाहिए ; _ जीवन को यात्रा बना लेना ही जीवन ही..
यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के बारे में नहीं है, यह उससे कहीं अधिक है, _ यह मैंने हमेशा महसूस किया और अनुभव किया है,

यहां तक ​​​​कि हम 100 किमी की यात्रा भी करते हैं, हम उन चीजों का अनुभव करते हैं जो सीखने और बढ़ने में मदद करती है.

Travel is not only about going from one place to another its much beyond that. This I always felt and had experienced,

even we travel for a 100km we experience things that helps to learn and grow.

घुमक्कड़ी पाठ्यक्रम का हिस्सा होना चाहिए क्योंकि आप इसके माध्यम से बहुत कुछ सीख सकते हैं.

_ घुमक्कड़ी should be part of syllabus as you can learn so much through it.

यात्रा केवल जगह देख लेना नहीं, __ उस जगह से आपने क्या जाना, सीखा या महसूस किया इन सबसे मिलकर बनती है.
यात्रा सिर्फ जीना ही नहीं सिखाती, यात्राओं से जीने का नजरिया बदलता है !!
कभी – कभी आपको खुद को खोजने के लिए अकेले यात्रा करनी चाहिए.

_ अकेले घूमने का अपना ही मज़ा है,,,.. तो आप भी सभी घुमक्कड़ी करते रहिए,_

_सोलो ट्रेवलिंग ज़िंदगी ही नहीं बदलते ज़िंदगी जीने का नज़रिया बदलते हैं ..

_ क्यूँ कि घुमक्कड़ी की फ़क़ीरी जिसने जी ली, _ वो दुनिया का सबसे अमीर इंसान है. _ इस क्षणभंगुर संसार का और इस शरीर का कुछ कह नहीं सकते कौनसा दिन आख़िरी होगा ये भी पता नहीं,;

_ तो बस मौज करो, अपनी मस्ती में मस्त रहो _ बिंदास रहो..

यदि हम ग़ौर करें तो ऐसा मालूम होता है, कि मानव इस धरती पर घूमने निकला हुआ है_

_ उसकी जिज्ञासा उसे कहीं ठहरने ही नहीं देती..

घुमक्कड़ी आपको सिखाती है, हर वस्तु से मोहब्बत करना और अपने साथ अनेकों लोगों के सपनों को जिंदा करने का काम कर देती है ।।
हर मुसाफिर यहाँ मंज़िल का इंतज़ार नहीं कर रहा खुश होने के लिए _

_ कुछ सफर का मज़ा भी जी भर कर ले रहे हैं..

“यात्रा पर ध्यान केंद्रित करें, गंतव्य पर नहीं ; _ ख़ुशी किसी गतिविधि [ Activity ] को ख़त्म करने में नहीं _बल्कि उसे करने में मिलती है.”

यात्रायें सबसे अच्छे प्यार की तरह होती हैं, जिसका वास्तव में अंत नहीं है.

_ वो मंजिल ही क्या जिसके रास्ते में मजा न हो..!

हम उस राह के राही नहीं, जिसे मंजिल की तलाश है..

_ हम तो वो हैं जो बस सफर का मजा लेने आये हैं !!

कुछ तो है जो घर नहीं दे पाता ;

_वर्ना ऐसे तो यात्रा में कोई नहीं रहता..!!

कुछ राहों के सफर को भी जी लेना चाहिए, _

_ हर सफर मंजिल तक पहुंचने का इरादा नहीं रखते..

” यात्रा का असली आनंद मंजिल से अधिक रास्तों पर मिलता है..”

तू चलता चल, ऐ पथिक _

_ बस इतना समझ, कि रास्ता जीत, और मंज़िल हार है..

अपने किसी विशिष्ट दायरे से निकल कर यात्रा करना और घूमना बेहद जरुरी है.
हर यात्रा एक किताब की तरह होती है, हर यात्रा के साथ अलग पन्ना खुलता है.
मंजिल प्राप्त करने से अधिक महत्वपूर्ण है _ एक अच्छा मुसाफ़िर बनना…!!!
कोई बातों में ही उलझ जाता है, _ और कोई यात्रा पर निकल जाता है.
कुछ सफर ऐसे होते हैं, _ जिनमें सिर्फ रास्ता ही हमसफर हो सकता है.
यात्राएँ हमें बहोत कुछ सिखाती हैं, _ बस निर्भर करता है हम कैसे हैं..
पहुचने से ज़्यादा ज़रूरी है… _ ठीक से यात्रा करना…
एक घूमना ही तो है जो इन्सान को जिन्दा रखता है !
मुश्किल रास्ते खूबसूरत मंजिलों तक ले जाते हैं..
यात्रा सिखाता हूँ मैं, _ मंजिल तो बहाना है
यात्रायें हमें नये संसार से मिलाती हैं !!
सफर से बेहतर कोई मंज़िल नहीं..
” मजे से चलो – चलने में ही मजा है,” लोगों को पहुँचने की बड़ी जल्दी है ; क्यों आप को इस रास्ते पर मजा नहीं आ रहा है ?

