मस्त विचार 4854
आपको महत्व देता हो, आपका ख्याल रखता हो, लगता है ना ?
Rahul Kumar Jha
_ पहले मुझे लगता था कि जो दिखाई देता है, वही सच है.
_ जो व्यक्ति बार-बार एक ही रास्ते पर जाता है, वह उसी मंज़िल का मुसाफ़िर होगा.
_ जो लोगों की नज़रों में गलत है, वह सचमुच गलत ही होगा.
_ फिर जीवन ने मुझे सिखाया कि आँखें दृश्य देखती हैं, लेकिन सत्य नहीं._ सत्य अक्सर वहाँ रहता है, जहाँ हमारी नज़र पहुँचती ही नहीं.
_ तब से मैंने किसी भी इंसान पर अंतिम निर्णय देने से पहले अपने भीतर एक प्रश्न जगाना शुरू कर दिया…”क्या पता मैं गलत हूँ ?”
_ क्या पता जिस व्यक्ति को मैं पापी समझ रहा हूँ, वह किसी और के पापों का बोझ अपने सिर पर लेकर चल रहा हो.
_ क्या पता जिसे मैं स्वार्थी समझ रहा हूँ, उसने अपना सबसे सुंदर हिस्सा किसी अनजान इंसान की ज़िंदगी सँवारने में खर्च कर दिया हो.
_ क्या पता जिसे मैं गिरा हुआ मान रहा हूँ, वह किसी और को गिरने से बचाने के लिए स्वयं गिरा हुआ दिखाई देना स्वीकार कर चुका हो.
_ जीवन ने मुझे यह भी समझाया कि सबसे गहरे त्याग कभी मंचों पर नहीं होते.
_ उन पर तालियाँ नहीं बजतीं, उनके लिए समाचार नहीं लिखे जाते, उनके सम्मान में स्मारक नहीं बनते.
_ वे त्याग चुपचाप होते हैं…
_ इतने चुपचाप कि दुनिया उन्हें गलत समझ बैठती है.
_ हम अक्सर किसी इंसान की पूरी कहानी उसके जीवन के एक दृश्य से लिख देते हैं.
_ हम उसके संघर्ष नहीं देखते, केवल उसका परिणाम देखते हैं._ हम उसके घाव नहीं देखते, केवल उसका व्यवहार देखते हैं.
_ हम उसकी नीयत नहीं पढ़ते, केवल उसके कदमों का रास्ता देखते हैं.
_ और यहीं हम सबसे बड़ी भूल कर बैठते हैं.
_ क्योंकि संसार में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपनी प्रतिष्ठा बचाने के बजाय किसी और की इज़्ज़त बचा लेते हैं.
_ वे सफ़ाई दे सकते हैं, लेकिन नहीं देते.
_ वे सच बता सकते हैं, लेकिन चुप रहते हैं.
_ वे सम्मान पा सकते हैं, लेकिन किसी और का भविष्य उनसे अधिक मूल्यवान होता है.
_ ऐसे लोग दुनिया की नज़रों में हार जाते हैं, लेकिन ईश्वर की दृष्टि में वही सबसे ऊँचे खड़े होते हैं.
_ अब मैं समझ चुका हूँ कि किसी इंसान की महानता इस बात से नहीं मापी जा सकती कि लोग उसके बारे में क्या कहते हैं.
_ महानता तो वहाँ जन्म लेती है, जहाँ कोई व्यक्ति सही काम करता रहता है, भले ही पूरी दुनिया उसे गलत समझती रहे.
_ इसलिए अब मैं किसी पर उँगली उठाने से पहले अपने भीतर झाँकता हूँ.
_ क्योंकि मैंने सीखा है कि निर्णय देना आसान है, समझना कठिन.
_ आरोप लगाना सरल है, करुणा रखना दुर्लभ.
_ और शायद मनुष्य की सबसे बड़ी परिपक्वता यही है कि वह हर चेहरे के पीछे छिपी उस अनकही कहानी की संभावना को कभी मरने न दे.
_ हो सकता है जिसे मैं आज दोष दे रहा हूँ, वही कल मेरी इंसानियत का सबसे बड़ा पाठ निकले.
_ इसलिए अब मैं लोगों को उनके बारे में सुनी हुई बातों से नहीं, बल्कि अपनी करुणा की आँखों से देखने की कोशिश करता हूँ.
