सुविचार – अपमान – अनादर – तिरस्कार – 060

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*क्या है अपमान ?*

किसी व्यक्ति की वह व्यक्तिगत कल्पना जिसमें वह दूसरों से *वेवजह सम्मान* की चाह रखता है और उस चाह का पूरा ना होना ही अपमान कहलाता है. *अपेक्षा की उपेक्षा का ही तो नाम अपमान है*. हमें दूसरों से कम अपनी सोच से ज्यादा अपमानित होना पड़ता है.

किसी ने नमस्कार ना कर हमारा *अपमान* कर दिया, यह सिर्फ हमारी सोच है. उसने तुम्हारा अपमान नहीं किया, उस बात को *बार-बार सोचकर* तुम खुद अपना अपमान करते हो. जो लोग मान और सम्मान पर ज्यादा विचार करते हैं वही तो *बेचारे* कहलाते हैं। अतः अपनी सोच का स्तर ऊपर उठाकर *मान-अपमान* से मुक्त होकर *प्रसन्नता* के साथ जिन्दगी जीओ.

जहां से एक बार अपमान का घूंट पीकर वापस आ जाएं,

_ निमंत्रण मिले तो भी वहां न जाएं.!!

सार्वजनिक रूप से की गई आलोचना अपमान में बदल जाती है

और एकांत में बताने पर सलाह बन जाती है.

किसी के अपमानित करने से आप अपमानित नहीं होते..
_ अपमानित तब होते हैं जब आप अपने भीतर अपमानित महसूस करते हैं.
किसी भी तरह के अपमान को सिर्फ इसलिए मत सहन कीजिए कि उसका कारण प्रेम है.!!
” उन्होंने मेरा अपमान किया ,,,”कितनी बार मैंने ऐसा महसूस किया और आज तक वह दर्द पकड़ा है.

_ उन्होंने अपने संस्कारों अनुसार व्यवहार किया, और मैंने उसे अपना अपमान समझ लिया.
_ मुझे मान और महिमा की जरुरत नहीं, कोई मेरा अपमान नहीं कर सकता.
दुरी ही अनादर का एकमात्र उत्तर है, प्रतिक्रिया न करें, बहस ना करें, बस अपनी उपस्थिति हटा दें.!!

सुविचार – घर – 059

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जब हम किसी स्थान को छोड़ते हैं तो हम अपना कुछ न कुछ पीछे छोड़ जाते हैं, दूर चले जाने पर भी हम वहीं रहते हैं

_और हमारे अंदर ऐसी चीजें हैं जिन्हें हम केवल वहां वापस जाकर ही दोबारा पा सकते हैं.

We leave something of ourselves behind when we leave a place, we stay there, even though we go away. And there are things in us that we can find again only by going back there. – Pascal Mercier

“आपका घर तनाव का इलाज होना चाहिए, _न कि इसका कारण”

“Your home should be the antidote to stress, not the cause of it.” —Peter Walsh

” मैं अब घर जाना चाहता हूँ लेकिन घर लौटना नामुमकिन है, क्योंकि घर कहीं नहीं है.” – श्रीकांत वर्मा
छूट जाता है सब कुछ वहीं

कि घर छूटता है
लेकिन उसका मोह नहीं
घर की महक
भटकती रह्ती है आस-पास
लगातार
हम तलाशते हैं रास्ते
तय करते है सफ़र
लेकिन कोई होता है भीतर
जो लौट जाना चाहता है घर की ओर
हमें मालूम है
सारे रास्ते तय करने के बाद
हमारे चेहरे घर की तरफ़ ही होंगे
लेकिन तब
क्या घर होगा वहाँ
उसी तरह
– संजीव गुप्त
मेरे खुदा, मुझे इतना तो मोतबर कर दे.

_ मैं जिस मकान में रहता हूँ, उसको घर कर दे.
(इफ्तेख़ार आरिफ़)
“मकान जितने भी सुन्दर हों, घरों से ज़्यादा सुन्दर नहीं होते.”
_ कोठी-बंगलों में भी कई बार घर नहीं होते..
_ और कई बार एक कमरे में भी घर होता है.
_ सुन्दर घर किसे अच्छे नहीं लगते.
_ घर सुन्दर होते हैं सुन्दर लोगों से..
_ सुन्दर वे लोग होते हैं.. जिनके दिल सुन्दर हों.
_ खूबसूरत घर यूँ ही नहीं बन जाते, उसके लिए बड़ी क़तर-ब्यौंत करनी पड़ती है, उखाड़-पछाड़ करनी पड़ती है.
_ छोटों को हँसना सिखाने के लिए बड़ों को कई बार रोना पड़ता है.
_ अनुशासन सिखाने के लिए खुद अनुशासन में रहना पड़ता है.
_ आज़ादी और उच्छृंखलता के बीच फ़र्क बताने का काम, आधुनिकता और परम्परा के बीच तारतम्य बैठाना सिखाने का काम कोई आसान नहीं.
_ मुश्किलों से गुज़र कर ही आसानियों को पाया जाता है.
_ छोटे कभी बड़े नहीं बनते, बड़ों को छोटा बनना पड़ता है.
_ मुश्किल से कोई मकान घर बनता है.
_ घर बनाएँ, खुशियां लायें.!!
– Manika Mohini
‘मेरा घर तेरे घर से बड़ा’ कहने को ‘घर’ लेकिन बिना प्रेम की छत, बिना प्रेम की नींव..- घुटन भरा.!

_ डिब्बियों [Flat] को भी मजबूरी में घर कहने लगे लोग.!!
मानव सदियों से जंगलों में रहता आया है.
_ इधर बीसवीं सदी से एक स्वैच्छिक पिंजरे बन्दी में उसकी रुचि बढ़ी है.
_ विकास के नाम पर दुनिया में गगनचुंबी इमारतों का गढ़ा जाना शुरू हो गया.
_ मध्यम वर्गीय लोगों ने भी इन गगनचुंबी इमारतों का स्वागत किया और इनमें बन्दी बनने में गहरी रुचि दिखाई.
_ हर कोई ‘मेरा अपना फ्लैट हो’ का गाना गाते हुए प्रवेश करने लगा.
_ बिल्डरों की भी बाढ़ आ गयी.
_ रुपया लोगों की जेबों से निकल कर गगनचुंबी इमारतों में घुसने लगा.
_ यह सब वहां तक तो ठीक-ठाक है जहां बड़े महानगरों में जमीन उपलब्ध नहीं है.
_ लेकिन हुआ ये कि सब-अर्बन क्षेत्रों में भी लोग फ्लैट लेकर रहने लगे और फ्लैट्स का निर्माण होने लगा.
_ और सौ दो सौ गज के फ्लैट्स में कैद होने लगे.
_ इंसान इन फ्लैट्स में अगल बगल रह कर भी एक दूसरे से अनजान जीवन बिताने लगा.
_ अवसाद की बिमारी ने लोगों को घेरना शुरू कर दिया.
_ गांव के बड़े बड़े घर, आंगन छोड़कर लोग इन ऊंची इमारतों में ‘पड़ोसी’ की भावना से अनजान होने लगे.
_ खुली जगहों की बोली मिट्टी के भाव सब तरफ़ पड़ी है.
_ यह एक सकारात्मक पोस्ट है.
_ मैं गगनचुंबी डिब्बों का विरोधी नहीं हूँ.
– Tejbeer Singh Sadher
आना मगर पहले से खबर देकर..
_ कहीं ताले में न बन्द हो घर मेरा.
Tejbeer Singh Sadher
अच्छा घर वो नहीं.. जो इम्प्रेस [Impress] करे,
_ अच्छा घर वो होता है ‘जो थकाए नहीं’
मुद्दतों बाद आया हूँ मैं पुराने घर में.

_ ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा..!
“घर छोटा हो या बड़ा,” सामान कम हो तो ज़िन्दगी बड़ी लगती है.!!
मैं दुनिया को मनाने में लगा हूँ, मेरा घर मुझसे रूठा जा रहा है.!!
“घर अब घर नहीं रहा..” वो बस चार दीवारों का मकान रह गया है.!!
घर सिर्फ कंक्रीट का स्ट्रक्चर नहीं होता – “घर वही है जहाँ हमारा मन चैन में रहे”
अपना घर शान्ति के लिए होता है, उसका उद्देश्य शान्ति खोना नहीं होना चाहिए.!!
घर की सजावट सर्वप्रथम ख़ुद की खुशी के लिए भी करनी चाहिए..

_ महज़ दुनिया को दिखाने के उद्देश्य से नहीं.!!

महंगे सजावटी लेकिन निर्जीव वस्तुओं से भरे स्थान को घर नहीं कहा जाता,

_ बल्कि घर वह स्थान होता है जहां लोग प्रेम से मिलजुल कर रहते हैं..!!

कितनी कितनी स्मृतियां जुड़ी होती हैं पुराने घर से..!! हम महसूस करते हैं बार बार..!!

_ घर हमें बचपन की उन सभी घटनाओं की याद दिलाता है, जिन्होंने हमें “हमें” बनाया है..!
_हमारे पुराने दिन उसमें इस तरह संरक्षित होते हैं _ कि उस दौर की ओर मन बार बार लौट जाना चाहता है..
_वो घर आज नहीं है, तब भी स्मृतियां उसे खड़ा कर लेती हैं.!!!
_ ना जाने कैसे इन बेजान चीजों से भी हमारी जानें यादों से कैसे चिपक जाती है !!
__ और जिंदगी भर दर्द की एक सुई सा चुभोती रहती है !!
_ हम अपने जीवन में कुछ भी प्राप्त कर लें ..पर उससे अपनी पसन्दीदा चीज को खो देने से उपजा खालीपन कभी नहीं भर सकते..!!
आज फिर तेरी याद आई..

_ कई सालों की यादें एक साथ सरक गईं, वो बचपन की खुशियाँ, वो छोटे-छोटे झगड़े, वो अनकहे लम्हें..
_ सब कुछ बदल गया है, लोग बदल गए, हम बदल गए, परिस्थितियाँ बदल गईं..
_ लेकिन उन यादों की खुशबू आज भी वैसी ही ताज़ा लगी, जैसे समय ने उन्हें सिर्फ हमारी यादों में संजो कर रखा हो.!!
हर दिन बहुत कुछ घटता है, और बीता हुआ समय धीरे-धीरे जीवन की दोहराई बन जाता है.

