मस्त विचार 3837
चाहता हूँ, हर गम को उतार दूँ पन्नो पर..
_ पर कहीं न कहीं उंगली उठ जाती है अपनों पर..
_ पर कहीं न कहीं उंगली उठ जाती है अपनों पर..
_ हमारी ही खताओं ने ज़रूर, इन्हें बुलाया होगा.
_ रोशनी की तरफ करके_देख लेते असली है या नकली..
_ मै वो दरख़्त हूं जिसकी रोज एक शाख़ टूट रही है…