मस्त विचार 1889
भरे बाज़ार से अक्सर मैं खाली हाथ आता हूँ…
कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते….
कभी ख्वाहिश नहीं होती कभी पैसे नहीं होते….
कुछ अच्छा ही लिख दिया कर, बुरे के लिए तो अपने ही बहुत हैं..!!
देख उस मोड़ को,,,वहां से तू बदलने वाला है.
खुद के अंदर झांकने में क्युं अटकता हूं,
बाँध के झूले भ्रम के क्युं लटकता हूं,
क्या वजह है जो मैं खुद को यू खटकता हूं..