Collection of Thought 615
Personal sophistication never goes out of style.
व्यक्तिगत परिष्कार कभी भी शैली से बाहर नहीं जाता है.
व्यक्तिगत परिष्कार कभी भी शैली से बाहर नहीं जाता है.
*मैं तो अपने यकीन पर शर्मिन्दा हूँ*
…लकड़ियों के ढेर पे, कुछ घण्टे में राख…..
…बस इतनी-सी है “आदमी की औकात”
हम उसे भी जीना सीखा देते हैं, जिसे मरने का शौक हो.
मुश्किल-मुश्किल हिसाब सीख गए.
वरना जहाँ बैठते थे रौनक ला दिया करते थे !!