_ हम लौट-लौटकर उन्हीं पलों को देखते हैं, जिन्हें कभी साधारण समझकर छोड़ दिया था.
_ वक़्त अपनी क़ीमत बताते हुए नहीं जाता.. वह बस गुज़र जाता है,
_ और उसके जाने के बाद ही एहसास होता है कि ‘सबसे कीमती पल वही थे.!!’
“घर” मेरे लिए सिर्फ एक भौतिक स्थान नहीं है, बल्कि वह जगह है जहाँ दिल और आत्मा को सुकून मिलता है.

_ यह वह स्थान है.. जहाँ हम पूरी तरह से अपने आप को व्यक्त कर सकते हैं, बिना किसी डर या चिंता के.
_ यह वह जगह है.. जहाँ रिश्तों की गहराई, समझ और समर्थन होता है.
_ घर वह जगह है.. जहाँ हम एक-दूसरे की कमियों और कमजोरियों को स्वीकार करते हुए, एक-दूसरे को मजबूत बनाने की कोशिश करते हैं.
_ घर एक अहसास है—एक ऐसी जगह जहाँ हम अपनी पहचान पा सकते हैं..
_ और जहां हमें प्यार, स्नेह और सुरक्षा का अनुभव होता है.
_ यह सिर्फ चार दीवारों में सिमटा नहीं होता, बल्कि उन रिश्तों और भावनाओं में समाहित होता है, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं और हमें एक परिवार के रूप में एकजुट करते हैं.
_ घर का मतलब सिर्फ रहने की जगह नहीं, बल्कि वह सुरक्षित और सजीव स्थान है..
_ जहाँ हम अपने दर्द, खुशियाँ और सपनों को साझा कर सकते हैं.
_ घर तब सच में घर बनता है, जब वह हमारे जीवन की सबसे गहरी भावनाओं और रिश्तों का गवाह बनता है.
घर जैसा भी था फिर भी आ जाती थी नींद,
_ मैं नए घर में बहुत रोया पुराने के लिए..!!
उस दिन उस पुराने मकान से विदा लेते समय ..मैं आखरी बार रोया.._ मेरे स्मृति कोष में यह अनुभूति बनी हुई है.
_ और जब मैं रो रहा था तो ..यह बात मुझको नितांत रूप से सुनिश्चित थी कि ..उस मकान की आंखों में भी आंसू अवश्य आए होंगे,
_ हांलाकि मैं उस मकान की आंखें देख नहीं पाया ..और मुझे आंसू भी दिखाई नहीं दिए, किंतु मैं अनुभव कर सका..
_ जब मैंने उस मकान को आखिरी बार स्पर्श किया तो ..मुझे उसकी उदासी अनुभव हुई, और मैं उसका आशीष, अलविदा अनुभव कर पाया..
_ और निश्चित रूप से यह मेरी उसके साथ अंतिम भेंट थी,
_ क्योंकि उसके बाद ..उसे वहां से हटा दिया गया.
_ पुरानी यादों की दुनियां अब भी अपनी लगती है.
_ जिस घर में हम रहे थे, उसके निशान भले ही मिट गए हों, _ खुशियों और तकलीफों के असर अब भले न दिखाई पड़ते हों ..लेकिन उनकी उपस्थिति मौके-ब-मौके उभरती रहती है.
_ बहुत तकलीफ देह होता है ये…पुरानी इमारतों में विलक्षण नशा होता है…अतीत अपनी समग्र भव्यता में खड़ा नज़र आता है…!!
_जब इनका मलबा दिखता है तो एक टीस सी उठती है…
मैं हर बात बहुत जल्दी भूल जाता हूँ, दिन में तो सबके साथ सामान्य व्यवहार करता हूँ.. _ लेकिन रात को सोते समय सारी पुरानी भूली हुई बातें एक-एक करके बाहर आ जाती हैं और मेरा मन कभी रोता है, कभी गुस्साता है..

_ भले ही मेरा चेतन मन अतीत को भूलने और माफ करने का दिखावा करे तो अवचेतन मन उसपर हावी हो जाता है..!!
— छूट जाना एक जगह का और छूट जाना पुरखों का घर..

_ और एक जगह का छूटना _सिर्फ़ जगह का छूटना नहीं होता..
_ जगह के साथ छूट जाते हैं कुछ दोस्त, परिचित चेहरे और उनकी आँखों की चमक, छूट जाते हैं पड़ोसी और उनकी बातचीत..
_ छूट जाता है छत से दिखता पीपल का पेड़..
_तीन चिड़ियाएँ रह जाती हैं उस पेड़ पर..
_ छूट जाती है एक पुरानी ईंट की दीवार..
_ और उस पर लगी भूरी पड़ गई काई..
_ चिट्ठियों के लिए पुराना पड़ जाता है एक पता..
_ बदल जाता है सूर्योदय का कोण..
_ छूट जाता है वहां का आकाश..
_ छूट जाता है पीछे चलता -चलता एक दोस्त.. हो उठता है भावुक..
_ आँखें पीछा करती हैं दूर तक..
_और अश्वगति से पीछे छूटता जाता है..
_ जाना पहचाना रास्ता, जगह और मकान..!!
**”बेशक मैं छोड़ आया उस घर, उस जगह को..

– मगर वहां कुछ तो छूट गया.!!”
— वो दिन जब सब ख़त्म हो गया, मेरे भीतर एक अजीब-सी घुटन छोड़ गया..
_ तुम्हारी मौजूदगी, तुम्हारे साथ बिताए उन छोटे-छोटे पलों को याद करता हूँ तो..
_ दिल खुद से ही शिकायत करने लगता है कि हमने किसी अनमोल चीज़ को गँवा दिया.!!
“कुछ जगहें हमसे छूट जाती हैं, पर वहाँ का अपनापन कभी हमारे भीतर से नहीं जाता.”
जब हमारा घर था ना…

_ अब तुम कभी नहीं दिखोगे,
_ न वो छत न वो गलियारा
_ तुम याद आओगे..
_ जब भी तुम्हारे उत्साह को याद करेंगे पर अब उत्साह से नहीं भरेंगे,
_ तब आओगे याद..
_ याद तो आओगे..
_ घर का गलीनुमा मैन गेट को खड़ खड़ा कर खुलवाना..
_ और वो पानी कि मोटर की आवाज़ अब कहाँ ढूंढेगे..
_ याद आओगे तुम..
_ तुम नहीं हो तब भी खूब हो..
_ हमारी बातों और यादों का ज्यादा हिस्सा छेंक रखे हो..
_ तुम्हारी यादों में ही देखते हैं अपना अक्स..
_ हमारे पास इससे सुंदर कोई बात नहीं इन दिनों..
_ जब तुम थे ना……
_ जब हमारा घर था ना…जो अब नहीं है !!
बरसों बीत गए, नई दुनिया बसाए हुए,

_ फिर भी याद आते हैं वो पल, जो हमने थे वहां बिताए,
_ रम गया हूँ इस नई ज़िन्दगी में, घर-परिवार और बच्चों की ख़ुशी में,
_ फिर भी जब भी आता है, नाम उस घर का..
_ खो जाता हूँ उस घर की कहानी में..
_ कुछ पुरानी बातें कुछ पुरानी यादें, ज़िंदा हैं आज भी वो कहीं..
_ ये नाता फ़ुरसत में ही सही, कुछ पल के लिए ही सही..
_ चाहता हूँ जीना, फिर से वही ज़िन्दगी..
_ ये मेरी तमन्ना ही सही, कितना भी बसा लो अपना घर,
_ पर बहोत याद आता है वो घर !!
हमारा घर बिकने की घटना ने सदैव मुझे उदास किया है..

_ पीछे कुछ छोड़कर जाने का दुःख, आगे कुछ मिलने के सुख से सदैव भारी ही रहा..
_”जगहें नई हों या पुरानी” वहाँ एक दिन का प्रवास हो या एक महीने का, छूटने का दु:ख बराबर ही रहता है.
_ “बराबर” शब्द लिखते हुए अपने ऊपर हंसी आ रही है.. ‘भला दुःखों की क्या बराबरी..’
_ लोग याद आएं न आएं.. छूटती हुई जगह पर होने की वजहें, वहाँ की चीजें, वहाँ की बातें, वहाँ की दुनिया अनायास बेतहाशा याद आती है..
_ कई बार कहीं से लौटकर, लौटने का सुख मनाने के बजाय घंटों बरबस रोता रहता हूँ.
_ उन क्षणों में गला रुंध जाता है, मन भारी हो जाता है, बरबस ही आँसू बहने लगते हैं.
_ उन क्षणों में रोना इतना स्वाभाविक हो जाता है कि.. न रोना अपने प्रति बेमानी लगने लगता है..
_ किन्हीं किन्हीं दिनों में जाना इतना भयावह हो जाता है कि.. लगता है यहाँ से जाऊंगा तो जाऊंगा कहाँ ?
_ उन यादों से बचते हुए भी उन्हीं में रह जाता हूँ..
_ जीवन कभी कभी कितना कठोर हो जाता है न..!!
**वो गाँव-घर कई सालों पहले छोड़ दिया, पर उसकी खुशबू, वो गलियाँ, वो चहल-पहल आज भी दिल के किसी कोने में वैसे ही बसी रहती हैं.

_ कहते हैं वक़्त बहुत कुछ बदल देता है, मगर कुछ यादें ऐसी होती हैं.. जो हर गुज़रते साल के साथ और गहरी हो जाती हैं, खैर.!!
_ कुछ बातें वाक़ई भुलाए नहीं भूलती, और शायद भूलनी भी नहीं चाहिए..
_ क्योंकि वहीं तो हमारी कहानी का सबसे सच्चा हिस्सा छिपा होता है.!!
“यहाँ जब तक रहता हूँ तब तक वहां की फ़िक्र रहती है..