आप को चारों तरफ खिले फूल दिखाई नहीं पड़ते ? ये पेड़ों की छाया, ये हरियाली, ये पछियों के गीत, यह कलरव – इसमें आप को मजा नहीं आता ?

आप कहते हो, हमें तो मंजिल पर पहुंचना है –_– ” मैं मानता हूँ, यात्रा ही मंजिल है “–

जो लोग घूमने के दौरान सिर्फ फोटो ही लेते हैं _उन्हें अपना घूमना याद नहीं रहेगा ; उन्हें केवल यही याद रहेगा कि _उन्होंने कौन सी फोटो खींची थीं.

सफ़र सिर्फ मंजिलों तक पहुंचने के लिए नहीं होते बल्कि_

_ उन तमाम जगहों से गुजरने के लिए भी होते हैं जो मंजिल के रास्ते में पड़ते है.

मंज़िल तो आ ही जाएगी एक न एक दिन जनाब, _

_ आज ज़रा रुक कर इन राहों के हालात जान लेते हैं ..!!

सदियों से मुसाफ़िर हूँ, कई मंज़िल मिलीं, पर कई मिलनी बाक़ी है,

_ हर युग में होता है कोई ना कोई मेरे जैसा, _ उसे ढूँढना बाक़ी है…

जूते उतार देना _ मेरी यात्राओं की समाप्ति की घोषणा नहीं थी,

जीवन ने कुछ यात्राएं मुझसे नंगे पांव करवाई.

भारत मे घूमना फिरना सिर्फ मौज मस्ती या फिर धार्मिक कारणों से ही accept किया गया है. _ घूमने को शिक्षा मे शामिल ही नहीं किया गया, _घूमना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण अंग है.

आप मानिए या ना मानिए ; _ घूमना आपको शिक्षित भी करता है ; _किताबों से कहीं ज्यादा..!!

_कई बार आपके शिछक से भी ज्यादा शिक्षा घूमना देता है.

लेकिन जब आप विशेष जगहों पर घूमेंगे तो कम resources मे रहना, बिना स्वाद का खाना, पर्वतों, पठारों के अंतर, नदियों के उद्गम स्थल, तापमानों के अंतर और उनका प्रभाव, लोगों की और पेड़ों के बनावट के अंतर, समुंदर की विशालता, विभिन्न टाइम जोन तथा ऐसी अनेकों शिक्षाएं हमें मिलती हैं,

संभव हो तो घूमिए और हर बार कोई नई टोपोग्राफी चुनिये, _ इसके दूरगामी प्रभाव का फाइदा उठायें.
__ कभी कहीं सुना और पढ़ा था कि यात्राएं अनुभव की ऐसी पिटारा होती हैं _जो मानव जीवन को सदैव से समृद्ध करती रहीं हैं.
घूमना सिर्फ पागलपन नहीं है,; घूमना जीवन की सार्थकता को करीब से देखना और उसे महसूस कर पाने की कसौटी पर खरा उतरना भी है.
उस सभ्यता, संस्कृति और लोक को समझना है.
”पर्यटन स्थलों के व्यापारीकरण और वहां बढ़ती भीड़ ने सब जगह _ऐसी बदसूरती फैला दी है कि _अब प्राकृतिक सौंदर्य कहीं नहीं बचा, केवल प्रसिद्धि बच गई है _जिसे देखने के लिए लोग उमड़ पड़ते हैं.”
—इससे आगे की बात और भी ज़ोरदार है: सैलानियों को देखकर ऐसा लगता है _जैसे वे घर से ‘मार्केटिंग’ करने के लिए निकले हैं _या फिर खाने-पीने;__ प्रकृति का सौंदर्य देखने तो कतई नहीं.”

सुविचार – छुट्टी – छुट्टियां – 064

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काम जब करते थे, तो सोचते थे छुट्टी कब मिलेगी ;

_ छुट्टी मिली है तो सोचते हैं काम कब मिलेगा..!!

