मस्त विचार 005
पास अपने क्यूँ नहीं बुलाते हो.
हर वक़्त तुम बहोत याद आते हो.
सही हुआ कि गलत पता नहीं,
पर मन में तुम्ही को बैठा बैठे.
तुम क्यूँ नहीं नजरें मिलाते हो.
पास अपने क्यूँ नहीं बुलाते हो.
हर वक़्त तुम बहोत याद आते हो.
सही हुआ कि गलत पता नहीं,
पर मन में तुम्ही को बैठा बैठे.
तुम क्यूँ नहीं नजरें मिलाते हो.
पल में ही तूने कैसी प्रीत जगा दी.
मधुर- मधुर मुस्करा कर तुमने
मन में कैसी लगन लगा दी.
नशा चढ़ा है क्या उतरेगा ?
एक अर्से बाद
अपनों से मुलाकात हुई
वे वैसे नहीं लगे
जैसे मेरी याद में हैं
अब तो अपनों से मिलना भी
अपने आप को दुःखी करना है
यह सब जानते हुए भी
एक मुलाकात अपनों से कर ली.
रिश्ते वो भी नहीं, जिस में रोज साथ हो.
रिश्ते तो वो हैं जिस में, कितनी भी दूरियाँ हों,
लेकिन मन में हमेशा उन की याद हो.
_ सच कहूँ तो सिर्फ़ कहा ही करते थे…