सुविचार – लय – रिदम – Rhythm – 142

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एक बार कोई भी लय टूट जाए तो दोबारा लय में आना आसान नहीं होता.

Once any rhythm is broken, it is not easy to get back into rhythm.

जीवन जीने के लिए भी लय अर्थात रिदम बहुत ज़रूरी है,

_बिना किसी बाधा के अपनी तन्मयता बनाकर रखिए .!!

सुविचार – कर्म – काम – कार्य – 141

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आपका आज का परिणाम आपके अतीत के किये हुए कर्म हैं,

_ भविष्य बेहतर बनाना है तो आज के फैसलों को बदल दो.

लोग कर्मों पर विश्वास नहीं करते.

_ कईओं के साथ बहुत बुरा होते देख चुकी हूं, लेकिन उन्हें इस बात की समझ ही नहीं कि उनके किसी बुरे कर्म का फल मिला है.
_ समझ हो तो वे बुरा कर्म करने से बचें.
_ सबको अच्छे और बुरे, सही और गलत, पाप और पुण्य का ज्ञान होना चाहिए.
– Manika Mohini
सही कर्म वह नहीं है, जिसके परिणाम हमेशा सही हो !

_ सही कर्म वह है, जिसका उद्देश्य कभी गलत ना हो !!

किसी भी काम से खुशी मिलनी चाहिए, तनाव और चिंता नहीं.

_ शरीर का स्वास्थ्य सबसे पहले है ; इसके लिए काम और आराम का संतुलन चाहिए.. जो हर शख्स अपने लिए तय करे.!!
काम ऐसे करो क़ि लोग देखते रह जाएँ,

_ और अगर काम न करना हो तो ऐसे आराम करो क़ि लोग सोचते रह जाएँ.!!

रोनाधोना करने वाले तो कर्म हीन होते हैं,

_ जो स्वयं कुछ नहीं करना चाहते.. बस सारा दिन दूसरों में दोष ढूंढ़ते रहते हैं.!!

ख़ुद काम कर के कम कमाना,

_ किसी दूसरे से मदद मिलने की उम्मीद से तो बेहतर ही है.!!

कोई भी काम तुरंत शुरू न करें, पहले सोचें कि यह किस तरह होगा ?

_ कदम उठाने के पहले उसके सही- गलत की अच्छी तरह जांच करें.!!

कर्म करते वक्त हम बेपरवाह होते हैं, पर जब उसका कड़वा फल सामने आता है, तो सिवाय आंसुओं के कुछ नहीं बचता.!!
काम करो ऐसा कि पहचान बन जाए ; हर कदम चलो ऐसा कि निशान बन जाए.

_ यहाँ ज़िन्दगी तो सभी काट लेते हैं, ज़िन्दगी जियो ऐसी कि मिसाल बन जाए.!!

जीवन में सिर्फ़ अपने काम हो ही अपना किरदार मत बनाईए.
_ आपका जीवन और आपकी क़ीमत उससे कहीं ज़्यादा है.!!
जैसे बीज छोटा होता है और फल बड़ा,

_ वैसे ही हमारे छोटे-छोटे कर्म, बड़े परिणाम ला सकते हैं.!!

सही कर्म वह नहीं है, जिसके परिणाम हमेशा सही हों ;
_ सही कर्म वह है, जिसका उद्देश्य कभी गलत न हो.!!
“कर्म में पूरी तरह जुड़ो… पर भीतर से हल्के रहो..

– यही जीवन को अर्थ भी देता है और शांति भी”
जो काम पेट भरता है, घर चलाती है और दिमाग खोलती है..

_ उसमें लज्जा-शर्म रखना नुकसान ही देगा.!!

कर्म वर्तमान में निहित है और बिना ध्यान और एकाग्रता के किया गया कार्य पूर्ण और संतोषजनक परिणाम नहीं दे सकता.!!
दूसरों की पहचान से आप मशहूर तो हो सकते हैं, पर इज़्ज़त सिर्फ अपने काम से मिलती है.!!
जब आपके कर्म वापस आते हैं, तो आपकी सारी चालाकियाँ.. बेकार साबित हो जाती है.!!
यदि आप जरूरी काम करना छोड़ -हर फालतू और बेकार काम कर रहे हैं तो आप स्वयं दोषी हैं.!!
जब ज़िंदगी तक़लीफ़ देती है, तब अपने किये सारे कर्म याद आतें है…!
जब काम मिल रहा था, तब काम की कद्र नहीं की..
_ अब गया वक्त लौट कर नहीं आता.!!
करिए, कर डालिए! काम यदि सही है तो हिचक कैसी ?

_ जितना सामर्थ्य हो जितनी बुद्धि ज्ञान हो उतने से ही शुरू कर दें,
_ उसके बाद आगे रास्ता अपने आप बनना शुरू हो जाएगा.!!
अगर अच्छे कामों पर भी लोग शक करें तो फिक्र मत करो,
_ सोने की ही तो परख होती है, कोयले की परख कोई नहीं करता.!!
सही सोच के साथ जीवन में खुद को आगे बढ़ाए और औरों के लिए भी प्रेरणा बनने की कोशिश करें..

_ जीवन में जो भी आप दोगे, वही आपको भी मिलेगा.
_ कर्म लौट कर आता है.. सतर्क रहें सुरक्षित रहें.!!
कर्म ही भाग्य है, अपने कर्म ठीक रखें.

_ कर्म अच्छे होंगे तो बिगड़े काम भी बन जाएंगे.
_ अन्यथा सब किया हुआ नष्ट हो जाता है.
_ आप कितनी भी मेहनत कर लो,
_ आपकी नियत ठीक नहीं है तो.. सब मिला हुआ खो जाता है.!!
कोई किसी के कर्म का भागीदार नहीं होता..

_ सबकुछ अपने कर्मों से घटित होता है,
_संचित कर्मों से लेकर नये कर्म तक इंसान का साथ कभी नहीं छोड़ते..
_ वो हमें तबतक पकड़े रखते हैं, जबतक हम उनको भोग न लेते..!!

