मस्त विचार 1859

उलझनें हैं बहुत..*मग़र सुलझा लिया करता हूँ..*

और, फोटो खिंचवाते वक़्त..*मैं अक्सर मुस्कुरा लिया करता हूँ..

क्यूँ नुमाइश करुँ..*अपने माथे पर शिकन की..*

मैं, अक्सर मुस्कुरा के..*इन्हें मिटा दिया करता हूँ..*

क्योंकि..*जब लड़ना है खुद को खुद ही से..

तो, हार-जीत में..*कोई फ़र्क नहीं रखता हूँ..*

हारुँ या जीतूं..* कोई रंज नहीं..*

कभी खुद को जिता देता हूँ..* तो, कभी खुद से जीत जाता हूँ..*

ज़िंदगी तुम बहुत खूबसूरत हो..*

इसलिए मैंने तुम्हें..* सोचना बंद और..* जीना शुरु कर दिया है..*

मस्त विचार 1858

जानते हो तो फिर मुझसे पूछते क्यों हो,

दुखा के दिल मेरा इतना सोचते क्यों हो,

दिल मेरा जानकार दुखाने वाले सुन,

जो बात सुन नहीं सकते वो सुनाते क्यों हो.

मस्त विचार 1857

उम्मीदों से बंधा एक जिद्दी परिंदा है इंसान,

जो घायल भी उम्मीदों से है और जिन्दा भी उम्मीदों पे है.

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