मस्त विचार 2577
मैं गुजरे हुए कल को, तलाशता रहा दिनभर.
और शाम होते-होते, मेरा आज भी चला गया.
और शाम होते-होते, मेरा आज भी चला गया.
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यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नही….!!
मेरी मुट्ठी से हर इक जुगनू निकल जाता है क्यूँ.
मैं मजबूर अपनी आदत से वो मशहूर अपनी रहमत से.
लेकिन चोट खा कर किसी को माफ़ करना बड़ा मुश्किल है.
“अनचाहा” सुनंने की ताकत होनी चाहिए.