सुविचार 3405
_ इसलिए जो भी है उसे स्वीकार कर के बेहतर बनाएँ..
_ इसलिए जो भी है उसे स्वीकार कर के बेहतर बनाएँ..
हमें इन बातों को ऐसे सहन करना चाहिए जैसे किसी उल्टे घड़े पर पानी उँड़ेला जा रहा हो,
वह घड़ा अपने भीतर पानी को बिलकुल नहीं लेता.
_ और तब तक बात ख़त्म हो चुकी होगी !!
_ वरना इस अनजानी दौड़ में वक़्त बहुत आगे निकल जाएगा ..
_ खुदा से ज़िन्दगी खरीदने की औकात तो आज भी नहीं है..
जो पसंद आए उसे अपने अंदाज़ से और जो ना पसंद आए उसे नज़र अंदाज़ से.
हाँ वह ईमानदारी पत्थर की चट्टान की तरह दृढ और अभेद्य होनी चाहिए,
अकेले आपके ईमानदार होने से, घर पास- पड़ौस में, व्यवसाय में और सभी छेत्रों में जहाँ आप प्रवेश करते हैं,
वहीँ, कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य होता है.
_ जिसे भी मौका मिलता है वो पीता जरुर है.