सुविचार – चेहरा – चेहरे – चहरे – चहरा – चेहरों – मुखौटा – मुखौटे – शक्ल – नकाब – 140

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मैं किसी का चेहरा पढ़ने की कोशिश नहीं करता, लेकिन ये सच है कि कुछ चेहरों पर अजीब सी चमक होती है, जैसे भीतर कोई दीपक जल रहा हो.

_ और कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिन पर जैसे कोई अनकहा बोझ रखा हो.
_ फर्क बहुत बड़ा नहीं होता, लेकिन बहुत गहरा होता है.
_ एक ने जीवन जिया होता है, दूसरे ने कुछ भी करके पैसा कमाया होता है.!!
– Sanjay Sinha
चेहरा तो मिल जाएगा हमसे भी ख़ूबसूरत..

_ बात जब दिल की आएगी तो हार जाओगे..!!

हमारे यहाँ चेहरे की खूबसूरती तो देखते हैं..

_पर चेहरे के अंदर दिमाग नहीं देखा जाता.!!

अब तो मन को भी किसी से मिलकर खुशी नहीं मिलती,

_ लोगों के चेहरों पर इतने मुखौटे हैं कि किसी से बात करने में भी घबराहट होती है.
“जब बाहर के झूठे चेहरे समझ आने लगें तो समझो — मन अब सच्चाई को पहचानने लगा है”
स्वयं के लिए मैं कुछ और हूँ, घरवालों के सामने कुछ और, दोस्तों के बीच कुछ और.. – और दुनिया की नज़रों में बिल्कुल कुछ और..!

_ कभी-कभी सोच में पड़ जाता हूँ इन सब रूपों में से असली मैं कौन हूँ ?
_ मेरी वास्तविकता आख़िर किस चेहरे, किस ख़ामोशी,किस कोने में वास करती है.!!
कुछ लोग चेहरे पर.. अपने बने रहने का नकाब लगाकर मिलते हैं, और फिर धोखा देते हैं.!!
इस दौर में एक बात अच्छी हुई है, लोगों के चेहरे साफ दिखने लगे हैं..!!
चेहरे की रौनक छीनने वालों से कभी मुलाकात ना हो तो बेहतर है.!!
जिन लोगों का बड़ा मान-सम्मान करते थे, उन लोगों का भी दोहरा चेहरा सामने आया.!
“बनावटी मुस्कुराहटों का मुखौटा ओढ़े.. यहां सब नाख़ुश से हैं !”
शक्ल की कम खूबसूरती भी एक अनमोल नेमत है,

_ जो हमें अपने अंदर की असली खूबसूरती पहचानना सिखाती है.!!
चेहरे से इंसान पहचानने कि कला थी मुझ में,

_हैरानी तब हुई जब इंसान के पास बहुत चेहरे देखे..!!

अब इंसान को चेहरा देख कर नहीं पहचाना जा सकता,

_अब लोगों के चेहरों पर मुखौटे चढ़ गए हैं..!!

चेहरे पे चेहरे, लोगों ने पोत रखे इतने..

_ एक–दो जान भी लो, फिर भी आप अंजान ही रहोगे..!!

आप छोड़ दो कोशिशें इंसानों को पहचानने की..

_ यहां जरूरतों के हिसाब से सब नकाब बदलते हैं..!!

कमाल के कलाकार हैं वो जो हर जगह नया नकाब पहनते हैं ; पर अफ़सोस !!

_ आख़िर में उनका असली चेहरा भी पहचानने लायक नहीं बचता.!!

हम दूसरों की नज़रों में अच्छे दिखने के लिए जीते हैं, जबकि सवाल ये है, क्या हम खुद की नज़रों में सच्चे हैं या किसी मुखौटे के पीछे छिपे हुए हैं.!!
ये लफ्ज़ इस चहरे से मेल नहीं खाते…

_ इतनी गहरी लाइनें तो किसी झुर्रीदार चहरे की मिल्कियत होती हैं….अक्सर.!!

हर चेहरे की मुस्कान को सच मत समझो.. बहुत सी मुस्कानें चेहरे पर इसलिए चढ़ाई जाती हैं कि अपना दर्द छुपा रहे और दूसरों के चेहरे पर मुस्कान बनी रहे.!!
दुनिया आपको विकल्प समझेगी, और निगल लेगी आपके चेहरे की रौनक,

आप अपनी खुशियों की जिम्मेदारी खुद लेना…
आप खुद की प्राथमिकता हो इस पर अड़े रहना.!!
जब दुनिया का असली चेहरा पास से दिख जाए.. तब सबसे दूर रहना भी एक तरह की बुद्धिमानी बन जाता है.!!
कुछ अँधेरे ही अच्छे हैं, कम्बख्त रोशनी में अपनों के असली चेहरे सामने आ जाएंगे..!!
चेहरों से पहचान होती है,_चेहरों से परख नहीं होती !!
रंग चेहरे के बोल पड़ेंगे, उनसे बस बात छेड़ना मेरी..!!
धोख़ा देती है शरीफ चेहरों की चमक अक्सर..

_ हर कांच का टुकड़ा हीरा नहीं होता..!!

जो हो वही रहो, नक़ाबों की दुनिया में असली चेहरों की क़ीमत ज़्यादा होती है.!!
यहाँ सिर्फ मुस्कुराते चेहरे दीखते हैं,

_ पर आँख का पानी का रंग मुस्कुराते चेहरे से मेल नहीं खाता, वो अपना अलग राग गाता है.!!

झूठ बोलना आता तो शायद कुछ चेहरे आज पास होते..

_ पर क्या करूं, दिल ने कभी सच्चाई से समझौता करना नहीं सीखा.!!

चेहरा सिर्फ मन की बात नहीं कहता,

_ बल्कि किसी के पूरे व्यक्तित्व को आप उसके चेहरे में पढ़ सकते हैं.
_ विद्वान व्यक्ति का नूर उसके चेहरे पर झलकता है.
_ मूर्ख व्यक्ति की मूर्खता भी उसके चेहरे पर नज़र आती है.
आदमी को सिर्फ वहम है, पास उसके ही इतना गम है.