कुछ छुट्टियां बस सुनहरी याद रह गईं.. और कुछ छुट्टियां ऐसी भी जो छुट्टियां नहीं लगती..!!
ख़ुद को पैंपर [ Pamper- संतुष्ट ] करना भी कभी-कभी बहुत अच्छा होता है. अपने लिए वक़्त निकालें. छुट्टी लेकर पूरा दिन अपने हिसाब से बिताएं. घूमने जाएं, शॉपिंग करें या मूवी देखें. इससे आप तरोताज़ा हो जाएंगे.

सुविचार – भूख – तंगी – 063

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बहुत वाकिफ़ हूँ मैं रोटियों की ताकत से, _

_ दो वक्त ना मिले तो मेरी औकात बतला देती हैँ..

भूख को समझने के लिए भूखा रहना पड़ता है – ” रहे _ हो _ कभी “
” खाने का स्वाद ” ज़ुबान नही भूख तय करती है.
रोटियां उन्हीं की थालियों से कूड़े तक जाती हैं, _

_ जिन्हें पता नहीं होता ” भूख क्या होती है “

जो कहता है कि जिंदगी बहुत हसीन है, _

_ शायद उसने कभी पेट की भूख नहीं देखी होगी.

छोटी – सी उम्र ने तजुर्बे बड़े दिखा दिए, _

_ पेट की भूख ने सैकड़ों हुनर मुझे सिखा दिए.

भूख, तंगी.. ये जीवन के सबसे शांत शिक्षक होते हैं..
_ जो शब्दों के बिना ही बहुत कुछ सिखा जाते हैं.!!
एक निवाला पेट तक पहुंचाने का ऊपर वाले ने क्या खूब इंतजाम किया है.

_ अगर गरम है तो हाथ बता देते हैं,
_ अगर सख्त है तो दांत बता देते हैं,
_ कड़वा या तीखा है तो जुबान बता देती है,
_ बासी है तो नाक बता देती है,
_ बस मेहनत का है या बेईमानी का इसका फैसला हमें अपने आप करना है.

सुविचार – गाँव – शहर – 062

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जिम्मेदारियो के बोझ तले तेरी गिरफ्त मे हू ऐ शहर,

_ वरना मेरे गाँव के खेत तुझसे ज्यादा सुकून देते है..

“नौकरी जो इस तरह निर्मम है, कि इसे न तो परिवार का महत्व समझ में आता है और ना अकेले जीने का दर्द “

मैंने शहर को देखा और मैं मुस्कराया,

_वहाँ कोई कैसे रह सकता है, यह जानने मैं गया शहर और फिर वापस न आया.!!
– मंगलेश_डबराल
पहले मुझे लगता था कि शहरों की अपेक्षा गाँवों में अधिक सुकून होता है, मगर फिर महसूस हुआ कि गाँवों और कस्बों में सुकून नहीं होता.

_ बल्कि, धरती पर सबसे अधिक ईर्ष्यालु और दूसरों के जीवन में ताका-झांकी करने वाले लोग आपको गाँवों और कस्बों में ही मिलेंगे.
_ गाँव देहात कस्बों को जितना महिमा मंडित किया गया है, उतने ये हैं नहीं.
कवि और लेखकों ने जो गाँव की छवि गढ़ी है. _सच कहूं तो गाँव उससे एकदम विपरीत है.
– Mayank Mishra
कोई जगह बदलने से नहीं बदलता जीवन, जीने का ढंग बदलता है – और वही हर जगह को अपना बना लेता है.

_ जगह बदलने से हमेशा समाधान नहीं मिलता, कभी-कभी हमें अपने जीने के ढंग को बदलना होता है.
_ जहाँ हम होते हैं, अगर मन उसी से तालमेल न बिठा पाए, तो कोई भी जगह हो, वहां अधूरापन ही लगेगा.
_ जहाँ मन ठहर जाए, वहीँ जीवन बसाना चाहिए- बाकी जगहें सिर्फ गुजरने- गुजारने के लिए होती हैं.
कोई ज़माने में अपना सा लगता वो गाँव, पीछे छूट गया जनाब _

_ अब वो चाय की टपरी पर मिलते दोस्त भी, शहर जो आ गए .!!

गाँव से शहर में बसते ही खुद को ऊंचा समझते हैं लोग,,,,,_ कैसे बताऊँ उन्हें..

_तेरी पक्की सड़क से अच्छी है वो पगडंडियां, _जो बाट निहारती है मेरे आने की..

