मस्त विचार 1944

मेरे पास कहने के लिये बहोत कुछ है, पर सुननेवाला कोई नही है..

_ और इन दोनों में से किसी एक को न चुन पाने की कशमकश में रह जाता हूँ..!!

मस्त विचार 1942

“बचपन में” जब धागों के बीच माचिस की डिब्बी को फँसाकर फोन-फोन खेलते थे,

तो मालूम नहीं था एक दिन इस फोन में ज़िंदगी सिमटती चली जायेगी।।।

मस्त विचार 1941

तर्क से किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता.

मूर्ख लोग तर्क करते हैं, जबकि बुद्धिमान विचार करते हैं.

मस्त विचार 1940

नीयत साफ जरूरी है,

खुद्दारी भी जरूरी है,

दुनियादारी ठीक से चलती रहे,

वो चालाकी तो मगर, मजबूरी है।

हासिल कम है या लालच ज्यादा,

साधन सीमित है या उम्मीदें ज्यादा,

संभलकर चलने के लिये, मगर,

ये समझना भी जरूरी है।

कहाँ से चले थे, कहाँ आ गये,

दिल के सुकून के लिये,

पीछे मुड़ कर देखना भी जरूरी है।

कदम से कदम मिलाकर चलो,

मंजिल मिल ही जायेगी,

जितनी है जरूरी, हसरतें पूरी हो जायेंगी

संभल कर बोलना जरूरी है,

ज्यादा आवेश में ये जुबाँ फिसल जायेगी।

आगे बढ़ना तो जरूरी है, मगर

ऊंचाई और साये का तालमेल भी जरूरी है।

परछाई है वजूद का आईना, मगर,

इसके लिए पैर धरा पर जरूरी है।

।। पीके ।।

मस्त विचार 1939

संसार में दो तरीके के लोग हैं, जो असफल होते हैं.

एक, जो किसी की नहीं सुनते. दूसरे जो हर किसी की सुनते हैं.

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