_ अब किसे जाकर बताऊँ कि कहाँ का रहने वाला हूँ और कहाँ की याद आती है.”
_ कभी-कभी मन दो ठिकानों के बीच अटका रहता है —
_ जहाँ हूँ, वहाँ पूरी तरह नहीं ; और जहाँ नहीं हूँ, वही भीतर बसा है.
_ यादें हमें उस जगह से बाँधे रखती हैं जो अब सिर्फ एहसासों में है.
_ शायद घर कोई पता नहीं होता,
बल्कि वो जगह होती है.. जहाँ अपनापन महसूस होता है.!!
नहीं रहा वो घर मगर अपनेपन की बात है, जहाँ भी रहें पर आज भी याद वही घर है.!!
पुराने घर की वो मीठी यादें, अब बहुत रूलाई आती है … सब कहीं खो गया !!
कौन सा घर संभालूँ, रोज़ कुछ न कुछ टूटता रहता है..!!
जब छोटे थे तो जोर से रोते थे, जो पसंद था उसे पाने के लिए..
_ आज बड़े हैं तो चुपके से रोते हैं, जो पसंद है उसे भुलाने के लिए.!!
“क्या मैं इस खोए हुए मकान को केवल दर्द के रूप में याद करूंगा,

_ या उसकी स्मृतियों को अपने जीवन की ताक़त और जड़ों की तरह अपने भीतर संजोऊंगा ?”
हम सालों तक कई चीज़ें सहेजकर रखते हैं,

_ इसलिए नहीं कि वे कीमती होती हैं, बल्कि इसलिए.. क्योंकि वे हमारे साथ चुपचाप बहुत कुछ जी चुकी होती हैं और जिस दिन वे अचानक गुम हो जाती हैं, तो ऐसा लगता है.. जैसे सब कुछ लुट गया हो..
_ क्योंकि गुम वो चीज़ नहीं होती, उससे जुड़ा हमारा एक पूरा दौर गुम हो जाता है.!!
हमारा पुराना घर जोइन्ट फैमिली की टेंशन के कारण बिक गया, लेकिन आज भी वो बहोत याद आता है..
“एक तरीका ये भी था फल खाते-बांटते वो उम्र भर..
_भाइयों ने पेड़ काटा और लकड़ी बाँट ली.!!”
…सही मे _जहां पर मैं छोटे से बड़ा हुआ, अगर काफी समय के बाद _ उस जगह पर जाएं तो ;; _  रोना ही आता है,

__ क्यूंकि वहां पर जाकर _ मुझे अपने बचपन की वो सारी बातें याद आ जाती हैं _ और वो एक फिल्म की तरह मेरी आंखों के सामने आ जाती हैं _ जो इतने वर्ष वहां रहे ; यह बहुत ही दर्द भरा दृश्य होता है..!!

_ उस शानदार घर को जमींदोज होते हुए देखने गया तो, सच में, दिल दुःख गया.

‘कल चमन था, आज इक सहरा हुआ, देखते ही देखते ये क्या हुआ ?’

“ज़िन्दगी के यादगार पल जो आज ख़त्म हो गए.. पर सदैव वो स्म्रतियों के रूप मे जिंदा रहेंगे…!”

कोई भी हर पल एक तरह की सोच नहीं रखता और न ही हमेशां एक ही जगह बंधा रहना चाहता है.

_ जिन्दगी के रियर मिरर में जिन्दगी को देखने पर इसे मुड़कर देखा तो जा सकता है मगर दोबारा जिया नहीं जा सकता.
_ उसपर भी कुछ दर्द रह जाते हैं देखी हुई जगहों को दोबारा न जी पाने के.!!
नया घर कितना भी खूबसूरत हो, लेकिन पुराना घर फिर भी आंखो में पानी ला देता है !!

_ क्योंकि उसमे यादें दौड़ती हैं, बचपन खिलखिलाता है.
_ अगर पुराने सुने घर मे अकेले जाकर खड़े हो जाओ तो.. एक एक कर सारे यादों के पंछी आँखों सामने उड़ने लगते हैं.
_रह रह कर दिल मे एक मिठी सी हूक उठती है.. कि काश वो दिन फिर लौट आते.!!
_ सभ्य और विकसित होने की चाह में हम न जाने कितने गली-कूचे भूल आये..
_ पुरानी बातें अब जाने किस जन्म की कहानियाँ लगती हैं.!!
पिता द्वारा कमाया हुआ और बनाया हुआ.. हमें बढाना चाहिये.. बेचना नहीं..

_ फिर चाहे इज्जत हो या दौलत..!!

बचपन कि ख्वाहिशें आज भी खत लिखती हैं मुझे,

_ शायद बेखबर इस बात से कि मैं अब इस पते पर नहीं रहता..!!

  • “बदल चुके हैं मोहल्ले के सभी कोने, मेरे बचपन का आखिरी निशां भी गया.”
पता बदल गया हमारा, न वो घर है न वो क़िस्सा हमारा..!!

_ कुछ यादें कभी खत्म नहीं होती, कुछ आंसू कभी नहीं सूखते..
_ कुछ हादसे एक सदमे की तरह होते हैं, जो मुझे नींद से चौंका कर उठा दिया करते हैं,
_ और इस अचानक हुए हादसे से उपजी अस्थिर मनोस्थिति का कोई पक्का इलाज नही,
_ कैसे बयां करूँ कि क्या होता है,
_ अचानक से उठकर उसी शिद्दत से वह सोचना जिसको न सोचने की मुझे दवाई चाहिए…!
दूसरे शहर में रहते हुए भी मैं,

_ बार बार अपने जामुरिया को सिरहाने लगा लेता हूँ,
_ जैसे दुनियां जहान के धूप में जलते कोई छांव मिल जाए..
– हमारी चर्चा में जामुरिया ..इस तरह धीरे से आ जाता है ..जैसे हवा में आती है नमी..
_ कुछ गलियों के खो जाने पर मैं नाराज हूँ..
_ कुछ दुकानों के जिक्र पर उदास..
_ कुछ गली आधे रास्ते पर खत्म हो जाती है..
_ निज़ाम स्टोर दुकान की बहुत याद आती है..
_ वहीं से खरीदता था डबल सेवेन और पॉप्पीन्स..
_ वो दूर से देखते बोलता था..
_ अबके बहुत दिन बाद आये हो..
_ वो पहचान की दुकानें छूट गई हैं..
— आधी उम्र बीती जहाँ हो ..उसी कि लंबी बात है..
_ सिनेमा मोड़ पर रुका कोई रिक्शा है..
_ रिक्शे पर सवार हमारा अतीत है..
_ अतीत की छाती से लिपटा हमारा बचपन है..
_ मुहल्ले की दुकान पर कचौड़ी और जलेबी है..
— आपस की चर्चा में आसरा सा धड़कता ..ये वहां का जादू है..
_ वहां गलियों का जादू है..
_ हर गली हटिया की तरफ जाती है..
_ मैं हवा के साथ फिर उस दिशा में घूम आता हूँ..
_ अब तो इच्छा यही है कि ..जीने में साथ ना दिए न सही..
_ मरने में ही देना..!!
कुछ वही रहा, कुछ बदल गया..

_ दिन वही रहा, दिनांक बदल गया..
_ घर बदल गया, लोग बदल गए..
_ रिश्ते वही रहे, मायने बदल गए !
_ आ गए हम कहां कि, सब कुछ बदल गया..
_ मुड़ना जो चाहा तो, मोड़ बदल गए थे..
_ मिलना जो चाहा उनसे तो, वो लोग जा चुके थे..
_ जो रह गए थे शेष, वो भी ख़ुद को बदल लिए थे !
_ शरारत जो करना चाहा तो, वो उम्र जा चुकी थी..
_ उम्र के इस पड़ाव पर, वो बात जा चुकी थी..
_ आहत जो हुआ दिल तो, ढूंढ़ने लगा किसी को..
_ मिलता भी कोई कैसे, कि रोशनी जा चुकी थी !
_ मंजिल वही रही, पर रास्ते बदल गए..
_ वक़्त के इशारे बदल गए..
_ लगता है जैसे, सब कुछ बदल गया.!!
कुछ वही रहा, कुछ बदल गया..
—दूर होने का फैसला आसान नहीं था, कौन कहता है दिल परेशान नहीं था..
_ खामोशी के पीछे छुपे थे आंसू, कौन कहता है दर्द का नामोनिशान नहीं था.!!
“विदाई पुश्तैनी मकान से”

_ तेरी दीवारों ने सुनी थीं, मेरे बचपन की खिलखिलाहटें…
_ तेरे आँगन ने सहेजे थे, मेरे सपनों के पहले फूल…
_ आज जब तुझे आख़िरी बार छुआ, तो मेरे हाथ भी काँपे,
_ और तेरी साँसों में भी उदासी थी.
_ तेरी आँखें मैंने कभी नहीं देखीं,
_ पर यक़ीन है — तू भी रोया होगा..
_ तू बिक गया…
_ पर तेरे आँगन में खेले मेरे दिन कभी नहीं बिकेंगे.!!
– आज पुश्तैनी मकान से आख़िरी बार विदा लिया.
_ दीवारें मौन थीं, पर उनकी उदासी मैंने महसूस की.
_ मेरे बचपन की हँसी और सपने वहीं रह गए…
_ मकान बिक गया, पर यादें अब भी मेरे भीतर जीवित हैं.
— हमारा घर उजड़ने की घटना पूरे रिश्तेदारों और भाईयों के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी,
_ पर हुई वह बस चुप्पी.. या खुसरपुसुर की बात ..
— क्या उनकी आत्मा कभी कचोटती नहीं उनको ?
_ कि कोई किसी के साथ इतना बुरा कैसे कर सकता है…?
_ जिन्होंने षड्यंत्र करके गहरी चोट दी है, उनसे अपेक्षा और आत्मीयता की डोर तोड़ देना ही समझदारी है.
_ रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि नियत और भरोसे से चलते हैं.
_ ऐसे लोगों से बस उतना ही व्यवहार रखना है, जितना सामाजिक रूप से न्यूनतम आवश्यक हो — न गहरी आत्मीयता, न अनावश्यक द्वेष.
_ यह घटना केवल एक संपत्ति खोने का मामला नहीं थी, बल्कि अपनी जड़ों, बचपन और आत्मा का एक हिस्सा खोने जैसी थी.
_ पुश्तैनी मकान घर से बढ़कर होता है — वह स्मृतियों, संस्कारों और अपनापन का केंद्र होता है.
_ मकान मात्र दीवारें और छत नहीं था — वह जीवन का साक्षी, हंसी और आंसुओं का साथी था.!!
हमारा घर उजड़ने की घटना पूरे रिश्तेदारों के लिए शर्म की बात होनी चाहिए थी,

