मस्त विचार 1715
ख्वाहिशें तो ख़त्म होने से रहीं.
ख्वाहिशें तो ख़त्म होने से रहीं.
मानव मुक्ति रचनात्मक रूप से कुसमायोजित के हाथों में है.
अन्न के कण को और आनंद के छण को.
गम खाली थे ठहर गये…
क्योंकि वे अपने भ्रम को टूटने नहीं देना चाहते.
वर्तमान को सुधारिए, भविष्य अपने आप सुधर जाएगा ! जो भविष्य की ज्यादा फ़िक्र करता है उसका वर्तमान बिगड़ने लगता है! अतः भूत भविष्य की ज्यादा न सोचे वर्तमान पर ध्यान केन्द्रित करे ! क्यूंकि गुजरा हुआ समय आता नहीं और जो आता है वो भी वर्तमान बनकर ही आता है !!
“पाँव” भले ही “फिसल” जाये पर “जुबान” को कभी मत फिसलने देना..
कि कुछ भी व्यर्थ ना जाए तो यह भी “अन्न दान” है.
अपनों की आँखों से छलकते आँसू नहीं पढ़ पाये तो “अनपढ़” हैं हम.