मस्त विचार 1945

युहीं पूछ लेता हूँ खुद से, मैं मुसाफिर हूँ या गुमशुदा,

अपने ही घर से निकलता हूँ, अपने ही घर की तलाश में………

मस्त विचार 1944

मेरे पास कहने के लिये बहोत कुछ है, पर सुननेवाला कोई नही है..

_ और इन दोनों में से किसी एक को न चुन पाने की कशमकश में रह जाता हूँ..!!

मस्त विचार 1942

“बचपन में” जब धागों के बीच माचिस की डिब्बी को फँसाकर फोन-फोन खेलते थे,

तो मालूम नहीं था एक दिन इस फोन में ज़िंदगी सिमटती चली जायेगी।।।

मस्त विचार 1941

तर्क से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता.

मूर्ख लोग तर्क करते हैं, जबकि बुद्धिमान विचार करते हैं.

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