मस्त विचार 1926
मनुष्य न तो मौसम है और न ही तापमान,
फिर भी न जाने क्यों बदल जाता है…
फिर भी न जाने क्यों बदल जाता है…
…पर ‘ज़िम्मेदारी’ इतना भी वक़्त नहीं देती…!!!”
क्या है की हम आज तक लेने का ही सुख जान पाएं हैं, खाने का ही सुख महसूस कर पाये हैं; लेकिन इतना जानिये की लेने से ज्यादा देने में आनंद है.
सब कुछ तो “गिरवी” पड़ा है, ज़िम्मेदारी के बाज़ार में.
सच बताओ ” ये महकने का हुनर तुमने कहाँ से सीखा “
जिस जिस पर ये जग हँसा है, उसी उसी ने इतिहास रचा है.
किसी को अपना कैसे मानेंगे..