_ क्योंकि जीवन ने मुझे एक ऐसा सत्य सिखाया है जो शायद हर युग में अमर रहेगा…
_ हर दिखाई देने वाला सत्य, पूरा सत्य नहीं होता.
_ और कई बार…
_ सबसे पवित्र आत्माएँ वही होती हैं, जिन्हें दुनिया सबसे पहले अपवित्र घोषित कर देती है.
Rahul Kumar Jha


_ अब कुछ समझ नहीं आता, जहाँ भी जाऊँ, चैन नहीं आता.
_ जिस मंज़िल की चाह थी दिल में, वहीं पहुँच कर सुकून नहीं आता.
_ पल बीत रहे हैं सैकंडों की तरह, हर रोज़ एक सा लगता है अब हर पहर.
_ कौन अपना है, कौन पराया, इस सवाल का जवाब कभी नहीं आया.
_ रिश्ते पुराने हो गए हैं अब, जैसे किसी पुराने बर्तन पर जंग लग गई हो सब.
_ अब उन रिश्तों को संभालना मुश्किल है, लड़ने की हिम्मत भी कम हो गई है.
_ कभी बच्चों को हँसते-खिलखिलाते देखा, अब वही बच्चे हमें चुप-चुप सा देख रहे हैं.
_ हमने उन्हें बड़ा किया प्यार से, अब वो हमें बूढ़ा बना रहे हैं वक़्त के भार से.
_ कौन सही है, कौन गलत – ये अब हालात तय करते हैं,
_ सच भी कभी-कभी झूठ लगने लगता है, जब अपनी सोच से परे कुछ होता है.
_ “बस अब मन थक गया है सोचते-सोचते, थोड़ी राहत चाहिए, थोड़ी ख़ुशी… थोड़ी शांति”
सुविचार 4979
Krishna Chaudhary
_ बहुत दूर, इतनी दूर कि यहाँ का कोई निशान भी साथ न जाएगा.
_ कोई न जानेगा, और किसी को जानना भी नहीं चाहिए कि कहाँ गए !
_ हम उसी अजनबीपन में खो जायेंगे, और लोग सिर्फ़ सोचते रह जाएँगे कि हम थे भी, या बस एक भ्रम.
_ मैं वहाँ जाना पसंद करूँगा.. जहाँ मुझे कोई नाम से न पुकारे, जहाँ मेरा चेहरा किसी के लिए पहचाना न हो.
_ जहाँ मेरी हर हरकत किसी के लिए मायने न रखे.
_ मैं ऐसे लोक में जाऊँगा, जहाँ खरीदे हुए फूल किसी कोने में मुरझा कर शहर की उदासी में दफ़्न न हों.
_ जहाँ आकाश ही न हो, और प्रेम नाम की चीज़ सिर्फ़ डर का दूसरा नाम हो.
_ मैं उस जगह रहूँगा.. जहाँ मेरा दिल कोई पहेली न बने, जो जीते-जी बुझ जाए और बुझकर भी जीता रहे.
_ वहाँ मैं जीवित रहूँगा, पर अपने दिमाग़ की उलझनों में नहीं.
_ वहाँ मैं नाचूँगा.. जैसे मुझे आता ही न हो, लेकिन पूरे विश्वास के साथ.
_ वहाँ कोई आँखें क्षितिज पर मेरा इंतज़ार न करेंगी, और न ही अनंत का वादा करेंगी, क्योंकि मुझे मालूम है.. वे वादे झूठे हैं.
_ वहाँ कोई पतझड़ की हवा फिर घावों के ऊपर से गुज़रेगी नहीं, घाव जिन्हें मैंने बरसों से यूँ ही अनदेखा छोड़ रखा है.
_ मैं जो चाहूँगा, वही करूँगा.
_ अकेलापन ही मेरा साथी होगा, और वही काफी होगा.
_ यादें मैं बनाऊँगा, पर उन्हें सिर्फ़ मेरी आत्मा सँजोएगी.
_ अजनबियों से मिलूँगा और उन्हें अपने सबसे गहरे डर, सबसे छिपे हुए राज़ बिना झिझक कह दूँगा.
_ हर जगह से विदा लेते हुए, अपने हिस्से का एक टुकड़ा वहीं छोड़ता जाऊँगा.
