मस्त विचार 1793
“अनचाहा ” सुनने की ताकत होनी चाहिए.
“अनचाहा ” सुनने की ताकत होनी चाहिए.
“मैं” मिलने में सुख है.
वर्ना तमन्ना तुमसे मिलने की कभी पूरी न होती.
जिम्मेदारियां निभाते हुए, जवाबदारियाँ संभालते हुए, मन को सदा स्वतंत्र और अप्रभावित रखना – यह भी एक कला है, साधना है !!!
अपने अंग-अंग के लिए
मैं अपना वर्तमान, भविष्य और इतिहास लिखता हूँ
सुख, दुःख, के साथ प्रेम का अहसास लिखता हूँ
बात जो अनकही है
उसको शब्दों का देकर आकार लिखता हूँ
जो दिलो में घुट गयी सबके, उसे बेज़ार लिखता हूँ
जो नियते छुपाई गई सफ़ेद-पोशी में
उनके कपडे उतार लिखता हूँ
आ गयी जिन अनुभवो से बालो में सफेदी
उन अनुभवो की कालिख उतार लिखता हूँ
कुछ तो लोग कहेंगे, कहने दो
खुदगर्ज हूँ मैं सर झुका नहीं सकता
जीवन जीकर उनको परेशान हर बार करता हूँ.
दर्पण कभी भी प्रतिबिंबित करने की क्षमता नहीं खोता है, भले ही वह हजारों टुकड़ों में टूट जाए, इसलिए अपनी मौलिकता को कभी न बदलें.
ये हुनर मुझमें नहीं है मेरे यार,
जिंदगी को आजमाने के बाद बस इतना जाना है,
कि तूने जो कुछ भी किया मेरे भले के लिए किया है.