_ पूछो हँसते हुए चेहरों से, आंख भीतर से कितनी नम है.!!
मुखौटे नहीं है यह .. हर किसी के मन में अपनी छवि अंकित होती है.. जो आहत होती रहती है बार बार.!!
किसी इंसान की सहनशीलता को इतना ना परखो कि वो चुप्पी छोड़कर आपके हर मुखौटे को गिरा दे.!!
अगर मुस्कराहट से चेहरे का आकर्षण बढ़ जाता है, तो वह चेहरा सुन्दर है,
_ अगर उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता तो वह साधारण है और अगर मुस्कराहट उसे बिगाड़ देती है,
तो वह चेहरा बदसूरत है.
यदि आपको ज्यादातर लोगों के असली चेहरे और असली इरादे दिखने लगें, जो वो अपने चेहरे के पीछे छुपाते हैं,

_ तो हो सकता है कि आप बिल्कुल अकेले हो जाएं..!!

कभी-कभी हमारा अनुभव कठिन रहता है, लेकिन याद रखना हर कोई नकाब के पीछे नहीं छुपता..

_ वहाँ सच्चे, दयालु लोग हैं जो वास्तविक आपको देखेंगे और सराहना करेंगे.

_ सार्थक कनेक्शन की संभावना के लिए खुले रहें – कभी-कभी, यह सबसे अप्रत्याशित स्थानों पर होता है कि हम उन लोगों को पाते हैं जो वास्तव में परवाह करते हैं.

“अपना चेहरा दूसरों से छिपाना आसान है, लेकिन अपनी मूर्खता छिपाना नामुमकिन है.”

“It’s easy to hide your face from others, but it is impossible to hide your stupidity.”
उफ़ ! कितना लम्बा यह जीवन !

_ जैसे-जैसे हम जीवन जीते जाते हैं, वैसे-वैसे हमारा चेहरा बदलता जाता है.
_ सिर्फ उम्र की लकीरें नहीं, हमारे जीये हुए सुख-दुःख भी हमारे चेहरे पर लकीरें छोड़ जाते हैं.
_ जिसने जीवन में जितने ज्यादा दुःख भोगे होते हैं, या महसूस किए होते हैं, उसका चेहरा उतना ही ज्यादा बुढ़ाया हुआ लगता है.
_ चेहरा हमारे मन की किताब होता है, इसलिए इस पर ताज़गी बनाए रखने के लिए हमेशा खुश रहें.!!
– Manika Mohini
लोग कहते हैं कि… चेहरा क्या देखते हो, दिल में उतरकर देखो ना..!!

_ लेकिन मैं आपसे कह रहा हूँ … चेहरा ही देख लो मेरा,
_ क्योंकि दिल में उतरने भर की जगह भी नहीं है.
_ वैसे भी दिल मेरा खून से भरा है और उसमें उतर भी गए तो.. मेरा खून ही चूसोगे.!!
ये जो दुनिया में बड़े-बड़े महान अमीर लोग दिखते हैं और जिन्हें आप अपना आदर्श मान बैठते हो, यह आवश्यक नहीं कि वो वैसे ही हैं.. जैसे आपको नज़र आते हैं.

_ क्योंकि वास्तविक दुनिया.. दिखने वाली दुनिया से विपरीत होती है.
_ इन बड़े-बड़े महान नामी चेहरों के पीछे कितना घिनौना नीच इंसान छुपा हो सकता है, यह आप कल्पना भी नहीं कर सकते.!!
“दुनिया में जो लोग ऊँचाई पर नज़र आते हैं, ज़रूरी नहीं कि भीतर से भी उतने ही उजले हों.
_ दिखने वाली सफलता अक्सर एक मुखौटा होती है, और असली दुनिया – उसके ठीक उलट.
_ शायद इसी वजह से यहाँ भरोसा करने से डर लगता है”
_ और सच कहूँ तो… यह डर कमजोरी नहीं है, यह अंतरदृष्टि है.
_ जो लोग जल्दी आदर्श नहीं बनाते, वे अक्सर गहराई से देखना जानते हैं.!!
हाँ, यह बात थोड़ी कठोर लेकिन सच्ची है.

_ जैसे-जैसे उम्र और अनुभव बढ़ते हैं, बहुत से लोगों को दुनिया से थोड़ा-सा मोहभंग होने लगता है.
_ इसके कुछ कारण होते हैं :
1. हम लोगों को असल रूप में देखने लगते हैं.
_ युवा उम्र में हम मानते हैं कि लोग वैसे ही होंगे जैसे वे कहते हैं.
_ समय के साथ दिखता है कि कहना और होना अलग-अलग है.
2. अपेक्षाएँ धीरे-धीरे टूटती हैं.
_ हम सोचते हैं कि रिश्ते हमेशा सच्चे होंगे, लोग न्यायप्रिय होंगे.
_ जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर एक थकान पैदा होती है.
3. समझ बढ़ती है, पर मासूमियत कम हो जाती है.
_ यह जीवन का स्वाभाविक चरण है –
_ समझ बढ़ती है, पर सरल विश्वास थोड़ा कम हो जाता है.
_ लेकिन यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ भी होता है.
_ यही समय है जब इंसान दो रास्तों में से एक चुनता है:
_ या तो कड़वाहट में जीना, या शांत समझ के साथ जीना..
_ जो दूसरा रास्ता चुन लेते हैं, वे धीरे-धीरे समझ जाते हैं:
“दुनिया पर भरोसा कम भी हो जाए, तो भी जीवन पर भरोसा रखा जा सकता है”
“समझ बढ़ने का दुख यह है कि भ्रम टूट जाते हैं, पर सौभाग्य यह है कि सच दिखाई देने लगता है”
और एक अंदर देखने वाला प्रश्न:
“क्या मैं दुनिया से निराश हो रहा हूँ,
या मैं दुनिया को पहली बार सही रूप में देख रहा हूँ ?”
**“जो कहा जाए उसे तुरंत मत मानो.