_ धीरे-धीरे मैं अपने चेहरे को पहचानना सीखूँगा, अपनी हँसी की आवाज़ को पहचानूँगा.
_ तन्हाई चादर होगी और शांति घर.
_ मैं खुद को उन तमाम अपराधों से माफ़ करना सीखूँगा, जो मैंने खुद किए और फिर, मैं इस दुनिया और अपने अतीत से मुक्त हो जाऊँगा.
_ दिन उतने बुरे नहीं लगेंगे, जितने अब लगते हैं. _ मैं खो जाऊँगा, क्योंकि खोना ही मुझे खुद तक पहुँचाएगा.
_ और शायद उसी वक़्त मैं फूलों-सा महकूँगा, उन फूलों-सा, जो शोक में सड़कर भी जीवन को नया अर्थ देते हैं.
_ मैं टूटे दिलों से नया आशियाना बनाऊँगा और कहानियाँ बेचकर अपनी सच्चाई को पहचानूँगा.!!
_ उन्हें बस एक ऐसा घर चाहिए, जहाँ सुबह की शुरुआत हँसी से हो.
_ जहाँ मुस्कुराहटें हों, फूलों खुशबू हो, न कि टूटे रिश्तों की चुभन और बिखरे बर्तनों की आवाज़.
_ उन्हें बस इतना चाहिए कि वे अपने काम पर खुशी से जाएँ.
_ जहाँ उन्हें सिर्फ़ काम निकालने का साधन न समझा जाए, बल्कि एक इंसान की तरह देखा जाए.
_ जहाँ उनकी बात इसलिए सुनी जाए कि उन्हें समझा जा सके, न कि उन्हें ग़लत साबित करने के लिए.
_ उन्हें ऐसी हवा भी चाहिए जिसमें टारगेट, डेडलाइन और चिंता की घुटन न हो, बल्कि बारिश के बाद भीगी मिट्टी की खुशबू हो, और बालकनी में खड़े होकर चाय पीते हुए गहरी साँस लेने की आज़ादी हो.
_ उन्हें इतना समय चाहिए कि किसी पार्क की बेंच पर बैठकर अपनी पसंदीदा किताब के कुछ पन्ने पढ़ सकें.
_ ऐसा कोना चाहिए जहाँ वे खुलकर गा सकें, नाच सकें, चित्र बना सकें, अपनी लिखी हुई बातें ज़ोर से पढ़ सकें, बिना इस डर के कि कोई उनका मज़ाक ना उड़ाए.
_ वे अपने माँ-बाप के अकेलेपन, दुख और टूटन को विरासत में नहीं पाना चाहते.
_ क्योंकि अकेलापन भी कई बार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चला जाता है.
_ फिर इंसान लोगों के बीच रहकर भी अकेला रह जाता है.
_ रातों को जागता है, ख़ाली बिस्तर पर करवटें बदलता है और सोचता रहता है- “आख़िर मेरे साथ ही क्यों ?”
_ कभी फ़ोन की स्क्रीन पर अनजान लोगों में अपनापन ढूँढ़ता है, सिर्फ़ इसलिए कि कुछ पल के लिए अकेलापन कम हो जाए.
_ कोई भी ऐसी ज़िंदगी नहीं चाहता.
_ लोग बस ऐसी दुनिया चाहते हैं जहाँ बच्चों के चेहरों पर मिट्टी खेलते-खेलते लगे.
_ वे चाहते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजते समय डर के साथ विदा न करें.
_ ख़ासकर बेटियों के लिए हर पल मन में उठने वाले डर और बुरे ख़यालों के साथ न जिएँ._ हर इंसान चाहता है कि उसकी ज़िंदगी का एक छोटा-सा हिस्सा सिर्फ़ उसका अपना हो.
_ कुछ सपने, कुछ पल, कुछ यादें- जिन्हें कोई उससे छीन न सके._ वे बस कभी-कभी रात भर आसमान के तारों को देखते रहना चाहते हैं.
_ बिना किसी जल्दी के.
_ बिना किसी चिंता के.
_ वे चाहते हैं कि नींद उन्हें लेटते ही आजाये, न कि अपने ही मन के शोर के बीच जागते रहें.!!
