ऐ दिल! तू बैठ उन्हीं के संग,
जो तुझे जानते और समझते हैं।
बैठो सिर्फ़ एक ही वृक्ष के नीचे
जो फूलों से लदा हो।
जड़ी-बूटी और नुस्ख़ों के बाज़ार में
मन! घूमो बेवजह।
ढूँढो उस दुकान को जहाँ मीठा नुस्ख़ा है।
गर तुम्हारे पास कसौटी नहीं,
लोग तुम्हें लूट लेंगे।
तुम झूठे सिक्के ले लोगे असली समझते हुए!
मत भरो अपना पात्र भोजन से
हर खौलते बरतन से, जिसे भी देखो!
हर चुटकुला मज़ाहिया नहीं होता,
तो मत खोजो वह अर्थ, जो कहीं है ही नहीं।
नहीं देख सकती हर आँख,
नहीं हर समन्दर में मोती।
मेरा दिल गाता है गीत विरह के
कोयल की तरह!
तुम्हारी आवाज़ का जादू बिखरता है
हर पत्थर, हर काँटे पर।
पहले काट दो अपना सर!
फिर एक-एक कर
जाने दो सभी भटकावों को।
आलिंगन करो प्रकाश का और दिखाने दो राह उसे,
वासनाओं की हवाओं से परे!
वहाँ तुम्हें मिलेगा एक ताल,
पूरित करना उसके मीठे जल से,
बनना फिर वह वृक्ष, जो लदा है सदा फलों से।
– आनन्दमूर्ति गुरुमाँ