“नही चाहिए बड़ा शहर”

_ कंक्रीट के जंगल में मुझे एक वक्त के बाद उफनाहट [बोरियत] होने लगती है.!!

_ बड़े शहर मेरे लिए सिर्फ एक मजबूरी है, पसंद कभी नहीं..
_ यहाँ जो लोग विनम्र भी हैं, वह भी रिज़र्व हैं.. इसलिए एक बाहरी व्यक्ति को यहाँ अकेलापन हमेशा महसूस होता रहेगा.!!
सबसे अच्छा है गाँव में शान से रहना.!!

_ शहर कभी अच्छे लगे ही नहीं घुटन होती है वहां.!!
किसी शहर व गाँव के बदलाव को वहीं का बाशिंदा ही सही बता सकता है..
_ जिसने उस शहर व गाँव में बचपन से जवानी तक का सफर जिया हो.!!
जिस तरह अच्छे अच्छे पकवानों से मन भर जाता _ ” रोटी से नहीं, “

_ उसी तरह बड़े से बड़े शहरों में मन भर जाता _ ” गांव में रहने से नहीं…”

गाँव छूटते ही रंग बदल जाते हैं..

_ जो देखा वो द़िमाग मे रह जाता है और कुछ यादें थकी हुई जिंदगी का हिस्सा बन जाती हैं.
_ लगता है कि हम ठहर गये हैं और खालीपन लगने लगता है.!!
गाँव का घर हर किसी को कहाँ नसीब होता है साहब ?

_ बहुत से लोगों की जिंदगी गुजर जाती है.. बाहर कमाते कमाते.!
_ चार दिन की छुट्टी लेकर जब घर आता है.. तब घर वाले हजारों टेंशन परोस देते हैं.
_ कुछ नये सपने जगा देते हैं, फिर उन सपनो के सपने देखते हुए फिर से ड्यूटी पर चला जाता है.
_ जवानी अकेले कट जाती है, कोई दर्द बाँटने वाला भी नही होता.
_ फिर जब हमेशा के लिए घर आता है तब तक बुढ़ा हो जाता है.!!
आगे बढ जाने की विवशता और पीछे लौट जाने की इच्छा..

_ हम लड़कों का इनके मध्य ही जीवन बीतता जाता है..!!
छोड़ कर एसी और कूलर, पीपल की छांव चलते हैं,_

_ शहर से जी भर गया, चलो अब गाँव चलते हैं !!

जिस्म तोड़ नौकरी है शहरों में..

_ बेटे गाँव कमा कर नहीं, थक कर लौटते हैं !!

शहर में छाले पड़ जाते है जिन्दगी के पाँव में, _

_ सुकून का जीवन बिताना है तो आ जाओ गाँव में..

पैसा भले ही शहर में ज्यादा होगा , _

_ सुकून मगर अभी भी गाँव में मिलता है ..

घर न जाऊं किसी के तो वो रूठ जातें हैं,_

_ मेरे गांव में अब भी, वो तहज़ीब बाकी है..!

मैं गांव हूं मुझे गांव ही रहने दो ; शहर की जकड़न में दम घुटता है मेरा !!
शहर आ गये हैं सब छोड़ के, लेकिन मुश्किल ये है की सब कुछ छूटता कहाँ है.!!

_ शहर बुरा नहीं है, बस परिस्थिति अलग बना देती है, गांव-जवार, अपने यार, घर-परिवार सब पीछे छुड़वा देती है.
_ शहर में भीड़ है, जेब में पैसा है, लोग हैं, फिर भी पता नहीं कुछ तो है.. जो खाली-खाली सा महसूस होता है.
_ पता नहीं कुछ तो है, पता तो सब है, बस कह नहीं सकता, ये खालीपन क्यों है.
_ चुप हो जाता हूं, पहले मजबूरी थी, अब आदत हो गयी है.
_ ठीक है..- शायद जिंदगी यही है.!!
‘शहर’ आने के बहुत से रास्ते खुला रखता है,

_ लेकिन लौटने के सभी रास्ते बंद रखता है.!!

इस भरे शहर में कौन मेरा अपना है,

_ जो मेरे पास ना होने पर रूठ जाए..!!

बहुत महंगा सौदा कर रही है ये ज़िन्दगी एक जॉब के चक्कर में,

_ माँ, दोस्त, घर, गाँव सब कुछ छोड़ना पड़ रहा है !!

किस आज़ादी में कैद हो गए शहर में,

_ कि फिर गाँव जाने को तरस गए !!