_ पर हुई वह बस चुप्पी.. या खुसरपुसुर की बात ..
— क्या उनकी आत्मा कभी कचोटती नहीं उनको ?
_ कि कोई किसी के साथ इतना बुरा कैसे कर सकता है…?
_ किसी के साथ गलत करना आसान तो होता है..!
_ आसान नहीं होता.. उस बात का बोझ लिए रहना.!!
_ “उन्होंने मेरी जमीन नहीं.. मेरा घर छीना है.”
_ मेरे पिता के जाने के बाद से घर बिकने तक [2003-2021] के दौरान चार ऐसे काम आए, जिनमें उन रिश्तेदारों की बहुत जरूरत थी, लेकिन उन्होंने अपनी भूमिका नहीं निभाई.
वे चार काम थे : —
1. घर के पांच सदस्य जो कि तकलीफ में थे, उनकी समस्या का हल उन्होंने नहीं किया.
2. मेरी दुकान जो भाड़ा में दी हुई थी उसमें फचांग किया, लेकिन इन्होंने इसको नहीं रोका.
3. जब मेरी माँ गई तो केवल दो लोगों ने ही खर्च उठाया, बाकी दो ने क्यों नहीं ?
4. घर को दूसरों को बेचने से रोकना था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया.
_ अब प्रश्न उठता है कि इस अन्याय के खिलाफ़ कोई एक्शन क्यों नहीं लिया गया..
_ जवाब है कि जलन और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति !!
— इससे बड़ा पाप क्या होगा भला.. जब किसी का घर नष्ट कर दिया जाए,
_ यह पाप उन सभी को लगेगा, जिन्होंने गलत किया और गलत का साथ भी दिया,
_ और वे तटस्थ [neutral] होने का दिखावा कर रहे, जो मज़े ले रहे, सभी इस पाप के भागीदार होंगे..!
_ उनके कर्म निश्चित रूप से उन लोगों को प्रभावित करेंगे,
_ हालांकि मैंने सबको माफ़ कर दिया है, सबकुछ समय पर छोड़ दिया है,
_ समय ही न्याय करेगा, समय ही कहानी लिखेगा..
_ सब चुप हैं.. जैसे मैं कभी था ही नहीं, या जैसे मैं हूँ ही नहीं..!!
—- इतिहास गवाह है कि दुनिया में बहुत से राजा रंक बन गए,
_ बहुत से महल मिट्टी में मिल गए,
_ बहुत शक्तिशाली लोग अंत में लाचार होकर मरे..
_ कोई अमर नहीं है, कोई अजर नहीं है,
_ कोई भी स्थिति सदा नहीं रहती..
_ बस मायने रखता है कि आपने सही का साथ दिया या नहीं !!
कुछ बाते लिखी ही इसलिए गई.. ताकि लोग उन परिस्थितियों को जान-समझ पायें,
_ कि कैसे एक फ़ैसले की वजह से कितना कुछ पल भर में तबाह हो गया, खैर !..
“घर हमारा उन्हीं चिराग़ो ने जलाया”
_ हांथ जला कर हमने, जिन चिरागो को बुझने से बचाया.!
_ दुख तब और भी पाया,
_ जब घर जलने के बाद.. उन चिराग़ो को भी बुझते पाया !!
** ऐसे कोई करता है क्या ?

_ हमारा घर उजड़ना केवल मेरा व्यक्तिगत नुकसान नहीं था,
_ यह पूरे रिश्ते और रिश्तेदारी के लिए आत्ममंथन का विषय और शर्म की बात होना चाहिए था.
पर हुआ क्या..
_ चुप्पी… या फिर धीमी-सी खुसरपुसर, जैसे यह सब सामान्य हो.
_ कभी मन में प्रश्न उठता है.. – क्या किसी की आत्मा को यह खटकता नहीं
कि किसी के साथ इतना अन्याय कैसे किया जा सकता है ?
_ गलत करना शायद आसान होता है, पर उस गलती का बोझ जीवन भर उठाना आसान नहीं होता.
_ उन्होंने मेरी ज़मीन नहीं छीनी, उन्होंने मेरा घर छीना है.
_ फिर सवाल आता है कि इस अन्याय के विरुद्ध कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया.
_ उत्तर साफ़ है..- ईर्ष्या, जलन और स्वार्थ.
_ किसी का घर उजाड़ देना.. इससे बड़ा पाप और क्या हो सकता है ?
_ यह दायित्व केवल उन्हीं का नहीं.. जिन्होंने यह किया,
_ बल्कि उनका भी है, जो साथ खड़े रहे, जो तटस्थ बने रहे, और जो चुप रहकर तमाशा देखते रहे.
_ गलत का साथ देना भी एक कर्म है और कर्म अपना असर छोड़ता ही है.
_ मैंने सबको माफ़ किया है और सब कुछ समय पर छोड़ दिया है.
_ क्योंकि मुझे भरोसा है..- समय ही न्याय करता है, समय ही पूरी कहानी लिखता है.
_ आज भी सब खामोश हैं, मानो मैं कभी था ही नहीं, या मानो मेरा होना मायने ही नहीं रखता.
_ पर कोई भी स्थिति सदा नहीं रहती.
_ अंततः यही देखा जाता है कि किसने सही का साथ दिया.. और किसने नहीं.
_ अब यह बात कहना मेरे लिए ज़रूरी है..
_ आपके व्यवहार से मुझे कई बार गहरी मानसिक पीड़ा हुई.
_ मेरी चुप्पी यह संकेत नहीं थी कि मुझे दर्द नहीं हुआ, बल्कि यह कि मैं सहता रहा.
_ मैं बस इतना कहना चाहता हूँ कि.. जो हुआ, वह सही नहीं था.
_ और यह जानना मेरा अधिकार है कि इसके पीछे आपकी सोच या कारण क्या था.
_ यह शब्द आपको बदलने के लिए नहीं लिखे गए हैं, बल्कि अपने मन का बोझ हल्का करने के लिए..
_ अगर आप समझें.. तो अच्छा.
_ अगर न समझें..- तब भी मैंने अपनी बात रख दी.!!
कुछ बाते केवल पढ़ने के लिए नहीं लिखी जातीं, बल्कि इसलिए कि लोग उन्हें जान सकें, समझ सकें..

_ उन परिस्थितियों को महसूस कर सकें,
_ जहाँ एक छोटे-से फ़ैसले ने पल भर में घर को उजाड़ दिया.!!
न लौट पाने का दुःख.. सब दुखों में सबसे बड़ा न सही.. सबसे गहरा जरूर है,

_ खास कर तब, जब वो दुःख घर न लौट पाने का हो.!!
हमें बेघर करने वालों को “हम कैसे हैं” पूछने का कोई हक़ नहीं !!
आप किसे कह रहे हैं पुराना था वो घर,

_ जिसे खरीदने और बनाने में ज़माना लगा मुझे..!!

_ दो पक्के कमरे बनाकर रहने वाले का संघर्ष भी कभी कभी बहुत बड़ा होता है.. ( उसकी मेहनत, त्याग वही बता सकता है ).

_ मुझे एक दो कमरे का फ्लैट खरीदने के लिए नाकों चने चबाने पड़ गए थे.

घर में अपनों का होना बहुत जरुरी है, _ वरना घर को कितना भी सजा लो, दीवारें कभी नहीं बोलतीं..
अपनों से ही तो मकान “घर” बन जाता है, _ अपने साथ ना रहें तो महल भी खंडहर बन जाता है.
जिसने उम्र भर रचा घर का एक एक कोना _ आज वही बागवान पड़ा है घर के एक कोने में.
सोचा था घर बना कर बैठूँगा सुकून से, _ पर घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना डाला..
उड़ गये वो परिंदे घोंसला छोड़कर, _ जिनको अपना खून पिला पिला कर सींचा था..
घास के तिनके जो बेकार कूड़ा समझे जाते थे, _ चंद पक्षियों के हुनर ​​से बन गए घर !
सब अपने अपने हिस्से की ईंट खींचकर भाग रहे थे, घर का बिखरना तो लाजिमी ही था.!!
जब से कमाना मैंने शुरू किया, _ मेरा प्यारा घर मुझसे दूर हुआ ..
पूरी दुनिया घूम लो यार, पर जो सुकून घर में मिलता है, वो कहीं भी नहीं मिलता..

“दुनिया की यात्रा करें, लेकिन ध्यान रखें कि घर सबसे अच्छा है.”

जिसका मन सच्चे सुकून से भरा होता है, वो छोटे से घर में भी महलों जैसा
आराम महसूस करता है.!!
झोपड़ी में रहना सही है लेकिन, महल के लिए मेहनत ना करना ग़लत है ..!!!
“हर कोई घर लेता व बनाता है, पर हर कोई समझ कर नहीं लेता और न ही बनाता.”
सुकून चाहिए महल नहीं… महल तो हम कच्चे घर को भी बना लेंगे !!
अपने ही घर का मेहमान हूँ मैं, __ अब केवल त्योहारों में घर जाता हूँ…!!!

_ सोचा था घर बनवाकर घर पर चैन से रहूंगा, जो घर बनाया अब उसी घर में मेहमान बनकर जाना पड़ता है.

_ यही होती है एक परदेशी की जिंदगी..!!

घर नाम की जगह को इतना सुकून भरा, प्यार भरा और भरोसे भरा होना चाहिए कि पढ़ने, कमाने या दुनिया देखने निकला बच्चा बार बार वहां लौटना चाहे,

_ वर्ना तो जिसे जब जैसा बहाना, मौक़ा मिलेगा वह घर छोड़ जाएगा फिर आप रोते रहिए नए ज़माने को.!!

