मस्त विचार 2583
सुना है काफी पढ़- लिख गए हो तुम,
कभी वो लफ्ज भी तो पढ़ो जो हम कह नहीं पाते.
कभी वो लफ्ज भी तो पढ़ो जो हम कह नहीं पाते.
कौन जाने सांसों की मोहल्लतें कहाँ तक हैं।।
दूर से देखने पर हम ज़रा मग़रूर दिखते हैं.
एक दिन “हँसा” कर महीनों “रुलाती” है !
जहां से चले थे फिर वहीँ आ गए हम..
कोई मेरा रास्ता रोकने की कोशिश कर सकता है…
लेकिन मेरी मंजिल और काबिलियत नहीं….