शहर में मेहमान की बिदाई सीमित है दहलीज़ों तक, _

_ गांव में अभी भी लोग सड़क तक छोड़ने आते हैं..

शहर बसा के _ गाँव ढूंढ़ते हैं..!

अजीब पागल हैं _ हाथ में कुल्हाड़ी ले कर छाँव ढूँढ़ते हैं ..!!

अपनी मिट्टी से हमेशा के लिए दूर हो जाते हैं,

_ कुछ लोग जो शहर जाकर मशहूर हो जाते है.

कोई किसी की तरफ़ है कोई किसी की तरफ़ _

_ कहां है शहर में, अब कोई ज़िंदगी की तरफ़..!!

मेरे गाँव की मिट्टी से भरता है तेरे शहर का पेट…_

_ और तेरे शहर वाले… गाँव वालों को… गवार कहते हैं…!!

कहीं जमीं से ताल्लुक न खत्म हो जाए,

_ बहुत न खुद को हवा में उछालिए साहब !!

गाँव से आने वाले लड़के लालटेन के उजाले में पढ़कर, _

_ एक दिन पूरी दुनिया को रोशनी दिखाते हैं..!!

गुज़री तमाम उम्र उसी शहर में जहाँ,

_वाक़िफ़ सभी थे कोई पहचानता न था.
सुना पड़ा गांव का दालान ..जहां बचपन में खेला करते थे.
_ अब जिम्मेदारी ने शहर बुला लिया.!!
ये रोजगार की तलब गाँव से शहर तक ले आई ज़िन्दगी को,
_अब अपने ही घर-गाँव जाने के लिए दूसरों से पूछना पड़ता है.!!
अपनी गली में अपना ही घर ढूंढ़ते हैं लोग _ यह कौन शहर का नक्शा बदल गया !!
दुनियाँ के किसी शहर में नहीं मिलेगा, _ सुकून के लिए अपने गाँव लौटना होगा..
शहर में तो बस मेरा शरीर रहता है, _दिल मेरा आज भी गाँव में बसता है..
अपने गाँव से निकले तो खो गये, अपने जो दूर हुए तो अजनबियों से हो गये..!!
जिम्मेदारी ने छुड़वा दिए गाँव, घर, दोस्त.. गाँव छोड़ कर जाने वाले यही सोचते हैं.!!
गाँव में पक्का मकान बनाना था… सो कच्ची उम्र में घर छोड़ना पड़ा ..
हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है _ जो कभी भी शहर नहीं होना चाहता..
जहाँ कमरे में कैद हो जाती है ” जिन्दगी ” _ लोग उसको बड़ा शहर कहते हैं.
यदि रोजगार की मज़बूरी न होती तो शहरों का अस्तित्व ही न होता !!
गांव का छोड़ मकान अपना, _ किराए में शहर में रहते हैं।।
शहर के मकान फीके पड़ जाते हैं, _जब गाँव वाले घर याद आते हैं.
गाँव ने ही बचा रखा है रातों का वजूद, शहर वाले तो अँधेरा नहीं होने देते..!!
हम भी गाँव में शाम को बैठा करते थे, _ हमको भी हालात ने बाहर भेजा है..
शहर से संभावनाएं जुड़ी हैं, गाँव से भावनाएं जुड़ी हैं.!!
“जीवन” _शहर की अमीरी में कितना गरीब हो गया है..!!

_शहर के लोग गाँव में नहीं रहना चाहते, _पर गाँव की ज़िन्दगी का मज़ा लेना चाहते हैं.!!

शहर और गाँव दोनों की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ हैं..

_ और दोनों ही जीवन के अलग-अलग अनुभव प्रदान करते हैं !!

शहरी जीवन लाखों लोगों का एक साथ अकेले रहना है.
शहर की दवा और गाँव की हवा बराबर होती है.
शहर तेज़ दौड़ रहा है… 🏙️

_ मैं किनारे खड़ा होकर ज़िंदगी को समझ रहा हूँ 😌
_ ये जहाज़ बता रहा है कि धीरे चलो, लेकिन सही दिशा में ⛵
_ कभी हँसना सीखो 😂
_ कभी रुककर महसूस करो ❤️
_ और कभी खुद से कहो —
“अभी सफ़र बाकी है मेरे दोस्त!”
– Cycle Baba
गांव में रहने से कोई ग्रामीण नहीं होता है,

_ जिसके अंदर गांव रहता है, वही गांववाला होता है.
_ हो जिनमें एक अनगढ़ भोलापन.. वही ग्रामीण है.
_ ये चतुर सुजान गांववाला कहलाने के हकदार नहीं है.!!