दुनिया में अगर कहीं सुकून मिलता हैं तो “वो है अपना घर “
घर सहनशीलता और धैर्य को सीखने की पाठशाला है.
चाँद छोटे घर से दिखता था, बड़े घर से नहीं दिख रहा.!!
घर क्या होता है _ ये घर मेँ पता नहीं चलता..
घर बड़े हुए लेकिन रिश्ते कम हो गए, घर न रहकर मकान हो गए..

_ घर जरूर बड़े हुए लेकिन दिल छोटे हो गए हैं और होते जा रहे हैं..!!

नए आशियाने की तलाश में कितने घरौंदे वीरान हो गए,

_ लोग अपने पुराने घरों को छोड़ गए..!!

अपनी सब बातें मन में ही रखना बेहतर है.!

_ इस दुनिया में खूब भरे हैं, सबके घर तुड़वाते लोग.!!

गिरवी रक्खा अपने सारे ख्वाबों को, _

_ और इस ज़मीन पे छोटा सा घर लिया मैंने ..

जो घर बच्चों को अब पुराना लगता है, _

_ वही घर माँ – बाप को खरीदने में जमाना लगा था ..

झोपड़ी में भी चैन होता है.. अगर वो आपकी हो..

_ और महल भी बेमानी लगता है अगर वहां गुलामी करनी पड़े.!!

“घर” धैर्य और समर्पण सीखने के लिए किसी प्रशिछण स्थल के समान होता है.

यहाँ तपस्या और त्याग की सर्वोत्तम शिछा मिलती है.

घर कच्चा हो या पक्का , छोटा हो या बड़ा कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता …

….अगर …. घर का माहौल ख़राब है तो बहुत फ़र्क़ पड़ता है !

सारी दुनिया बंद दरवाजे में सिमटी है, बाहर क्या है कोई आवाज ना सुनती है !

_अब त्यौहार त्यौहार नहीं लगते _ क्योंकि यहां अब घर नही मकान बसते हैं !!

जब तक घर के अंदर था, पता न चला कि धूप क्या होती है ?

जब घर से बाहर निकला, तब पता चला कि छत क्या होती है !!

दरारे पड़ गई है,,, _ मेरे घर की दीवारों में भी ,

एक वही है,,, _ जो मुझे कान लगा के सुनती है

घर छोटा हो या बड़ा हो, कोई फर्क नहीं पड़ता ;

लेकिन घर का माहौल, जरूर अच्छा होना चाहिए.

आगे आने वाला शहर कितना भी पसंदीदा क्यूँ ना हो,

पीछे छूटने वाला घर बैचैन कर ही देता है..

जीवन में हमेशा ये सोच के दुखी मत रहो कि मेरा घर बड़ा नहीं है,

_ये सोचो कि घर में सुख है या नहीं, जिस घर में सुख होता है.. वही घर सबसे बड़ा होता है.!
हंस ने तो अकेला उड़ना ही है.. पर क्या जीने के लिए इंतज़ाम भी न करें ?

_ जब तक जीना है, तब तक रहने के लिए घर तो चाहिए ही.. और सारे आराम भी चाहिए.
_ जीवित व्यक्ति कर्म करता है.. खाली बैठ कर तो कर्म होंगे नहीं, यानी जब तक जीवन है, तब तक कर्मशील रहने के लिए सबकुछ चाहिए.
_ हां, अपने स्वार्थ के लिए किसी दूसरे का घर न हथियाओ.!!
– Manika Mohini
घर की कलह में अगर जाता है तो घर के बच्चों की खुशी, बच्चों के संस्कार, पत्नी के अरमान और सपने, और एक पुरुष का सुकून और शांति.!! परिणाम – घर की बर्बादी
घर खुद का छोटा हो तो भी चलता है, यदि परिवार के सदस्यों की तुलना मे कमरें ज्यादा हो तो साफ सफाई में दिक्कत होती है और सुरक्षा की दृष्टि से भी दिक्कत होती है.
केवल वही घर खरीदें जिसकी आपको आवश्यकता है, न कि वह घर जिसे आप खरीद सकते हैं.

Buy only the home you need, not the house you can afford.

मुझे नहीं पता कि लोग अपने रिश्ते, अपने प्रियजनों के साथ अपने बंधन, अपने घर को आकार देने के तरीके को क्यों नहीं आकार देते हैं.

_ हम महीनों तक डिज़ाइन देखते हैं, कुछ चुनते हैं, और चुनते हैं कि घर के लिए सबसे अच्छा क्या है,
_ बैकग्राउंड, माहौल और वाइब के लिए क्या फिट बैठता है,
_ लेकिन जब रिश्ते को आकार देने की बात आती है, तो हम इसे अनदेखा कर देते हैं.
_ हम थोड़ी सी गलतफहमी के आधार पर लोगों के माहौल का चयन नहीं करते हैं.
_ हम किसी गलतफहमी के कारण इसे जल्दी ही छोड़ देना पसंद करते हैं.
_ हम अपने रिश्तों को सुधारना पसंद नहीं करते.
_ हम बस टूटे हुए रिश्ते के साथ जीना शुरू कर देते हैं.
_ लेकिन घर पर, हम पेंट को उतरते हुए नहीं देख सकते.
_ हम रिसाव-लीकेज को नहीं देख सकते.
_ मैं पूछना चाहता हूँ, क्या आपको अपने प्रियजनों के आँसू नहीं दिखते ?
_ क्या आपको नहीं लगता कि घर की मरम्मत करने से ज़्यादा ज़रूरी है उन्हें ठीक करना ?
_ घर सिर्फ़ लोगों के साथ होता है.
_ जिस घर में बात करने के लिए कोई न हो, वह सिर्फ़ यादों का कब्रिस्तान होता है.
_ मुझे ऐसी जगहें पसंद नहीं हैं जहाँ मुझे यादों की खुशबू आती हो.
_ मुझे जगहों, लोगों और उनके रिश्तों में जीवंतता पसंद है.
_ मुझे हवा में बंधन, खुशी, प्यार की खुशबू पसंद है.
_ हमें अपने रिश्तों पर उसी ऊर्जा और इरादे से काम करना चाहिए,
_ जिस तरह हम अपने घर के लिए करते हैं.!!
_ घर सजावट से नहीं, बल्कि हंसी से सुंदर बनता है।
— Sohrab Amaan

सुविचार – मकान – 058

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“इन बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं, फराज़

_ कच्चा तेरा मकान है, कुछ तो ख़्याल कर…!!”

“हम सब कच्चे मकान में रह रहे हैं”

‘मकान’ केवल ईंटे भर हैं’ __ घर ईंटो और प्यार से बनता है..!!

A Home is always a house, but a house is not necessarily a home.

मकान ऊंचा होने से नहीं _अपने मयार [ दया करने वाला ] की ऊंचाई से आदमी ऊंचा होता है.
मकान इतने बन गए हैं जगह-जगह, जमीन भर गई है मगर दिल खाली है !!
छोटी-छोटी दरारें अक्सर बड़े-बड़े मकान के ढहने का कारण बनती हैं.!!
पहले मकान कच्चे थे और लोग सच्चे थे..अब मकान पक्के हो गए और लोग कच्चे.!!
एक मकान ऐसा भी था, जिसका हर कोना _ मेरी आहट को पहचानता था ;

_उस घर के कोने में मेरा नाम था _ और सारे खिड़की – दरवाजे मुझे बहुत करीब से जानते थे !!

मकान साथ लेकर कौन जाता है, सब देखभाल ही तो करते हैं.

मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,

जिसने भी ये कहा ….उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा…

दीवार क्या गिरी मेरे मकान की, लोगो ने मेरे घर से रास्ते बना लिए..
तारीखों में गुम पुरखों का पैगाम बुलाता है, मुझे गॉव का टूटा मकान बुलाता है…

_ पुराना समझ के बेच न देना मकान को, शायद कभी ये सर को छुपाने के काम आए..!!

घर अंदर ही अंदर टूट जाते हैं, मकान खड़े रहते हैं बेशर्मों की तरह !!

_ बड़े बड़े मकान ढहा देती हैं छोटी छोटी दरारें !!

कोई साथ न दे तो, हौसला टूट जाता है..!

_ किसी कि बुराई के कारण घर-मकान टूट जाता है..!!

उग आई है घास मकान की दहलीज़ पर…

अपनों को आये हुए एक ज़माना गुज़र गया.

कभी गुलज़ार था जो घर चहचहाट से,

आज ख़ामोशी की बेल पसरी है हर जगह..

नहीं होती रखवाली, जंग वाला ताला अब बेजान है.

_घर तो नहीं है, बस यादों का एक मकान है.

गाँव के घरों की वीरानग़ी बयां करतीं हैं उन की दांस्तां_

_ वारिस इनके बड़े शहरों की रौनक में खो गए..

अकेले छोड़ दिया गया पुरखों का घर, दोष बस इतना था कि मकान गाँव में था.

_ लोग जड़ें भूल जाते हैं ; उन्हें नहीं पता कि बिना मिट्टी के जुड़ाव के, बड़े से बड़ा पेड़ भी महज़ मामूली ईंधन बन जाता है.!!

जिस दिन खुद कि कमाई से ईंट खरीदोगे _

_ उस दिन बाप के झोपड़े की कीमत पता चलेगी..

किराये के मकान में घर नहीं होता !

_ फिर भी मकान अपना हो तो.. किसी का कोई डर नहीं होता..!!

” मकान का दर्द “

मैं गाँव का पुराना मकान हूँ.

गलने लगी हैं मेरी दीवारें और

सड़कर लटकने लगे हैं पलस्तर !

पनाह दी थी मैंने तुम्हारी कई पीढ़ियों को !

यहीं पल कर तुम सब बड़े हुए !

यहाँ गूँजा करती थी, तुम्हारी अठखेलियाँ

और उत्सवों पर मंगलगान !

मेरे कोठों में भरे रहते थे, गेहूँ और धान !

मुझे अपने भाग्य पर गर्व था,

हर एक दिन उल्लासमय पर्व था !

अब झेलना पड़ रहा है, मुझे उपेक्षा और अकेलेपन का शाप !

