मस्त विचार 1925

“कभी-कभी ‘खुद’ के लिए भी जीने की इच्छा होती है…,

…पर ‘ज़िम्मेदारी’ इतना भी वक़्त नहीं देती…!!!”

मस्त विचार 1924

क्या बेचकर हम तुझे खरीदें, “ऐ….ज़िन्दगी”

सब कुछ तो “गिरवी” पड़ा है, ज़िम्मेदारी के बाज़ार में.

मस्त विचार 1921

कभी उधम का मैदान

आज सूना पड़ा है

बच्चों का कमरा

आज अधूरा पड़ा है

 

कितना अस्तव्यस्त

बिखरे कपड़ों से पस्त

हमेशा टोकते टोकते थके थे

आज व्यवस्थित सन्नाटे यहां थे

 

स्कूल बैग पटका इधर

एक जूता जाने किधर

किताब कहीं, गिटार कहीं

किसी चीज की परवा नहीं

कितना चिल्लाता था तब तो

सामान जगह पर रखने को

कमरे में बूढ़ा बाप झांक आता है

जहां शोर था, वहां खामोशी से डर जाता है

 

लड़कियां ही नहीं, लड़के भी

अब घर छोड़ जाते हैं

शरारतों की यादें

मीठी सी बातें घर में छोड़ जाते हैं.

 

डॉ.राजीव जैन

error: Content is protected