मस्त विचार 1994
ऐ खुदा…एक तेरा ही दर है, जहां कभी ताना नहीं मिला.
ऐ खुदा…एक तेरा ही दर है, जहां कभी ताना नहीं मिला.
मुफलिसी का दुःख दर्द जो, हमसे ही तू निभाती क्यों है.
माना हो रहा बदन में दर्द , फिर सोने दे जगाती क्यों है.
मिला है खुदा ए रहमो करम, ना मारना तो सुलाती क्यों है.
जोकर सा अभिनय करा के, हंसाकर फिर रुलाती क्यों है.
जाएगा मुफलिसी का समय, तू आज कहंकहाती क्यों है.
होगा खत्म तेल दीपक का, बुझा मुझे जगमगाती क्यों है.
जख्म देना है फितरत तेरी, देख दर्द तू मुस्कुराती क्यों है.
है ललक कुमार में जीने का, मुझे मरना सिखाती क्यों है.
हमने तो आसमां को बस अपनी दास्ताँ सुनाई थी…
मैं खुद लौट जाऊंगा मुझे नाकाम तो होने दो…
मुझे बदनाम करने का बहाना ढूंढ़ता है जमाना….!
मैं खुद हो जाऊंगा बदनाम पहले मेरा नाम तो होने दो.
किसी की बुराई करने जैसा आसान कोई काम नहीं.
“स्वयं” को पहचानने से अधिक कोई “ज्ञान” नहीं.
और “क्षमा” करने से बड़ा कोई “दान” नहीं.
लोग कहते है कि आदमी को अमीर होना चाहिए..
और हम कहते है कि आदमी का जमीर होना चाहिए..॥
दुसरो की उम्मीदों में उम्र गुजर जायेगी….