चिर निर्वासित – सा एकान्त में खड़ा,

क्षीण होता हुआ आँसू बहा रहा हूँ मैं

क्योंकि तुम हो चुके हो संवेदनहीन !

हाँ, तुम्हें शहर प्रिय है, सुखी रहना

तुम्हें कोई कष्ट न हो, दुआ है मेरी !

तुम्हें तो याद _ कभी नहीं आएगी मेरी,

एक दिन यूँही ढह जाऊँगा मैं _ तुम्हें याद करता !!

फट गया है हृदय बेचारे मकान का ….

मकान को अपने ख़ून – पसीने से सींचकर

बनाया था बाप ने बड़े अरमानों से !

आज स्वार्थ की पराकाष्ठा देखिए,

खींच रहे हैं दरकते रिश्तोंवाले

बेबस मकान को _ दम लगाकर

अपनी -अपनी ओर उन्हीं के पुत्र !

हृदय फट गया है इस कुकृत्य को देखकर

उस मकान का !

केवल ईंट – सीमेन्ट पत्थरों और रेती से

नहीं बनता है मकान !

आत्मीयता की अदृश्य किन्तु प्रगाढ़

डोर उसे बाँधे रहती है

तब वह कहलाता है घर !

इन स्वार्थी बेटों को घर की नहीं

अपने -अपने हिस्सों की दरक़ार है फ़कत !

खींचकर ले जा रहे हैं कसाई की तरह जिसे

दो विपरीत दिशाओं में !

साफ़ नज़र आने लगी है टूटती रिश्तों की डोर !

उड़ चुके हैं ‘घर’ के प्राण- पखेरू तो कभी के !

अब गाँवों में भी काफी सारे मकान हैं, जिसमें बाहर ताले जड़े हुए हैं.

_ क्योंकि उन घरों में रहने वाले काम-रोजगार-व्यापार की तलाश में अपने गाँव को छोड़कर कहीं दूर बस गए.
_ ऐसे लोगों का कभी साल-दो साल में दो-चार दिन के लिए यहां आना हुआ करता है.
_ अपने पुराने घर को जी भर कर देख लिया,
_ कुछ पुराने लोगों से मुलाकात कर ली और फिर घर के दरवाजे पर ताला लगाकर वापस लौट जाते हैं.
“सीमेंट के जंगल के पहरेदार”

_ जहां रहता था वहां आलिशान सीमेंट पुते बंगले आठ दस हजार वर्ग फीट में बने थे.
_ अधिकांश घरों के बगीचे में आराम कुर्सी पर बुजुर्ग हस्तदंड लिए बैठे मिलते ;
_ स्वभाव वश हालचाल पूछने पर बताते कि बेटे बेटी विदेश में हैं, पत्नी सिधार गई है.
_ तो अंकल आप विदेश क्यों नहीं चले जाते अपनों के पास ?
-अरे बेटा,चला तो जाऊं पर ये माया मोह के ईंट पत्थर सीमेंट को कौन देखेगा ?”
_ अब कौन समझेगा कि.. जैसे आप अमर फल खा कर बैठे रहेंगे युगों युगों..”
“जिन मकानों- हवेलियों को आप बनाने के लिए इतनी मेहनत कर रहे हैं..”

_ उनमें से अधिकांश में आपके बच्चे कभी नहीं बसेंगे !
_ वे अपना खुद का पैसा कमाएंगे और निश्चित रूप से अधिक फैशनेबल घर बनाना चाहेंगे या यहां तक कि आप से दूर किसी बडे़ शहर या महानगर में रहना पसंद करेंगे.
_ सच्चाई यही है आप मानो या मत मानो !
_ इसलिए अपनी नेक कमाई के साथ कुछ अपनी सामाजिक एवम नैतिक जिम्मेदारीयों को भी निभाते चलें..!!
मकान बहुत मेहनत से बनते हैं.. पर ऐसी मेहनत किस काम की, जिसके आप सिर्फ पहरेदार बन कर रह जाएं ?

_ सच कहें तो हम लोग मकान के पहरेदार ही हैं.
_ जिसने ये बात कही है कि “मूर्ख आदमी मकान बनवाता है, बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है,”
_ उसे ज़िंदगी का कितना गहरा तज़ुर्बा रहा होगा.”
_ मकान लेकर कौन जाता है ? सब देखभाल ही तो करते हैं.
_ जिन्दगी के चार दिन है मिल जुल कर हँसतें हँसाते गुजार लें..
…क्या पता कब बुलावा आ जाए….सब यहीं धरा रह जायेगा..!!

सुविचार – उधार – कर्ज – कर्जा – ऋण – ईएमआई – EMI – लोन – Loan – 057

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उधार की अमीरी चैन की सांस नहीं लेने देती.
जिसकी ईएमआई नहीं चल रही है और कोई कर्ज न हो,

_ समझ लेना उसकी जिंदगी बढ़िया चल रही है..!!

EMI [ईएमआई] या किसी भी तरह के लोन के जाल में न फँसें..
_ जितनी चद्दर उतने ही पांव फैलाये.!!
जितनी अर्निंग [earning] है, उसी में अच्छा जीवन जीना, लोन [loan] से दूर रहना.
_ मेरी जितनी Earning है, उसी में अच्छे से कैसे रह सकते है, Loan से दूर रहना.
– मैं उसी पर ध्यान देता हूँ.
ऋण से जो बच गया वो वास्तव में सुखी है, लेकिन आपने महसूस किया कि आपके चारों  तरफ से इन्हीं चीजों को थोपा जा रहा है..

_ यहां तक अब टूरिस्ट लोन, शिक्षा लोन इत्यादि भी ___ ऋण एक अंधे कुँवे के सामान है, इससे बचिए..

ईमानदार लोग दिखावा नहीं करते, वे कर्ज मुक्त और सादगी से जीवन जीते हैं और खुश से रहते हैं..!!
ईमानदारी से पैसे कमाने वाले लोग सीधे और सच्चे होते हैं, सच्ची बातें करते हैं और अच्छे होते हैं, अच्छा व्यवहार रखते हैं, किसी का कर्ज नहीं रखते अपने ऊपर..!!
ईमानदारी से मेहनत करने वाला कभी कर्जे में नहीं होता,

_ जो आय से ज्यादा खर्च करता है.. वही कर्ज में होता है..!!

सबसे पहले तो हमें अपने बेवजह के खर्चों को खत्म करना चाहिए..
_ क्योंकि लोन के पैसों से लग्जरी जीवन व्यतीत नहीं करना चाहिए.!!
अगर यह दुनिया आपकी एक बार मदद करे, तो यह सौ गुना अहसान जताएगी.

_ क्योंकि दुनिया मदद नहीं कर सकती, सिर्फ़ उधार देती है.
_ जब भी आप इस दुनिया को आईना दिखाएँगे, यह उधार वापस माँगेगी.!!
चादर से बाहर पैर फैलाने वालों का जीवन चिन्ता करने में ही निकल जाता है और आखिर में फिर भी हाथ खाली रह जाते हैं.

_चक्रवृद्धि ब्याज सहित किश्तें पटाते-पटाते ज़िंदगी का सुनहरा दौर यूँ ही निकल जाता है.!!
कर्ज में डूबा हुआ शरीर अपना खून हर दिन सूदखोरों को पिलाता रहता है.
जग में पहला दुखी निर्धन है, _ उससे अधिक दुखी कर्जदार है.
खुद की कमाई से पार पड़ेगी, उधार की रोशनी कब तक चलेगी..!!
औकात से बड़े दिखावे, _ इंसान को कर्ज में डूबा देते हैं.
जिसके पास किसी का कर्ज नहीं, _ वह बड़ा मालदार है.
उधार लेने से धन अधिक खर्च होता हैं.
सही तरीके से कमाने वाले कभी कर्जा लेते ही नहीं.

_ वो अपने खर्चे सीमित रखते हैं.

कर्ज वो बीमारी है जो आदमी को जीते जी नरक में ले जाती है, _

_ कर्ज अच्छे से अच्छे परिवार को तबाह कर देता है.

पैसे उधार लेने का अर्थ है, दूसरों के कर्म को अपने जीवन में लाना,

_ ऐसे काम क्यों ही करना.. ये घोर नकारात्मक ऊर्जा है..!!

उधार देकर बाद में गिड़गिड़ाने से बेहतर है ;
_पहले ही ‘ना’ बोलकर अपना स्वाभिमान बचा लो.!!
लोन देने वाला उस आदमी की तरह है जो सूरज निकलने पर आपको छाता देता है,

_लेकिन पानी बरसते ही वह उसे वापस मांगने लगता है.

“ऋण – कर्ज”

_ यह ऐसी चीज है जो बिना सोचे लिया गया तो आप को निश्चित ही डुबोएगा.
_ एक कर्ज को पूरा करने के लिए दूसरा कर्ज..
_ और इस प्रकार कर्ज बढ़ता ही जाता है.!!
महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाएं,

_ देखा देखी में, बाइक, कार, फर्नीचर, टीवी मोबाइल अब ईएमआई पर आज कल धड़ल्ले से लिया जाता है..
_ और अंत में यह इतना बढ़ जाता है की आय से अधिक खर्च होने लगता है,
__ ऐसे में आकस्मिक खर्च की स्थिति होने पर लोन लेना पड़ता है, और फिर आप डूबते ही रहते है कर्ज में.
— इन दिनों रिश्तों में दूरियाँ बढ़ती ही जा रही हैं,
_बढ़ती महँगाई, जानलेवा प्रतिस्पर्धा, आसमान छूते सपने और महत्वाकांक्षाएँ मनुष्य का जीवन इन सबमें पिस रहा है..
उधारी का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ जिसने उधार लिया है, वह शांत नहीं रहता.
_ “सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी,
_ चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.
किसी भी रिश्तेदार या जान पहचान की लोन लेने में मदद के अनुरूप बैंक में गारंटी देने का मतलब यह होता है कि आवेदक के लोन चुकाने में अगर कोई कोताही होती है तो गारंटर इस बात की जवाबदेही लेता है और लोन चुकाने की जिम्मेदारी भी..!

_ इसलिए लोन लेने वाले के साथ लोन की गारंटी देने वाला भी लोन चुकाने के लिए बराबर जिम्मेदार होता है.!!
उधार लेने वालों से निवेदन है कि फालतू खर्च करने से पहले..