_ इसलिए नहीं कि मुझे अपने फैसलों पर भरोसा नहीं होता, बल्कि इसलिए कि हर फैसले के साथ एक दूसरी ज़िंदगी हमेशा के लिए छूट जाती है.
_ जब ज़िंदगी मेरे सामने दो रास्ते रखती है, दाएँ जाओ या बाएँ तो मेरा मन बस इतना चाहता है कि जाने से पहले दोनों रास्तों पर थोड़ा-सा आगे तक देख सकूँ.
– बस एक झलक.
_ इतना पता चल जाए कि अगर दाएँ गया तो क्या खोऊँगा, क्या पाऊँगा… और अगर बाएँ गया तो मेरी कहानी किस तरह बदल जाएगी.
– मैं भविष्य जानना नहीं चाहता.
_ मैं बस उन ज़िंदगियों को देखना चाहता हूँ, जो मेरे एक छोटे-से फैसले की वजह से कभी जी ही नहीं गईं.
_ कभी सोचता हूँ अगर उस दिन मैंने हाँ कह दी होती तो ?
_ क्या आज मेरी ज़िंदगी सच में अलग होती ?
_ अगर उस दिन मैंने चुप रहने के बजाय अपने लिए आवाज़ उठाई होती तो ?
_ क्या कुछ बदल जाता ?
_ अगर वो नौकरी चुन ली होती, वो शहर चुन लिया होता, वो इंसान चुन लिया होता, वो रिश्ता बचा लिया होता, या फिर उसे उसी दिन छोड़ दिया होता… तो आज मैं कौन होता ?
_ क्या मैं ज़्यादा खुश होता ?
_ या बस अलग तरह से परेशान ?
_ कभी-कभी मन करता है कि ज़िंदगी के किसी कोने में एक छोटा-सा दरवाज़ा हो.
_ ऐसा दरवाज़ा जिसे खोलकर मैं अपनी दूसरी ज़िंदगियों में झाँक सकूँ.
_ एक कमरे में वो मैं हो जिसने “हाँ” कहा था.
_ दूसरे कमरे में वो, जिसने “नहीं”,
_ कहीं वो मैं हो जो किसी और शहर में रहता है.
_ कहीं वो जो किसी और के साथ बूढ़ा हो रहा है.
_ कहीं वो जिसने वो जोखिम उठा लिया था जिससे मैं डर गया था.
_ और शायद किसी कमरे में वो भी हो जिसने मेरी तरह ही कोई फैसला लिया था, लेकिन आज भी सोचता है, काश, मैंने दूसरा रास्ता चुना होता.
_ शायद यही सबसे अजीब बात है इंसान होने की.
_ हम जिस ज़िंदगी को जी रहे होते हैं, उसके साथ-साथ उन सारी ज़िंदगियों को भी अपने भीतर कहीं चुपचाप ढोते रहते हैं, जिन्हें हम जी सकते थे.
– लेकिन फिर एक बात समझ आती है.
_ शायद हर रास्ते का अंत हमें पहले से दिख जाए, तो चुनाव का मतलब ही खत्म हो जाए.
_ क्योंकि ज़िंदगी शायद सही रास्ता चुनने का नाम नहीं है.
_ ज़िंदगी उस रास्ते को अपना बनाने का नाम है जिसे हमने चुन लिया.
_ लेकिन शायद उन्होंने जो बात हमें नहीं बताई, वो ये है कि इंसान उम्र भर कभी-कभी पीछे मुड़कर उन दोनों रास्तों को देखता रहता है.
_ सोचता है अगर मैं उस तरफ चला होता तो ?
_ और शायद इस सवाल का कोई जवाब कभी नहीं मिलेगा, शायद मिलना भी नहीं चाहिए.
_ क्योंकि अगर हमें हर “क्या होता अगर” का जवाब मिल जाए, तो हम अपनी आज की ज़िंदगी को कभी पूरी तरह जी ही नहीं पाएँगे.
– फिर भी…
_ काश, ज़िंदगी मुझे सिर्फ पाँच मिनट देती.
_ बस पाँच मिनट.
_ मैं अपने उन सारे रूपों से मिलना चाहता, जो मैं हो सकता था.
_ मैं उनसे पूछना चाहता कि क्या वे मुझसे ज़्यादा खुश हैं.
_ क्या उन्हें भी कभी मेरी ज़िंदगी की याद आती है ?