– Shailendra Sudhrama

NOTE : भोलापन और गाँव दोनों का कोई कनेक्शन नहीं है.
_ पर आजकल देखा जा रहा.. हर गाँव वाला महा धूर्त है.. सिटी वाले फिर भी सुलझे हैं..
_ गाँव वालो से ज्यादा चालाक असंवेदनशील [insensitive] लोग नहीं देखे मैंने..!!
_ ईर्ष्यालु और दूसरे के जीवन में अनावश्यक ताक-झांक करने वाले ज्यादातर आपको गाँव में ही मिलेंगे.!!
गाँव छोड़ के जाना पड़ता है, घर छोड़ के जाना पड़ता है,

_ वो खिड़की और छत को अलविदा कहना पड़ता है,
_ हमारा बस चले तो यहीं सुकून से आराम फरमाते,
_ लेकिन कुछ मजबूरियों तले भी जीना पड़ता है .!!
बहुत दिनों बाद खुले आसमान के नीचे सोकर बचपन याद कर रहा हूं, सच कहूं तो इस भौतिक परिवर्तन में अब खुले आसमान के नीचे सोना एक लग्जरी अनुभव दे रहा है,

गर्मियों के मौसम में रात में खुले आसमान के नीचे सोना जब सामान्य न रहकर वैभव लगने लगे तो समझ लो _ जीवन शहर की अमीरी में कितना गरीब हो गया है….

अपने गांव अपने शहर से लगाव सभी को होता है और होना भी चाहिए, जिस जगह बच्चा पैदा होता है, _ वहां की एक-एक चीज से उसकी यादें जुड़ी होती हैं ; वह कभी भी विस्मृत नहीं की जा सकती हैं, _ फिर चाहे वह पेड़ पौधे हों या सुबह – सुबह डालों पर अठखेलियां करते पंछियों की माधुर्य उत्पन्न करती चहचहाहट हो.

अपना गांव/ शहर तो अपना होता है तब चाहे वह छोटा हो या बड़ा हो जब हम उसके बारे में कुछ अच्छा कहे तो बड़ी प्रसन्नता होती है.

_ लेकिन अपनी जन्मस्थली होने के नाते यदि किसी शहर या गाँव को देखा जाए तो उस पर बहुत अपना बहुत लाड़ बहुत प्रेम स्वत: ही न्यौछावर होता है.

_ये सब यादों के वही पृष्ठ है जिसे कोई इंसान बचपन से बुढ़ापे तक भरता है और कभी अकेलापन महसूस होने पर उन्हें पड़ता है,_ _ लोगों की तो मजबूरियां होती है जिसके कारण ही कोई अपना शहर या गाँव छोड़कर जाता है, _ वरना कौन अपनी जन्मस्थली छोड़ कर जाना चाहेगा.

शहरों में रहने वाले अधिकांश लोगों की गतिविधियों ने पृथ्वी से अपना संबंध खो दिया है;

_ वे मानो हवा में लटके रहते हैं, सभी दिशाओं में मँडराते हैं, और कोई जगह नहीं पाते जहाँ वे बस सकें.

यहां तक कि शहर के उन चकाचौंध भरे और पॉश इलाकों में भी, जो शिक्षित और बुद्धिमान होने का दावा करते हैं, एक रूढ़िवादी-दकियानूसी समाज मौजूद है.!!
यह व्यक्तिगत प्राथमिकताओं और ज़रूरतों पर निर्भर करता है.

_ गांव का जीवन उन परिवारों के लिए बेहतर हो सकता है जो शांतिपूर्ण और आरामदेह माहौल चाहते हैं,

_ जबकि शहर का जीवन उन परिवारों के लिए बेहतर हो सकता है जो जॉब के अवसरों और सुविधाओं और सुख-सुविधाओं की एक विस्तृत श्रृंखला तक पहुँच चाहते हैं.

