मस्त विचार 071
तुम चाहो तो शूल को भी फूल बना दो.
तुम चाहो तो प्रतिकूल को अनुकूल बना दो.
चाहने की देर है और बस कुछ भी नहीं.
तुम चाहो तो आसमान को धूल बना दो.
तुम चाहो तो प्रतिकूल को अनुकूल बना दो.
चाहने की देर है और बस कुछ भी नहीं.
तुम चाहो तो आसमान को धूल बना दो.
पता नहीं मन क्यों मुस्कुराता है.
तसल्ली होती है मेरे मन को
कि चलो, कोई तो है अपना
जो हर वक़्त याद आता है.
वो गिराएंगी बार बार, तू उठकर फिर से चलता चल..
जो चट्टानों से ही न उलझे वो झरना किस काम का.
_ अकल का बोझ उठा नहीं सकता !!
तू चाहे तो फिर बहार आये.
फिर से तू मुझको खिला दे.
फिर से तू जीवन मस्त बना दे.