_ जो दिखे उसे अंतिम सत्य मत समझो.
_ प्रश्न करो, परखो, फिर अपने विवेक से स्वीकार करो.
_ क्योंकि यह समय धुंध का समय है- जहाँ रोशनी भी कई बार भ्रम पैदा करती है.
_ ऐसे समय में सवाल करना ही मनुष्य को जाग्रत और सही राह पर रखता है”**
– “धुंध भरे समय में सवाल करना ही इंसान की सबसे सच्ची रोशनी है”
“प्रश्न करना मन को जाग्रत रखता है, पर विश्वास ही जीवन को गरमाहट देता है”
– “जो हर बात पर प्रश्न करना सीख गया, उसके लिए सच का रास्ता धीरे-धीरे साफ़ हो जाता है”
– हर बात को आँख बंद करके मत मानो, लेकिन हर बात को शक से भी मत देखो ;
समझो, परखो, फिर अपने विवेक से स्वीकार करो.
आदमी जो बोलता है उस पर शक करो,

_ जो भी करता है उसे शक की निगाह से देखो,
_ जो समझता है उस पर सवाल करो,
_ जो उत्तर देता है उन उत्तरों पर उल्टे प्रश्न करो,
_ कुल मिलाकर बात यह है कि यह सब करने से हमारे विश्वास, भरोसे और हमारी धारणाएं पुख्ता होंगी और हमें रास्ते बहुत साफ नजर आएंगे.
_ क्योंकि यह समय ऐसा समय है जब हम धुंधलकों में है, अंधियारे हमें दिग्भ्रमित कर रहें हैं,
_ हमें ऐसे संदर्भों से मुब्तिला कर रहें है कि हम बहुत दयनीय स्थिति में है और जाहिर है सारी विपरीत परिस्थितियों के बाद भी हमारा ठीक रहना और खुश रहना बहुत जरूरी है.
– Sandip Naik

सुविचार – हमें कब किसी को मैसेज और कॉल करना बंद कर देना चाहिए – 139

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आज मैं आपको बताऊँगी कि हमें कब किसी को मैसेज और कॉल करना बंद कर देना चाहिए 2 मिनट निकालकर इसे जरूर पढ़ें :—

1 — जब आप को अंदर से यह अहसास होने लगे की मात्र उसका अटेंशन और प्यार पाने के लिए आपको अपनी Self Respect खोनी पड़ रही है तब आपको उसे कॉल और मैसेज करना बंद कर देना चाहिए।
2 — जब वे आपकी‌ कॉल और मैसेज का रिप्लाई देने में लंबे अंतराल या कई दिनों के बाद देने लगे जबकि दूसरी तरफ वह दूसरों के लिए वह आसानी से उपलब्ध है तब आपको उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
3 — जब वे बातचीत जल्दी खत्म करने के बहाने बनाने लगे, लेकिन जब आप ऐसा नहीं करने देते तो वे पुरानी बातों से कोई न कोई इलज़ाम थोपने लगे तब आपको उस से कॉल और मैसेज करना बंद कर देना चाहिए।
4 — जब वे आपसे बात ना करने के नए नए बहाने खोजने लगें, उनकी जिंदगी में क्या चल रहा है जब यह बताने में कतराने लगे, तब उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
5 — जब वे हमेशा आपका अपमान करने लगें, आपकी इस शिकायत पर की समय क्यों नहीं दे रहे हैं आपको बहानों कि एक लंबी सूची देने लगे, तब आपको उसे कॉल और मैसेजेस करना बंद कर देना चाहिए।
यह कुछ मेरे खुद के तजुर्बे से मैंने आपको यह बातें बताई हैं।
मैं आशा करती हूं कि आपको यह मेरी पोस्ट पसंद आई होगी।
मेरी पोस्ट पढ़ने के लिए आपका तहे दिल से धन्यवाद।🙏🏻💐
– Neha Chandra

सुविचार – ग़लतफ़हमी, गलतफहमी, गलतफ़हमी – 138

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ग़लतफ़हमी ……

किसी भी तरह की ग़लतफ़हमी दिल में न पालें, इसके आधार पर कोई भी सम्बन्ध न तोड़ें, जब भी किसी बात पर शंका हो बातचीत के जरिये उसे सुलझाने का प्रयास करें, याद रखें ज्यादा त्तर गलत फहमी हमारे शंकालु दिमाग या परिस्थितियों की उपज होती है !!

अगर आप सोच रहे हो कि वक़्तके साथ ज़िंदगी आसान हो जाएगी..

_ तो इस ग़लतफ़हमी से निकलो यार.. मज़बूत तो आप को ही होना पड़ेगा.!!

खुशफ़हमी असल में होती तो ग़लतफ़हमी ही है,

_ बस हम किसी ग़लतफ़हमी के सच होने के मुगालते में उसे खुशफ़हमी कह देते हैं.

इस गलतफहमी में मत रहिए कि कोई आपको आपके मधुर स्वभाव की वजह से पसंद करता है.

_ हो सकता है कि आप बस उसका खाली समय बिताने का एक ज़रिया हों.!!
जुड़े रहने के लिए बेइंतहा भरोसा चाहिए..

_ बिछड़ने के लिए एक गलतफहमी ही काफ़ी है..!

अगर आप को पूरी बात नहीं पता तो चुप रहना ही बेहतर है,

_ अधूरी जानकारी से राय बनाना ग़लतफ़हमी जो जन्म देता है.!!

गलतफहमी मत पालो की बर्दाश्त करने वाला हमेशा चुप ही रहेगा..
_ कभी-कभी वो सबसे बड़ा तूफान बन जाता है.!!
गलतफ़हमियाँ ज़रूरी हैं खुश रहने के लिए..- गलतफ़हमियाँ जीने का सहारा होती हैं.
अपने मन में ख़ुद को लेकर गलतफहमी कभी मत पालो और न ही ख्याली पुलाव की दुनिया में जियो.!!

