मस्त विचार 1978
किराये पे चढ़ा रक्खा है कब से,
मैं अपने आप में रहता नहीं हूँ.
मैं अपने आप में रहता नहीं हूँ.
मैंने वक़्त की जेब से सावन चुरा लिया…
में ख्वाहिशों का बहोत कत्ल-ए- आम करता हूँ..!!
हम तो तेरे यार हैं,
न हार की फिकर करते हैं और न जीत का जिक्र करते हैं.
मंजिल भी मिलेगी और जीने का मजा भी आएगा.
जिनके पास खोने को कुछ नहीं बचता.