मस्त विचार 1876
डूबी हैं मेरी ही उँगलियाँ मेरे ही खून में,
ये काँच के टुकड़ों पर भरोसे की सजा है.
है बहुत अजीब मगर यह सच बात है,
मैं साथ हूँ उसके जो खुद मेरे खिलाफ हैं.
होता कोई दुश्मन तो साथ उसका छोड़ देते,
पर जख्म देने वाला भी कोई मेरा खास है.
ये काँच के टुकड़ों पर भरोसे की सजा है.
मैं साथ हूँ उसके जो खुद मेरे खिलाफ हैं.
पर जख्म देने वाला भी कोई मेरा खास है.
तेरा सर पे हाथ रखना याद आता है,
मंजिल ही नहीं दिखती थी सफर में,
तेरा सही पथ दिखलाना याद आता है.
कि वो तुम्हारे बगैर ही जीना सीख जाए.
गम देने वाला अपना ही हरदम होता है.
ये खुद से मिलने का बड़ा हसीन मौका है…!!
और बिना धोखे के ख़तम नहीं होते….