सुविचार – दुख – दुःख – 137

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साइकोलॉजी के अनुसार : आपको दुःख तभी होता है, जब आप किसी व्यक्ति या किसी बात को अपने मन में महत्व देते हैं,

_ अगर आप उस व्यक्ति या उस बात को महत्व देना बंद कर दें, तो दुख भी अपने आप कम हो जाएगा !
_ जब भी आप को दुखी होने का ख्याल आए, ख़ुद से कहें कि इस व्यक्ति या इस बात को महत्व देने से कोई फायदा नहीं है.
_ यही एक मानसिक तरकीब है, जिससे आप चैन से जी सकते हैं,
_ वरना, आप ज़िन्दगी भर किसी न किसी बात को लेकर दुखी होते रहेंगे..!!
खुशियों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हमेशा कभी पूरी नहीं होती और गाहे-बगाहे कम पड़ जाती हैं,

_ जबकि हमारे दुख अपने आपमें – भले एक या बहुत छोटे हो – संपूर्ण होते हैं और इतने भरपूर होते हैं कि वे एक जीवन क्या, समूची कायनात को हिलाकर रख सकते हैं,
_ इसलिए खुशियों को तवज्जों मत दीजिए, दुखों से मनमिली दोस्ती कीजिए, प्यार कीजिए – जीवन खुद-ब-खुद गुलज़ार रहेगा.!!
– Sandip Naik
हम दुखी इसलिए नहीं होते कि जीवन में मुश्किलें आती हैं, बल्कि इसलिए दुखी होते हैं, क्योंकि हमने जीवन से पहले ही बहुत सारी उम्मीदें और कल्पनाएँ जोड़ ली होती हैं.

_ जब जो होता है, वो हमारी बनाई हुई उस तस्वीर से मेल नहीं खाता,
तो मन उसे स्वीकार करने से इनकार कर देता है.
_ और यही इनकार, यही विरोध — असल में दर्द बन जाता है.
_ वही बारिश एक किसान के लिए आशीर्वाद है, क्योंकि उसकी अपेक्षा ठीक वही थी.
_ लेकिन उसी बारिश से शादी वाले घर में लोग परेशान हो जाते हैं, क्योंकि उनकी अपेक्षा कुछ और थी.
_ घटना तो एक ही है — दुख कहीं बाहर नहीं, बल्कि टूटी हुई अपेक्षा के अंदर पैदा होता है.
– राहुल आर्यन
लोगों की नजर में सुख दुख सिर्फ पाने और खोने का नाम है.

_ यानी जो हम चाहें, वह हमें मिल जाए, तो हम सुखी, अन्यथा दुखी. यह सत्य नहीं है.
_ पाने और खोने में सिर्फ तात्कालिक सुख दुख निहित होता है.
_ पाई हुई वस्तु या इंसान को आप ताउम्र पाए रहेंगे, यह आश्वस्ति उस पाने में शामिल नहीं होती.
_ पाई हुई वस्तु ताउम्र आपको खुशी देगी, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती.
_ पाने के बाद कोई अन्य वस्तु, हालात से आप परेशान हो सकते हैं जिसका पाने खोने से कोई ताल्लुक न हो.
_ सब कुछ पाने-मिलने के बाद भी किसी नापसंदगी के लिए मन परेशान हो जाता है.
_ सिर्फ मिलना या ना मिलना ही सुख या दुख का कारण नहीं होता.
_ बात गहरी है.
– Manika Mohini
मैंने अपने और अपने आसपास के बहुत से लोगों के दुखों का अध्ययन किया तो निष्कर्ष यह आया कि व्यक्ति के मानसिक दुख अधिकतर उसकी दुर्बुद्धि के कारण होते हैं और शारीरिक दुख प्रकृति-प्रदत्त.

– Manika Mohini
पहले दुःख भाँप लिया जाता था. अब दुःख मापा जाता है.
_ उसका दुःख कम मेरा दुःख ज़्यादा.
_ इस आधार पर लोगों ने दुःख सुनना और अपनी संवेदनाएँ देना तय कर लिया है.
_ सच कहूँ तो सुन कोई नहीं रहा होता है और झूठी संवेदनाएँ सबके पास है.
_ असल में दुःख बाँटने की अवधारणा इतनी खोखली है ये कोई जानना ही नहीं चाहता है.

_ अनसुने किए गये दुःख, और झूठी संवेदनाओं के इस दौर से ही दुःख का कारोबार अच्छा चल नहीं रहा.
_ दुःख बेच तो सब रहे हैं, पर दुःख इस बात का भी है कि ख़रीदार यहाँ कोई नहीं.
_ खुश दिखने वाले चेहरों का मोल है यहाँ बेशक़ीमती है.
_ दुःख से भरे चेहरों की क़ीमत कबाड़ी की दुकान में पड़े रद्दी से भी कम है.
_ वास्तविकता यही है, मुँह नहीं मोड़िए.
– यूँ हीं
– पथिक मनीष
अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता

_ एक समय था जब मैं हर छोटी-बड़ी बात पर खुद से शिकायत करता था.
– क्यों ऐसा हुआ ?
– मैंने ऐसा फैसला क्यों लिया ?
– मैं दूसरों जैसा क्यों नहीं हूँ ?
– मेरी जिंदगी मेरी उम्मीदों के मुताबिक क्यों नहीं चल रही ?
_ इन सवालों ने मुझे कभी आगे बढ़ने नहीं दिया.
_ मैं हर असफलता का दोष खुद को देता रहा.
_ जो बातें मेरे नियंत्रण में नहीं थीं, उनके लिए भी खुद को कटघरे में खड़ा करता रहा.
_ लेकिन समय ने एक बात सिखाई—हर चीज़ का जवाब हमारे पास नहीं होता.
_ हर हार हमारी गलती नहीं होती और हर जीत सिर्फ हमारी मेहनत का परिणाम नहीं होती.
_ जिंदगी में परिस्थितियाँ, समय और किस्मत भी अपना हिस्सा निभाते हैं.
_ आज मैं अपनी गलतियों को स्वीकार करता हूँ, लेकिन उनके लिए खुद को सज़ा नहीं देता.
_ मैं जानता हूँ कि मैं इंसान हूँ, मुझसे गलतियाँ होंगी, फैसले गलत होंगे और कुछ सपने अधूरे भी रह जाएंगे.
_ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं खुद का दुश्मन बन जाऊँ.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता.
_ जो बीत गया, उसे अनुभव मान लेता हूँ.
_ जो नहीं मिला, उसे सीख समझ लेता हूँ.
_ और जो मिल गया, उसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ.
_ पहले मैं आईने में खड़े होकर अपनी कमियाँ खोजता था, अब अपनी कोशिशें देखता हूँ.
_ पहले मैं अपने जख्म गिनता था, अब उनसे मिली सीख को याद रखता हूँ.
_ जिंदगी तब आसान नहीं हुई, लेकिन उसे देखने का नजरिया बदल गया..
_ और जब नजरिया बदलता है, तो शिकायतें धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं.
_ आज भी मुश्किलें हैं, चुनौतियाँ हैं, अधूरे सपने हैं, लेकिन अब मैं खुद से लड़ता नहीं हूँ. _ क्योंकि समझ आ गया है कि दुनिया से लड़ने के लिए सबसे पहले खुद का साथी बनना पड़ता है.
_ अब मैं शिकायतें खुद से भी नहीं करता,
_ क्योंकि मैंने खुद को स्वीकार करना सीख लिया है.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
मन परेशान है, न पढ़ पा रहा हूँ, न लिख पा रहा हूँ.

_ किताबें खुली हैं, लेकिन शब्द आँखों से टकराकर लौट जाते हैं.
_ कलम हाथ में है, लेकिन विचार कागज़ तक पहुँचने से पहले ही कहीं खो जाते हैं.
_ अजीब बात है… थकान शरीर में नहीं, मन में है और मन की थकान दिखाई भी नहीं देती.
– लोग पूछते हैं – “क्या हुआ ?”
_ लेकिन क्या बताऊँ ?
_ कभी-कभी कोई एक कारण नहीं होता.
_ कुछ अधूरे सपने, कुछ टूटी उम्मीदें, कुछ भविष्य की चिंताएँ और कुछ बीते दिनों की यादें मिलकर मन पर ऐसा बोझ बना देती हैं कि साधारण काम भी पहाड़ जैसे लगने लगते हैं.
_ आज मैं पढ़ नहीं पा रहा, क्योंकि मन हर पन्ने से पहले अपने सवालों पर अटक जाता है.
_ आज मैं लिख नहीं पा रहा, क्योंकि शब्दों से पहले दर्द बाहर आना चाहता है.
_ लेकिन शायद जीवन का हर अध्याय उत्पादक होने के लिए नहीं होता.
_ कुछ अध्याय ऐसे भी होते हैं जहाँ इंसान सिर्फ़ खुद को संभालना सीखता है.
_ जहाँ जीतने से ज़्यादा ज़रूरी होता है टूटकर बिखरने से बच जाना.
– मैं जानता हूँ, यह दौर भी गुजर जाएगा.
_ एक दिन फिर किताबों के शब्द अच्छे लगेंगे, फिर कलम कहानियाँ लिखेगी, फिर सपनों में चमक होगी.
_ अभी बस इतना है कि मन थोड़ा थका हुआ है और थके हुए मन को डाँट नहीं, थोड़ा समय चाहिए.!!
जिंदगी इन दिनों —
– पथिक मनीष
कुछ फैसले दुनिया को समझाने के लिए नहीं, खुद को बचाने के लिए लिए जाते हैं

_ कंफर्ट ज़ोन से बाहर निकलना आसान नहीं होता.
_ वहां सुरक्षा होती है, आदतें होती हैं और एक झूठा सुकून भी.
_ लेकिन अगर ज़िंदगी में कुछ कर गुजरने की ज़िद हो, तो वही कंफर्ट ज़ोन सबसे बड़ी कैद बन जाता है.
_ बाहर कदम रखते ही अपनों के ताने मिलते हैं. _ इतना रिस्क क्यों ले रहे हो ?
_ अब इस उम्र में क्या नया कर लोगे ?
_ जो कर रहे हो, उसी में खुश रहो.
_ इन तानों से ज़्यादा डर अपने भीतर पलता है.
_ डर इस बात का कि कहीं उम्मीदें टूट गईं तो ?
_ कहीं मेहनत बेकार चली गई तो ?
_ कहीं मन की राह चुनकर भी मंज़िल न मिली तो ?
_ फिर भी सबसे बड़ा अफ़सोस असफल होने का नहीं होता, बल्कि उस जीवन का होता है जिसमें हम अपने मन का कभी जी ही नहीं पाए.
_ हर इंसान को एक ऐसा स्पेस चाहिए, जहाँ वह बिना जज किए जाने के डर के अपने सपनों को जी सके, अपनी गलतियों से सीख सके और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी लिख सके.
_ शायद मंज़िल मिले, शायद न मिले.
_ लेकिन इतना तय है कि एक दिन आईने में देखकर यह मलाल नहीं होगा कि मैंने कोशिश ही नहीं की.
_ कभी-कभी सबसे बड़ी जीत, दुनिया को हराना नहीं होती.
_ अपने डर, अपने संकोच और दूसरों की उम्मीदों के बोझ से बाहर निकल आना ही असली जीत होती है.
जिंदगी इन दिनों — 🌼
– पथिक मनीष Pathik Manish
मुझे लगता हैं कि जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं…जो यह इतना दुःख दे रहा है..

_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
_ शायद जीवन गलती नहीं कर रहा — बस हमें यह दिखा रहा है कि हम अभी अपने सच्चे स्वरूप से कितने दूर हैं.
_ दुःख वहीँ जन्म लेता है.. जहाँ हम वास्तविकता से टकराते हैं.
_ कभी-कभी यह दुःख-पीड़ा, जीवन का सबसे गहरा आमंत्रण होती है — भीतर झाँकने का, यह देखने का कि “मैं कौन हूँ” जब सब कुछ टूट रहा होता है.
_ हो सकता है, दुःख हमें गलत नहीं, बल्कि सही दिशा की ओर मोड़ रहा हो.!!
दुख ही जगाता है, सुख तो सुलाता है.!!
“जीवन में इतना दुःख नहीं हो सकता..
_ शायद गलती जीवन में नहीं, हमारे जीने के तरीके में है.”
_ जीवन को जीने में हम ज़रूर कोई गलती कर रहे हैं.. जो यह इतना दुःख दे रहा है.!
_ क्योंकि ये सच नहीं हो सकता…इतना दुःख हो ही नहीं सकता.!!
कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली करनी पड़ती है कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.