_ क्या उन्हें भी कभी लगता है, कि काश, मैंने वो दूसरा रास्ता चुना होता… और फिर शायद मैं वापस लौट आता.
_ अपने इसी जीवन में.
_ उसी इंसान के पास.
_ उसी अधूरी कहानी के बीच.
– और इस बार शायद मुझे अपने फैसलों से शिकायत न होती.
_ क्योंकि मैंने देख लिया होता कि दूसरी ज़िंदगी भी आखिर एक ज़िंदगी ही थी, उसमें भी कुछ खुशियाँ थीं, कुछ पछतावे थे, कुछ लोग मिले थे, कुछ लोग छूटे थे… और कुछ सवाल वहाँ भी अनुत्तरित थे.
_ तब शायद मैं समझ पाता कि हमें दूसरी ज़िंदगी की ज़रूरत नहीं होती.
_ हमें बस अपनी इस ज़िंदगी को देखकर ये यक़ीन करने की ज़रूरत होती है कि जो नहीं हुआ, वो ज़रूरी नहीं कि बेहतर होता.
_ और जो हो गया है…शायद उसे बेहतर बनाने की ज़िम्मेदारी अब हमारी है.
_ इसलिए आज भी जब ज़िंदगी मेरे सामने दो रास्ते रखती है, मेरा मन उस पुराने दरवाज़े को ढूँढता है.
_ लेकिन अब मैं शायद बिना खोले ही आगे बढ़ जाऊँगा.
_ क्योंकि हर रास्ते के आगे क्या है, ये जान लेना ज़िंदगी नहीं है.
_ अनजान रास्ते पर अपने कदमों से एक नयी कहानी लिख देना, शायद यही ज़िंदगी है.
_ आप भी अपने से पूछो आप sentimental fool क्यों हो ?
‘अपना महत्व समझो’
_ मेरी हमेशा यही कोशिश होती है कि किसी से भी कोई संजीदा बात शुरू करने से पहले मैं सिर्फ़ एक चीज़ टटोलता हूँ-बौद्धिक ह्युमिलिटी.
_ क्या सामने वाले में इतनी ईमानदारी है कि वो मान सके कि उससे भी चूक हो सकती है ?
– अगर हाँ,
_ तो उस बातचीत में घंटों बहाए जा सकते हैं, क्योंकि वहाँ दो इंसान बातचीत कर रहे होते हैं.
_ लेकिन अगर सामने एक बंद दिमाग और अकड़ का पुतला खड़ा है, तो मैं आगे बढ़ जाता हूँ.
_ क्योंकि जिस दीवार पर कोई खिड़की ही न हो, उस पर बार-बार सिर पटक कर सिर्फ़ अपना माथा फोड़ा जा सकता है, रोशनी अंदर नहीं लाई जा सकती.
_ खामोशी ही ऐसे मौकों पर सबसे धारदार जवाब बन जाती है.!!
_ मैं साफ़-स्वच्छ व्यवहार करता हूँ, किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता.
_ मेरा यह विश्वास है कि दूसरे का बुरा करने वालों का अपना ही बुरा होता है और यह भी, कि बुद्धिहीनता से आप कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते.
_ वस्तुतः दूसरा कोई हमारा नुकसान इतना नहीं करता जितना नुकसान हम खुद अपना करते हैं.
– जब कोई तकलीफ़ में हो, उनकी आँखों से आँसू निकलते हैं और मैं चाहकर भी उस तकलीफ़ को कम नहीं कर पाता, सिर्फ़ दिलासा देने के अलावा मेरे पास कुछ नहीं होता.
_ तब शायद उनकी तकलीफ़ से कहीं ज़्यादा दर्द मुझे होता है,
_ क्योंकि उन्हें रोते हुए देखना मेरे लिए सबसे मुश्किल है, और उनके दर्द के सामने अपनी बेबसी से ज़्यादा तकलीफ़ किसी चीज़ में नहीं होती.!!
Collection of Thought 1153
लोगों को मूर्ख बनाना आसान है, लेकिन उन्हें यह समझाना कठिन है कि उन्हें मूर्ख बनाया गया है.
मस्त विचार 4853
सुविचार 4978
सुविचार 4977
मस्त विचार 4852
मोम जैसा दिल लेकर फिरोगे तो, लोग जलाते ही रहेंगे..





