मस्त विचार 3175
फूल की उम्मीद थी मगर पत्थर निकला,
ये साल तो पिछले साल से भी बत्तर निकला !
दिन घटा घटा कर वर्ष कर रहे हैं,
हम वक्त को ऐसे खर्च कर रहे हैं..
ये साल तो पिछले साल से भी बत्तर निकला !
हम वक्त को ऐसे खर्च कर रहे हैं..
कुछ अपने अंजान हो गए _ कुछ अंजान अपने हो गए..
आज है _ लेकिन हर छण _ अतीत हो रहे हैं हम..
कम्फर्ट जोन से महान चीजें कभी नहीं आईं.
आज उसी ने सिखा दिया हद में रहना…
बस इंसान उन्हें छुपाने के हुनर सीख जाता है.
कटु आलोचना के लिए स्वयं को सदैव प्रस्तुत रखिए ! “सांच को आंच नहीं”
अच्छे विचारों को अपने जीवन में आने दीजिए.
मैं अरसे से ख़ामोश हूँ, वो बरसों से बेख़बर है..