मस्त विचार 118
…….. अब प्रेम किसको कहते हैं मालूम नहीं……………
…….. अब प्रेम किसको कहते हैं मालूम नहीं……………
क्या करूँ लाचार था, दुनिया की निर्दयता का दास था.
तूने आज़ाद किया.
और चाँद से खुशबू निचोड़ने का हुनर भी सीखना चाहता हूँ.
आँखों से अच्छा कुछ दिखा दे.
जिधर भी देखूं तू ही दिखे, मस्ती कुछ ऎसी तू ला दे.
कुछ खोया कुछ पाया हमने.
कहीं धूप मिली कहीं छांव मिली.
हर मौसम को हंसकर कर बिताया हमने.
सफ़र ये आसान न होगा.
जानकार भी कदम बढ़ाया हमने.
खुशी और गम जो भी मिले.
दोनों को गले लगाया हमने.
कुछ खोया, कुछ पाया हमने.
किसी के काम आने के लिए
पर वक्त बीत रहा है
कागज के टुकड़े कमाने के लिए
क्या करूँगा इतना पैसा कमा कर
ना कफन मे जेब है ना कब्र मे अलमारी
और ये मौत के फ़रिश्ते तो रिश्वत
भी नही लेते…
क्यूंकि जानने वाले ही जानते हैं, जीना क्या है.
मै कितना रोऊंगा बता न सकूंगा .
ग़म इसका नहीं कि आप मिल न सकोगे .
दर्द इस बात का होगा कि मै आपको भुला न सकूंगा .
पर ऊँचा उठने के लिए झुको जरूर.