_ उन लोगों का कर्ज जरूर उतार दें, जिन्होंने नेक इंसान समझ कर आपको उधार दिया था.
किसी के भरोसे को मत तोड़ो ; फालतू खर्चों से पहले उस इंसान की पाई-पाई लौटाओ.. जिसने आपको अपना समझकर निस्वार्थ उधार दिया था.
सुविधाओं और साधनों से संपन्न होने की कोशिश हर व्यक्ति को करनी चाहिए,

_ लेकिन अपनी सीमाओं का ध्यान रख कर.
_ जैसे, अगर आप कर्ज ले कर एक के बाद दूसरी वस्तु खरीदते जाते हैं,
_ तो हो सकता है कि आप कर्ज से इस तरह लद जाएँ कि मन की शान्ति भी गँवा बैठें.
_यह कोई जरुरी नहीं कि सुविधाओं व साधनों की प्रचुरता एक व्यक्ति और उस के परिवार को सुखी ही रखे.
_ इसलिए सिर्फ सुख सुविधाएँ ही जुटाने पर जोर न दें.
_ आप की सफलता और लोकप्रियता में आप के व्यक्तिगत गुण ज्यादा काम आएँगे.
ऋण लेकर नया धंधा शुरू करने से पहले उन संभावनाओं पर भी गहन विचार कर लेना चाहिए..

_ कि अगर धंधा ना चला तो आप लिया गया ऋण उतार पाओगे ??
_ कुछ लोगों की जिंदगी ठीक- ठाक चल रही होती है,
_ मगर वो गलत सलाह या अति उत्साह में ऐसा कदम उठा लेते हैं कि वो आत्मघाती सिद्ध हो जाता है.. और वो सड़क पर आ जाते हैं.
_ याद रखिये, रिस्क लेना बुरी बात नहीं,
_ मगर औकात से बढ़कर लिया गया रिस्क तबाह कर सकता है..
_ और जब बुरे दिन शुरू होते हैं, तब सारे अपने मुहँ मोड़ लेते हैं..
_ और जर्रा जर्रा दुश्मन हो जाता है.
क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़.!

_ जितनी कमाई उतना खर्च, ये हुनर सीख लो ना..,
_ लेकर लोन, अन्जाने में घोट रहा, अपना गला तो नहीं..,
_ बेवजह दुनियाँ को दिखाने के लिए, क्यूँ जरूरतें बढाता है..,
_ जितना कुछ है तेरे पास, क्यूँ उसी में खुश नहीं रह पाता है..,
_ क्यूँ जरूरतें हो जाती है, जिन्दगी पर फिर सवार॥
_ अगर नहीं है सब्जी तेरे घर में, तो नमक से रोटी खा ले..,
_ अगर जरूरतें पूरी करनी है तुझे, तो मेहनत कर कर कमा ले..,
_ क्यूँ जीते हो आप ऐसी ज़िन्दगी, जिस से हो जाये लोन- क़र्ज़..!!
बीमारी और उधारी इन दोनों में से अगर किसी एक का सामना हमें करना पड़े तो हमारा अन्तःकरण शांत नहीं रह सकता है.

_ क्योंकि कोई रोग आ जाए तो हमारी सारी ऊर्जा उसी रोग से लड़ने में लग जाती है.
_ जिसने उधार लिया है, वह भी शांत नहीं रहता.”सादा खाओ, सादा पहनो” आफत न सिर पर आएगी, चार दिन की जिंदगी आराम से कट जाएगी.!!
–“फैसला”–

“हर फैसले की एक अपनी गति होती है – कुछ तुरंत होते हैं, कुछ इंतजार मांगते हैं.
_ जो भी गति आपको सुकून दे, वही आपका सही रास्ता है” 🌿
_ ये आप अपने मन में दोहरा लीजिए जब भी निवेश या जीवन के किसी निर्णय को लेकर कन्फ्यूजन हो.
_ ध्यान रखना – फैसला लेने से पहले अपना सुकून महसूस करना ही सबसे बड़ी जीत है.
——————————————
“जो ख़ुशी अपनी औकात के अंदर जीने में है, वो किसी उधार की छाया में कभी नहीं मिलती”
“जो पैसा अपना है, उसमें सुकून है; जो पैसा उधार का है, उसमें बेचैनी का बीज है”
“संतोष में जो सुकून है, वो ईएमआई [EMI] भरने की दौड़ में कभी नहीं मिलता”
“अपनी कमाई के अंदर रहकर जीना, असल में आज़ादी का सबसे प्यारा रूप है”
“मैं उधार का बोझ नहीं- अपनी कमाई का सुकून जीता हूँ”
“जितना कम बोझ – उतनी गहरी सांस”
— ये लाइन आप अपने दिल में बसा लीजिए – जब भी लोन/ईएमआई का विचार आए, या दूसरे लोगों को देख कर मन में हल्का सा तुलना [Comparison] आए, बस इसे याद करना– ये आपके सुकून को और मज़बूत करेगी.!!
जो ईमानदारी से कमाता है, वह मस्त रहता है और कोई कर्ज नही होता,
_ क्योंकि जितने में उसका गुजारा हो.. उतना वो ईमानदारी से कमा लेता है.!!

सुविचार – कमाई – Income – Earning – 056

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ठीक है कि हम सभी कमाने के लिए बैठे हैं, क्योंकि हर किसी के पास एक पेट है ;

लेकिन वैध तरीके से कमाएं, ईमानदारी से कमाएं,

_ क्योंकि एक छोटा सा लालच भी हमें बहुत बड़े दुख में धकेल सकता है.

या तो अपनी कमाई के मुताबिक जीना सीखो..

_ या फिर इतना कमाओ कि अपनी हर ख्वाहिश पूरी कर सको.!!

कितना सोचते हैं हम ज़िन्दगी में कुछ अलग करने को,

_ पर ‘कमाते कितना हो’ ने सब बिगाड़ रखा है.!!

आख़िर किस लिये ये “भागा- दौडी”,

आख़िर किस लिये ये “आपा- धापी” , , ?

किस लिये ये बेईमानी , ये चोरी , ,

आख़िर किस लिये ये सीना -जोरी ?

आख़िर क्यूं गरीबों को सताना ? ?

आख़िर क्यूं मजदूरों का हक़ मारना ? ?

आख़िर क्यूं “हराम” के ख़ाने की आदत डालना ?

आख़िर क्यूं दूसरे को “नीचा” दिखाना ?

आख़िर क्यूं बैंकों को “काली” कमाई से भरना ? ?

पीढ़ीयों का तो छोड,

भरोसा नहीं तेरा “कल” का ! !

जब वो “अन्तिम घड़ी” फनफनाती हुई आयेगी,

ये काली कमाई धरी कि धरी रह जायेगी ! !

ये रिश्ते ये नाते कुछ काम ना आयेंगे.,

सिर्फ़ तेरे अच्छे और बुरे “कर्म” ही आड़े आयेंगे ! !

फ़िर “काल” अपना असली रूप दिखाएगा ,

फ़िर तू ख़ून के आँसू रो- रो के पछताएगा ! !

” पंछी” फिर एक पल में आज़ाद हो जायेगा ,

तेरे अपने ही, तेरे “पिंजरे” को आग लगा देंगे ,

पल दो पल आँसू बहाकर, अगले ही दिन तुझे भुला देंगे ! !

जब तेरा ये “मण” भर का शरीर,

एक मुट्ठी राख में बदल जायेगा , ,

तब तेरा मन का सारा वहम पल में ” फुर्र” हो जायेगा ! !

इसलिए दोस्तों आप सभी से अनुरोध है कि शुभ कमाई करिए,

सिर्फ दरवाज़ो पर शुभ- लाभ लिखने से कुछ नहीं होगा !

शुद्ध विचार रखिए, अपने लिये भी और दूसरों के लिये भी ! !

सबकी भलाई के लिये सोचो, ख़ुश रहिये, तनावमुक्त रहिये ! !

छोटी- छोटी बातों में नाराज़ मत होइये ! ! आख़िर क्या साथ जाना है !

लाखों भले ही न कमाओ.. पर इतना ज़रूर कमाओ कि अपने खर्चे खुद उठा पाओ.!!

_ खुद की कमाई से कम खर्च हो.. ऐसी जिंदगी बनाओ.

कमाई की कोई निश्चित परिभाषा नहीं होती..

_ अनुभव, रिश्ते, मान-सम्मान, अच्छे मित्र ..ये सब भी हमारी कमाई के ही रूप हैं.

कमाना ही पड़ेगा.. क्योंकि अब रिश्ते भी तभी टिकते हैं जब जेब में कुछ हो.!!
दो चीज कमाई अब तक की उम्र में …!

_ एक मीठा सा धोखा, और दूजा ! झूठी सी आशा ..!!

कितना सोचते हैं हम ज़िन्दगी में कुछ अलग करने को,

_ ‘पर कमाते कितना हो’ ने सब बिगाड़ रखा हैं.!!

