मस्त विचार 4788
#अभी_हार_साबित_कहाँ_हुई_मैं_अभी_बाकी_हूँ,
#बस_ तू _साथ_दे_मेरा_मैं_अकेला_ही_काफी_हूँ..
#बस_ तू _साथ_दे_मेरा_मैं_अकेला_ही_काफी_हूँ..
उसकी गलतियाँ पकड़ते हैं.
गलतियां आपकी कोशिशों का सबूत हैं.
कर्म की शाख को भी हिलाना पड़ता है..
सोच रहा हूँ _ जब मिले थे तो _ कौन सा हुनर था मुझमें..
_ तो कोई बांसुरी बना कर बांस में सुर को भरता है.