मस्त विचार 387
जिस राह पर..हर बार मुझे अपना कोई छलता रहा,
फिर भी न जाने क्यों मैं उस राह ही चलता रहा !
सोचा बहुत इस बार रोशनी नहीं ..धुआं दूंगा,
लेकिन चिराग था…..फितरत से जलता रहा……जलता ही रहा….
फिर भी न जाने क्यों मैं उस राह ही चलता रहा !
सोचा बहुत इस बार रोशनी नहीं ..धुआं दूंगा,
लेकिन चिराग था…..फितरत से जलता रहा……जलता ही रहा….
और भविष्य को सुखद स्थिति में अनुभव करने लग जाएँ ,
उस स्थिति का नाम सफलता है .
दोस्ती और इबादत में बस नियत साफ़ रखना.
ऐसा ना हो के खुद से भी बिछड़ जाऊं और तू भी ना मिले….
पता ही नहीं ज़िन्दगी साँसों से चल रही है या तेरी यादों से.
जिधर भी देखूँ,,,,,,”तू-ही-तू” बिखरी पड़ी है..