_ दुख में सब्र करने का यह अचूक नुस्खा है कि यह सोचिए, इससे बड़ा भी दुख हो सकता था.
_ कुछ बुरा हो जाए तो यह सोच कर तसल्ली कीजिए कि इससे भी ज़्यादा बुरा हो सकता था.
_ दुख सहने की शक्ति मिलेगी.!!
अगर दुख में आप रस लेने लग गए, तब तो आप ने सुख के सब द्वार बन्द कर दिए. _ दुखी रहते- रहते, बहुत दिन तक दुखी रहते- रहते दुख के साथ संग बन गया, संबध बन गए. _ फिर तो अगर कोई आ भी जाए सुख देने, तो भी आप द्वार बन्द कर लेंगे.!!
पेड़ों की तरह हमारे जीवन में भी कई दौर आते हैं..

_ हमारे हिस्से भी पतझड़ आते हैं..
_ कभी हम अनंत दुःख की गहराइयों में डूब जाते हैं, मानसिक अवसाद के घने अंधेरों से घिर जाते हैं, पर समय सदा एक-सा नहीं रहता..
_ जब दौर बदलता है, तो सूखी शाखाओं पर फिर से उम्मीदों की नई कलियाँ फूट पड़ती हैं, और जीवन एक बार फिर हरियाली ओढ़ लेता है.!!
हर व्यक्ति को लगता है कि उसी ने सबसे ज्यादा दुःख झेलें हैं, लेकिन सच तो यह है कि हमसे भी ज्यादा दुःख झेल चुके लोग हिम्मत के साथ लड़ रहे हैं.!!
कभी-कभी जो दरवाज़ा बंद हो होता है, वह हमें दुख से बचाता है.

_ गलत जगह से हटना हार नहीं, अपने सम्मान का चयन है.
_ नियति जब रुख मोड़ती है तो इसलिए कि.. आगे कुछ अधिक उपयुक्त और विशाल आपका इंतज़ार कर रहा है.!!
दुःख के दिनों में जो भी साथ खड़ा रहे, उसका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का, जिनके साथ की हमें कोई उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग हमारी बोझिल होती ज़िंदगी का भार थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और यह एहसास दिलाते हैं कि अभी भी मुस्कुराया जा सकता है.!!
बहुत से लोग अपने दुखों में भी हमारे पास इसलिए आते हैं, ताकि वे अपनी स्थिति की तुलना हमारी स्थिति से करके संतुष्टि महसूस कर सकें.!!
ये हिसाब नहीं रखना की कितना पाया कितना गवाया..!

_ बस चाहत इतनी हो कि दुख वहाँ से न मिले.. जहाँ अपना सुख लुटाया..!!
जिदंगी जीना ही है तो क्या सुख क्या दुख..
_ और दिहाड़ी लगानी है तो क्या छांव क्या धूप.!!
“दुख की जड़ कमी नहीं…

_ अधूरी उम्मीदें और लगातार औरों से तुलना है.”
एक दिन हम अपने दुःखो के साथ भी सहज हो जाते हैं,
_ फिर किसी भी तरह का नयापन हमें असहज लगने लगता है.!
दुःख-दर्द मुफ़्त में मिल जाते हैं.. – ख़ुशी लाख खर्च करने पर भी नहीं मिलती.!!
किसी ने दूसरों को कितना दुख दिया है,

_इसका एहसास उसे तब होता है.. जब कोई उसे वैसे ही दुःख देता है.
दूसरों को दुखी करके कोई भी व्यक्ति स्थायी सुख नहीं पा सकता..

_ समय हर चीज़ का हिसाब रखता है
कुछ दुःख अपनों के साथ भी सांझे नहीं किये जा सकते.!
_ इन दुखों के साथ ही जीना होता है.!!
कुछ दुख ऐसे होते हैं जो बताने के लिए नहीं होते.
_ बस जी कर भूल जाने के लिए होते हैं.!!
दुख बता कर नहीं आते..

_ वे किसी भी पल बादलो के बीच से झांक लेते हैं.!!
मानसिक रोगी होते हैं वो लोग..- जो किसी के दुख पे खुश होते हैं.!!
और एक दिन “दुःखों के लिए कान तो रहते हैं, ज़बान नहीं रहती.!!”
किसी दुखी इंसान को तर्क देकर नहीं समझाया जा सकता, यहाँ समानुभूति (empathy) ही काम आएगी.. जैसे भूखे को पहले खाना चाहिए ज्ञान नहीं..!!
अपने दुःख-तकलीफ पर तुरंत एक्शन लें, कोई दूसरा नहीं आयेगा.!!
जब आप दूसरों के लिए अच्छे बन जाते हैं, तो अपने लिए भी आप बेहतर बन जाते हैं.
दुख को सहने के बाद मिला सुख दोगुना आनंद देता है.!!
हम उन लोगों को दुख पहुँचाते हैं.. जिन्हें हम सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं – और यह सही नहीं है.!!
किसी को बहुत नज़दीक से जान लेना कभी-कभी बहुत दुख देता है.!!
टूटना, गिरना, गिरकर फिर से उठना और आगे बढ़ना, यहीं जिंदगी का सफर है..