ज़मीन पे चल न सका, आसमान से भी गया ;

_ कटा के पर वो परिंदा, उड़ान से भी गया..
_ तबाह कर गई उसे, पक्के मकान की ख्वाहिश;
_ वो अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया..!!
भागम- भाग की दुनिया में समय रहते लोग जरुरत से ज्यादा जमा करने के चक्कर में फंसे रहते हैं,

_ लंबे समय के बाद अपनों के बीच लौटने पर उनकी अहमियत कम हो जाती है,
_ क्योंकि लोग उनके बगैर जीना सीख लेते हैं.
_ जब भी लगे कि अब लौटना बेहतर है, तभी वापसी कर लेनी चाहिए !!
_ साथ ही सत्य यह भी है कि जहाँ रोटी मिलती है, वही अपना घर है.
_ जो कहते हैं कि वो कभी अपने देश, अपने घर लौटेंगे, वे सत्य नहीं बोलते..
_ उन्हें केवल अपने घर से लगाव रहता है, लेकिन वो वहां रह नहीं पाएंगे.
_ क्योंकि जिस घर, गाँव को छोड़ कर गए थे _ वापसी में वो वैसे नहीं मिलेंगे, निराशा ही मिलेगी..
_ उसके बाद सिर्फ सपने में ही घर और गाँव दिखाई देंगे..!!
_ पर मन थेथर होता है, जहाँ हम लौट नहीं सकते, अपनी ही मज़बूरी के कारण _ फिर भी उन्हीं छोड़े के साथ हमेशा जीते हैं.
_ इसीलिए जहाँ पर हो, वहीँ पर जी लो अपनी ज़िन्दगी खुल कर शान से ;
_ वरना आधी ज़िन्दगी हम जिम्मेदारियां पूरी करने में खर्च कर देंगे..
_ और बची ज़िन्दगी हम वापस जाने की तैयारियों में खर्च कर देंगे..
_ तो अपने लिए कब जियेंगे ??
_ इसलिए अब आगे की तैयारी करने का वक़्त है,
_ समय में पीछे जाने पर सिर्फ़ राख़ मिलती है, जैसे ही छुओगे भरभरा कर गिर जाती है ;
_ अब आगे देख कर जीना ही उत्तम है..!!
चलो गाँव चलते हैं, अपनी मंजिल अपने पांव चलते हैं

कैसे चले, गाँव पूछता है, सभी चले गए,

पहले मुझसे, फिर शहर से रूठ गए

अब लौट आना चाहते हो,

अपनी मंजिल अपने पांव आना चाहते हो

ना वो मंजिल रही, ना वो रास्ते

तुम जिन रास्तों पर अपनी मंजिल अपने पांव जाना चाहते हो

अब बदल गया वो गाँव भी

बदल गए रास्ते भी उसके

ना खेत है अब ना खलियान है

ना पगडंडियां है ना फसलें लहलहान है

कहाँ आओगे _ इसको भी उजाड़ गए,

उसको भी छोड़ आए

ना तुम उसके बने, ना इसके

बस भागते रहे

यूँ ही अब भागते जाना है

ना मंजिल है ना पांव _ कहां जाना है

अपनी मंजिल अपने पांव कैसे जाना है.

गाँव बेचकर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।

जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।
बेचा है ईमान धरम तब, घर में शानो शौकत आई है।
संतोष बेच तृष्णा खरीदी, देखो कितनी मंहगाई है।।
बीघा बेच स्कवायर फीट, खरीदा ये कैसी सौदाई है।
संयुक्त परिवार के वट वृक्ष से, टूटी ये पीढ़ी मुरझाई है।।
रिश्तों में है भरी चालाकी, हर बात में दिखती चतुराई है।
कहीं गुम हो गई मिठास, जीवन से कड़वाहट सी भर आई है।।
रस्सी की बुनी खाट बेच दी, मैट्रेस ने वहां जगह बनाई है।
अचार, मुरब्बे आज अधिकतर, शो केस में सजी दवाई है।।
माटी की सोंधी महक बेच के, रुम स्प्रे की खुशबू पाई है।
मिट्टी का चुल्हा बेच दिया, आज गैस पे कम पकी खीर बनाई है।।
पहले पांच पैसे का लेमनचूस था,अब कैडबरी हमने पाई है।
बेच दिया भोलापन अपना, फिर चतुराई पाई है।।
सैलून में अब बाल कट रहे, कहाँ घूमता घर- घर नाई है।
कहाँ दोपहर में अम्मा के संग, गप्प मारने कोई आती चाची ताई है।।
मलाई बरफ के गोले बिक गये, तब कोक की बोतल आई है।
मिट्टी के कितने घड़े बिक गये, अब फ्रीज़ में ठंढक आई है ।।
खपरैल बेच फॉल्स सीलिंग खरीदा, जहां हमने अपनी नींद उड़ाई है।
बरकत के कई दीये बुझा कर, रौशनी बल्बों में आई है।।
गोबर से लिपे फर्श बेच दिये, तब टाईल्स में चमक आई है।
देहरी से गौ माता बेची, अब कुत्ते संग भी रात बिताई है ।
ब्लड प्रेशर, शुगर ने तो अब, हर घर में ली अंगड़ाई है।।
दादी नानी की कहानियां हुईं झूठी, वेब सीरीज ने जगह बनाई है।
बहुत तनाव है जीवन में, ये कह के मम्मी ने भी दो पैग लगाई है।
खोखले हुए हैं रिश्ते सारे, कम बची उनमें कोई सच्चाई है।
चमक रहे हैं बदन सभी के, दिल पे जमी गहरी काई है।
गाँव बेच कर शहर खरीदा, कीमत बड़ी चुकाई है।।
जीवन के उल्लास बेच के, खरीदी हमने तन्हाई है।।
कीमत बड़ी चुकाई है।कीमत बड़ी चुकाई है।