कमाने में इतना मत खो जाना कि जीना ही भूल जाओ.!!
“जब कमाई कम हो और साथ ज़िम्मेदारियाँ भी चल रही हों”

_ किराया देना है, बिजली का बिल है.
_ घर के रोजमर्रा के खर्चे हैं और सबकी ज़रूरतें हैं.
_ इलाज, गाड़ी, समाज सब कुछ चलता रहता है.
_ कमाई कम खर्च ज्यादा है, पर जीवन रुका नहीं है, यही सबसे बड़ी मार है.
“घर का चूल्हा दर्शन से नहीं जलता”
_ जब ऐसे ही चलता रहे, तो केवल हौसला काफी नहीं होता.
_ घर बस इतना पूछता है “आज खर्च कैसे चलेगा ?”
_ यहीं से भीतर का तनाव शुरू होता है.
_ घरवाले सवाल करने लगते हैं.
_ जो कभी भरोसा करते थे, अब सलाह देने लगते हैं और सलाह में ताना छुपा होता है.
_ पेट और सम्मान दोनों साथ चोट खाते हैं.
“भीतर की सच्चाई और बाहर की मजबूरी”
_ यह व्यक्ति भीतर से साफ है, गलत करने की हिम्मत नहीं है.. पर खाली जेब भी साहस तोड़ देती है.
_ यहीं मन सवाल पूछता है – “क्या सही होना ही गलत है ?”
“क्या ईमानदारी की यही कीमत है ?”
— प्रेरणा कुछ समय के लिए सहारा देती है, लेकिन घर के खर्च, ज़िम्मेदारियाँ और जीवन का बोझ नहीं उठाती.
_ जब जेब में पैसा नहीं होता, तो सिद्धांत भारी लगने लगते हैं.
_ पैसा सिर्फ सुविधा नहीं देता, वह रिश्तों को भी स्थिर रखता है और घर में शांति भी खरीदता है.
_ “समझदारी बिना टूटे जीने की कला है”
_ आज के समय में ईमानदारी के साथ समझदारी भी चाहिए.
– उदाहरण के तौर पर : खर्च कम करना भी साहस है,
_ स्तर बदलना भी रणनीति है,
_ छोटे काम स्वीकार करना भी समझ है,
_ समय पर रुक जाना भी हार नहीं..
_ हर बड़ा सपना, हर समय पूरा हो.. यह ज़रूरी नहीं.
_ कभी–कभी पीछे हटना- परिवार को बचाने के लिए होता है.
_ जीवन हर व्यक्ति से अलग सौदा करता है.
“किसी को सब कुछ देकर भी अकेला छोड़ देता है.
किसी से बहुत कुछ लेकर भी उसे भीतर से बचा लेता है.”
_ जीवन में कुछ नुकसान- सिर्फ पैसे का नहीं होता,
_ कुछ नुकसान हमें यह सिखाने आते हैं कि -हम कौन–सा नुकसान सह सकते हैं और कौन–सा नहीं..
_ घर चलाना ज़रूरी है..
_ ज़िम्मेदारियाँ असली हैं..
_ दबाव वास्तविक है..
_ और इन्हीं के बीच मनुष्य को तय करना होता है कि वह किस कीमत तक जाएगा
और किस कीमत पर रुक जाएगा.
_ यही निर्णय उसे अंदर से बनाता है या तोड़ देता है.!!
– Rahul Kumar Jha
किसके लिए कमा रहे हो, कोई बेटा पिता को ड्रम में भरे दे रहा, कोई बंद कमरे में सड़ा गला जा रहा, किसी के बच्चे अंतिम संस्कार भी विदेश से ऑनलाइन करवा देते हैं ?

_ किस पीढ़ी के लिए, किन बच्चों के लिए, किस परिवार के लिए खुद को मशीन बना कर दिन रात अपनी जिंदगी धुआं करे जा रहे हो ?
_ किसने ये कह कर संसार में भेजा था कि गधे की तरह दिन रात काम करना, घर परिवार बीबी बच्चों के लिए खुद को गला देना और बुढ़ापे में सबके ताने सुनना या बच्चों को बाहर भेज कर खुद लावारिश हो जाना ?
_ किसने कहा था कि बहुत पैसा कमा कर बच्चों के लिए छोड़ जाना है, 4 पीढ़ियों के लिए भी जोड़ जाना है, किसने कहा था कि सबके लिए जीना है पर खुद के आनंद मस्ती सुकून के लिए बिल्कुल ध्यान न देना ?
_ जितनी जल्दी ये बात समझ में आ जाए उतना अच्छा है.
_ हम इस दुनिया में रहने नहीं आए बल्कि यहां से बस गुज़र रहे हैं, और एक दिन गुज़र जाएंगे.
_ आप ने किसके लिए कितना कुछ किया, कितना दूसरों के लिए संघर्ष किया, दर्द झेला तनाव लिया, एक समय बाद इन सब बातों का कोई मतलब नहीं रह जाता है.
_ मतलब रह जाता है तो बस ये कि आप इस दुनिया में मौज में रह पाए या नहीं ?
_ आप अपने तरीके, अपने ढंग से जिंदगी जी पाए या नहीं ?
_ या बस इस धरती पर आकर बिना आनंद के ही वापस लौट गए ?
– Sunita

सुविचार – धोख़ा – धोखा – छल – 055

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कुदरत जब किसी के साथ किये गए धोखे की सजा देती है तो, _

_ याद रखना, बोलने लायक तो दूर, इंसान को रोने के काबिल भी नहीं छोड़ती.

जो इंसान खुद बोलकर अपने ही कहे हुए शब्दों से मुकरता है, _ उस इंसान पर कभी विश्वास ना करना ;

_ वो इंसान वक्त पर आपको धोखा देगा..

लोगों के मंसूबे और उनकी चाल उनके शब्द में ही छिपे होते हैँ,

_ अपने जीवन में ईमानदारी और सात्विकता को सर्वोच्च स्थान दें, तो आप उन लोगों को आसानी से पहचान लेंगे.. जो आपकी पीठ पीछे आपको छल-कपट-धोखा देते हैं.!!

अगर कोई आपको धोख़ा दे रहा है तो देने दो, धोख़ा दे चुका है तो शांत रहो ;

_ क्योंकि अगर आप को समय और खुद पर भरोसा है तो..
_ अफ़सोस कीजिए उस के लिए ..जिसने आपको धोख़ा दिया है,
_ क्योंकि वो मूर्ख ये नहीं जानता कि.. उसने एक अच्छे इंसान को खो दिया है.!!
अगर आप किसी को धोखा देने में कामयाब हो जाओ तो वो व्यक्ति को मूर्ख मत समझो…

… महसूस करो कि उस व्यक्ति ने आप पर आपकी योग्यता से कहीं अधिक भरोसा किया.

धोखा कोई कितना भी दे दे अपनो को _ एक दिन दुख ही पायेगा, _

_ चैन किसी का छीन कर _ कोई कितना जश्न मनाएगा.

धोखा खाने वाला उतना नहीं खोता,_जितना धोखा देने वाला खोता है.!!
जीवन में कोई मनुष्य किसी से इतना धोखा नहीं खाता, जितना कि अपने आप से.
दिल दुखता है जब एहसास होता है कि जमाने में सब चीज़ों में मिलावट है..

_ सिर्फ़ धोखा ही बिना मिलावट का मिलता है.!!

धोखा देने से धोखा खाना बेहतर होता है.

_ धोखा खाने में कुछ आर्थिक नुकसान ही होता है, धोखा देने से आत्मा का पतन होता है.

जो धोखा दे गया उसकी यादों में मरने से हज़ार गुना अच्छा है, _

_ जो साथ है उसके साथ सुकून से जी लिया जाये.

धोखा उन्हीं को मिलता है, जो अपनी कमजोरियों को _

_ हर किसी के सामने तुरन्त उजागर कर देते हैं !!!

धोखा देने की परंपरा सदियों से चली आ रही है… और ऐसे ही चलती रहेगी,

_बस तरीके और नजरिए बदलते रहते हैं.

धोखा देने वाले को शायद कोई अफ़सोस न हो,

_ लेकिन कुदरत उसके लिए अफ़सोस लिख देती है.!!

जो औरों को धोखा देता है..

_ उसकी अपनी कहानी ही ख़त्म हो जाती है.!!

जिसने ये पाठ पढ़ लिया हो कि धोखा खा लूंगा,

_धोखा दूंगा नहीं उसे किसी परिस्थिति से घबराने की ज़रूरत नहीं.

अगर आप वफ़ादारी की क़ीमत ही नहीं जानते हो तो..

_ आपको धोखे से होने वाले नुक़सान का अंदाज़ा कभी नहीं हो सकता.!!

अगर किसी को तकलीफ़-धोखा देने की नीयत है, तो दीजिए कोई बात नहीं.

_ किसी से कोई वादा करके उसे तोड़ दिया ?और आपको फर्क भी नहीं पड़ रहा ? ठीक है, जो कर रहे हैं करते रहिए.
_ लेकिन एक बात याद रखिए ये सब कुछ आपकी ज़िंदगी में कई गुना होकर वापस आएगा.!!
झूठ, धोखा और बहाने आप को कुछ पल की ख़ुशी तो दे सकते हैं..
_ लेकिन इसकी क़ीमत आप को भविष्य में चुकानी पड़ेगी.!!!
धोखा खाने से मत डरो, क्योंकि इंसान की असली पहचान मीठी बातों से नहीं ;
_ बल्कि बुरे वक्त में उसके व्यवहार से होती है.!!
धोखे से कभी सच्चा सुख नहीं मिलता..

_क्योंकि वक्त आने पर तकदीर की चोट सबसे ज्यादा अंदर तक लगती है.!!
किसी अपने से मिला धोखा सिर्फ दिल नहीं तोड़ता, बल्कि भरोसे की जड़ें भी उखाड़ देता है और ऐसी जड़ें दोबारा नहीं जमतीं.
धोखा किसी एक ने दिया था.. पर अब तो हर मुस्कान में चाल नज़र आती है..!
सबसे बड़ा धोखा वही देते हैं, जिन पर आप सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं.
_ इसलिए “ना” कहना सीखें और अपनी सीमाओं को तय करें.!!
कुछ लोग इतने गरीब होते हैं की…_ देने के लिए कुछ नहीं होता तो धोखा दे देते हैं…
छल और धोखा आज नहीं तो कल रंग लाएगा और आपको बर्बाद कर जायेगा.!!
आदमी में अपने आप को धोखा देने कि शक्ति, दूसरों को धोखा देने से अधिक होती है.
धोखे से और धोखे में जीने से अच्छा है, अकेले जिओ ; सकून से जिओ.
धोखा कभी मरता नहीं _ आज आप दोगे _ कल आपको भी मिलेगा…!!
ज़िंदगी में कुछ चीज़ें बर्दाश्त नहीं होतीं, और धोखा उनमें से सबसे बड़ी चीज़ है.!!
अच्छे लोगों को धोखा देने वाले, _अपने साथ बहुत बुरा करते हैं..!!
धोखे का दाग नहीं मिटता, भूल का दाग मिट जाता है..!!
धोखा देना वाला हमेशा खुद को ही छलता है.
धोखा बहुत भारी होता है, ये भरोसे को उठा देता है !!
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