_ जो सकारात्मक ऊर्जा फैला रहा हो उसके जीवन में भी कष्ट है, दुःख है और पीड़ा भी है, यहीं वास्तविकता है.!!
हर किसी के पास कोई न कोई
झोला होता है, जिसमें सुख-दुःख भरे होते हैं, पर कहे भी तो किससे..
_ कुछ लोग चुपचाप बिन शिकायत ढोते हैं.
कोई हमारा दुःख सुनने में रूचि नहीं रखता,
_ बल्कि वो तो ये तोलने में व्यस्त रहते हैं कि वो हमसे ज्यादा सुखी तो नहीं हैं.!!
दुखी होने का भेद यही है कि आप के पास यह सोचने के लिए अवकाश हो कि आप सुखी हैं या नहीं.!!
इस जीवन कि पाठ्शाला में हमें यही तो सीखना है कि समय के साथ कदम से कदम मिलाकर कैसे चला जाए, वरना हमेशा किसी न किसी बात को लेकर ऎसे ही दुःखी रहेंगे.
जीवन सतत चलता रहता है और उसे चलते रहना भी चाहिए ;

_ सुख -दुःख, प्रसन्नता -पीड़ा आते -जाते रहते हैं..
_ जब जैसी परिस्थितियां होती हैं.. इंसान उस अनुकूल ख़ुद को ढाल लेता है.
_ जीवन का लचीलापन जीवन को सुगम बनाता है और अकड़ जीवन को कठिनाइयों से भर देती है.!!
कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका होना पूरी उम्र भीतर कहीं चुभता रहता है.

_ ऐसे क्षणों में इंसान खुद को भीड़ के बीच भी अकेला, सबसे दूर किसी हाशिए पर खड़ा महसूस करता है.
_ हताशा और निराशा के ये दौर बेहद कठिन होते हैं, लेकिन इन्हीं पलों में खुद को यह याद दिलाते रहना ज़रूरी है कि.. दुःख स्थायी नहीं होता.!!
दुःख मनाने के लिए भी सही समय का इंतजार करना चाहिए, जब जीवन एकांत देने की स्थिति में न हो, तब बेहतर है कि कुछ समय के लिए अपने शौक स्थगित कर दें और अपनी जिम्मेदारियों और व्यस्तताओं का ध्यान रखें.!!
दुःख कभी जिंदगी नहीं खाता, वो बस जिंदगी की रोशनी बुझा देता है.

_ दुःख बाहर से हमारा कुछ नहीं बिगाड़ता, चेहरा वही रहता है, आवाज़ भी वही, लेकिन भीतर जैसे मन की दीवार में रोज़ एक ईंट कम हो रही है.
_ दुःख को सजाकर अच्छा नहीं दिखाया जा सकता, इसे सिर्फ झेला जा सकता है, खामोशी से चुपचाप.!!
दुःख से ज्यादा निजी कुछ भी नहीं होता, ये वो अहसास है जिसे हम लाख बताना चाहें, फिर भी कोई पूरी तरह समझ नहीं पाता..

_ हर इंसान का दुःख उसका अपना होता है कभी यादों से जुड़ा, कभी रिश्तों से, कभी उम्मीदों के टूट जाने से.!!
कभी-कभी अनजाने में ही हम उन लोगों का दिल दुखा देते हैं, जिनके बारे में हमें यह तक एहसास नहीं होता कि हमारी कही हुई बात उन्हें बुरी लग सकती है..
_ हालांकि किसी को ठेस पहुँचाने का इरादा नही होता..
_ बस शब्द अपनी जगह से फिसल जाते हैं और असर वहाँ पड़ जाता है.. जहाँ हमने सोचा भी नहीं होता.!!
समय के साथ दुःख की टीस हल्की पड़ जाती है,

_ मगर वो पल, वो सुख, वो संपूर्णता.. जो कभी हमें मिला था, उसे खो देना…
_ भीतर एक ऐसी खाली जगह बना देता है… जो उम्रभर महसूस होती रहती है.
_ इंसान दर्द तो भूल जाता है, लेकिन वो एहसास और वो यादें हमेशा दिल की गहराइयों में जिंदा रहती हैं.!!
दुःख में जो भी साथ रहे, उनका शुक्रिया हमेशा बनता है..

_ खासकर उन लोगों का.. जिनकी हमें उम्मीद भी नहीं होती..
_ ऐसे लोग आपकी बोझिल ज़िंदगी को थोड़ा हल्का कर देते हैं..
_ और फिर लगता है कि अभी भी जिया जा सकता है,
_ और जिनसे उम्मीद थी, पर वे साथ न रहे.. उनका भी शुक्रिया बनता है..
_ उन्होंने आपको उस झूठी उम्मीद से आज़ाद किया.. जो आप उनसे लगा बैठे थे.!!
अक्सर देखा गया है जब इंसान खुश होता है, सब सही चल रहा होता है.. तब अपना दिमाग कहीं नही भटकाता है, अपने तक ही सीमित रहता है.

_ लेकिन जैसे ही दुख आते हैं उसे बहुत दूर तक का दिखने लग जाता है..
_ दिमाग में बहुत सारे विचार आने लगते हैं.
_ इंसान ज़िन्दगी जीना सीखता दुख से ही है, सुख में तो वो बस ज़िन्दगी काटने लग जाता है.!!
दुःख को जानना और दुःख भरी बातें करना दोनों में बड़ा आयामी अंतर है…

_ दुःख को जानना दुखों को समा लेना उनको स्वीकार कर लेना है पर दुःख पे दुःख भरी बातें करते जाना, एक के बाद एक दुःख को खोद खोदकर निकालना, जहां नहीं है वहां दुख को बना देना, अगला दुख, पिछला दुख, न जाने किनका किनका दुःख जिनसे बात करने वाले का सरोकार नहीं यही दिखाता है कि इंसान दुख को आदत बनाकर उससे रस लेता है…
– दुख का रस…
_ यह रस बड़ा गहरा होता है, जिसके मुंह इसका स्वाद लगा वह छोड़ नहीं पाता,
_ ऐसा नहीं की दुख नहीं, जीवन है तो दुख है, पर दुख का रस स्वयं बनाते हैं चाशनी मिलाकर…
_ सामने वाले का रस लेकर सुना जाना सुनाने वाले का हासिल होता है…
_ पर इससे असली दुख नजरअंदाज नहीं होता, वह तो है ही…वहीं है ठीक वहीं..!!
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