सुविचार – स्कूल – विद्यालय – 061

बच्चों को स्कूल अच्छा नहीं लगता है,

परन्तु बच्चों के जीवन को स्कूल ही अच्छा बनाता है..

स्कूल तो ज्ञान का एक झरना है, जहाँ कुछ विद्यार्थी अपनी प्यास बुझाते हैं ;

कुछ एक दो घूँट पीते हैं और कुछ सिर्फ कुल्ला करते हैं – शिव खेड़ा

स्कूल का पहला दिन और आखिरी दिन एक जैसा था,

दोनों बार आँखों में आंसू थे, पर दोनों बार रोने की वजह अलग थी..

*ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना..*

कमीज के बटन, _ ऊपर नीचे लगाना, वो अपने बाल, _ खुद न संवार पाना,
पीटी शूज को, चाक से चमकाना, वो काले जूतों को, _ पैंट से पोंछते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,**जरा फिर से तो बुलाना…*
वो बड़े नाखुनों को, दांतों से चबाना,
और लेट आने पर, _ मैदान का चक्कर लगाना,
वो प्रेयर के समय, _ क्लास में ही रुक जाना,
पकड़े जाने पर, _ पेट दर्द का बहाना बनाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो टिन के डिब्बे को, _ फ़ुटबाल बनाना,
ठोकर मार मार कर, _ उसे घर तक ले जाना,
साथी के बैठने से पहले, _ बेंच सरकाना,
और उसके गिरने पे, _ जोर से खिलखिलाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
गुस्से में एक-  दूसरे की, _ कमीज पे स्याही छिड़काना,
वो लीक करते पेन को, _ बालों से पोंछते जाना,
बाथरूम में सुतली बम पे, _ अगरबत्ती लगाकर छुपाना,
और उसके फटने पे, _ कितना मासूम बन जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे’* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो गेम्स के पीरियड के लिए, _ मास्टरजी को पटाना,
कार्य – अनुभव को टालने के लिए, _ उनसे गिड़गिड़ाना,
जाड़ो में बाहर धूप में, _ क्लास लगवाना,
और उनसे घर – परिवार के, _ किस्से सुनते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो बेर वाले के बेर, चुपके से चुराना,
लाल – पीला चूरन खाकर, _ एक दूसरे को जीभ दिखाना,
खट्टी मीठी इमली देख, _ जमकर लार टपकाना,
साथी से आइसक्रीम खिलाने की, _ मिन्नतें करते जाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो लंच से पहले ही, _ टिफ़िन चट कर जाना,
वो पानी पीने में जमकर, _ देर लगाना,
बाथरूम में लिखे शब्दों को, _ बार – बार पढ़ के सुनाना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो परीक्छा से पहले, _ मास्टरजी के चक्कर लगाना,
लगातार बस इम्पोर्टेन्ट ही, _ पूछते जाना,
वो उनका पूरी किताब में, _ निशान लगवाना,
और हमारा ढेर सारे कोर्स को देखकर, _ सर का चकराना…
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना…*
वो मेरे स्कूल का मुझे, _ यहाँ तक पहुँचाना,
और मेरा खुद में खो, _ उसको भूल जाना,
बाजार में किसी, _ परिचित से टकराना,
वो जवान मास्टरजी का, बूढ़ा चेहरा सामने आना…
*ऐ दोस्त*
*तुम सब अपने स्कूल* *एक बार जरुर जाना…*
*😔 ऐ मेरे स्कूल मुझे,* *जरा फिर से तो बुलाना….*
शायद सभी याद करेंगे👍

 

 

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