मस्त विचार 1927
ज्यादा कुछ नही बदलता उम्र बढने के साथ,
बचपन की जिद समझौतों मे बदल जाती है.
बचपन की जिद समझौतों मे बदल जाती है.
फिर भी न जाने क्यों बदल जाता है…
…पर ‘ज़िम्मेदारी’ इतना भी वक़्त नहीं देती…!!!”
क्या है की हम आज तक लेने का ही सुख जान पाएं हैं, खाने का ही सुख महसूस कर पाये हैं; लेकिन इतना जानिये की लेने से ज्यादा देने में आनंद है.
सब कुछ तो “गिरवी” पड़ा है, ज़िम्मेदारी के बाज़ार में.
सच बताओ ” ये महकने का हुनर तुमने कहाँ से सीखा “
जिस जिस पर ये जग हँसा है, उसी उसी ने इतिहास रचा है.