मस्त विचार 1877

ख़तरे के निशान से ऊपर बह रहा है, उम्र का पानी.

वक़्त की बरसात है कि….थमने का नाम नहीं ले रही…

मस्त विचार 1876

डूबी हैं मेरी ही उँगलियाँ मेरे ही खून में,

ये काँच के टुकड़ों पर भरोसे की सजा है.

है बहुत अजीब मगर यह सच बात है,

मैं साथ हूँ उसके जो खुद मेरे खिलाफ हैं.

होता कोई दुश्मन तो साथ उसका छोड़ देते,

पर जख्म देने वाला भी कोई मेरा खास है.

मस्त विचार 1875

मेरी हस्ती ही नहीं थी तेरे बगैर,

तेरा सर पे हाथ रखना याद आता है,

मंजिल ही नहीं दिखती थी सफर में,

तेरा सही पथ दिखलाना याद आता है.

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