मस्त विचार 1644
आँसुओ से खुद को सींचता हूँ मैं
तुम खड़े हो साथ, बस इस आस में जी रहा हूँ मैं
दबे पाँव बे गैरत, जिंदगी झुका रही
आहिस्ता आहिस्ता, मोहवश जी रहा
राह उसकी तक रहा मैं..
आँसुओ से खुद को सींचता हूँ मैं
तुम खड़े हो साथ, बस इस आस में जी रहा हूँ मैं
दबे पाँव बे गैरत, जिंदगी झुका रही
आहिस्ता आहिस्ता, मोहवश जी रहा
राह उसकी तक रहा मैं..
रोना तो हो गया मगर मिलना नहीं हुआ.
ना घटने का डर, ना लुटने का डर, ना जरूरत वारीस की, ना तालों की.
नींद आती है सकुन की हर रोज ..यही है सच्ची दौलत बिन दौलत वालों की.
समझा-बुझा के मुझे उठा देती हैं.
और किसी के घर माँ की_दवाई उधार आई..~
आजकल हवा के लिए रोशनदान कौन रखता है..
अपने घर की कलह से फुरसत मिले तो सुने…
आजकल पराई दीवार पर कान कौन रखता है..
जहां जब, जिसका, जी चाहा थूक दिया.. .
आज कल हाथ में पीकदान कौन रखता है…
खुद ही पंख लगाकर उड़ा देते हैं चिड़ियों को..
आज कल परिंदों मे जान कौन रखता है..
हर चीज मुहैया है मेरे शहर में किश्तों पर..
आज कल हसरतों पर लगाम कौन रखता है..
बहलाकर छोड़ आते है वृद्धाश्रम में मां बाप को…
आज कल घर में पुराना सामान कौन रखता है…
सबको दिखता है दूसरों में इक बेईमान इंसान…
खुद के भीतर मगर अब ईमान कौन रखता है…
फिजूल बातों पे सभी करते हैं वाह-वाह कमेंट्स..
अच्छी बातों के लिये अब जुबान कौन रखता है…