मस्त विचार 129
उसी का शहर, वही खुदा और वहीं के गवाह.
मुझे यकीन था, कुसूर मेरा ही निकलेगा.
मुझे यकीन था, कुसूर मेरा ही निकलेगा.
यही पागलपन मेरे मन की वीणा पर, संगीत बन कर नाचेगा.
जिन्दगी जिन्दगी- सी लगती है.
तू ने तो अपनी पारसमणि से छूकर पारस ही बना दिया.
ये महकने की सज़ा हो जैसे……..
क्यूंकि मैं एहसास लिखता हूँ लोग अलफ़ाज़ पड़ते है………