मस्त विचार 1163
फूट फूट कर फिर रोने को मन करता है,
मन पागल है, कुछ भी खोने से डरता है,
जो खोया है फिर पाने को मन करता है.
फूट फूट कर फिर रोने को मन करता है,
मन पागल है, कुछ भी खोने से डरता है,
जो खोया है फिर पाने को मन करता है.
तुम कभी अपने ख़यालात बदल कर देखो.
ऊँची – नीची डगर हमारी, पथरीली चट्टानें.
बिछे हुए हैं पग-पग पर काँटें, देख लगे मुस्काने.
सहता दुःख की चोट निरन्तर,पर आगे बढ़ते जाना.
हँसता रहता, कभी अधर पर अपने आह न लाता.
जिसे न कोई सुनने वाला, मैं हूँ वह अफसाना.
मत पूछो तुम परिचय मेरा, मैं राही दीवाना.
मगर जीवन को अपने तरीके से जीना
अपने हाथ में होता है…
मस्त रहो….., मुस्कुराते रहो…
जो तुम्हारी हंसी के पीछे का दर्द,
गुस्से के पीछे का प्यार,
और मौन के पीछे की वजह समझ सके.
बुने थे जो तूने कभी.
मत देख आसमां को, बंद कमरे की खिड़की से.
चल, बाहर निकल और देख खुले आसमां को,
तोड़ दे सीमाओं की जंजीरों को,
चल निकल, कर ले कुछ स्वप्न तो पूरे.
न लड़ इच्छाओं से, बस लड़ ले बाधाओं से.
आगे बढ़, बढ़ता चल, बढ़ता चल.
_ जो अपनी जंजीरों की इज़्ज़त करते हैं.