मस्त विचार 977

अपने घर में खुद ही आग लगा लेते हैं,

पागल हैं हम अपनी नींद उड़ा लेते हैं,

जीवन अमृत्त कब हमको अच्छा लगता है,

ज़हर हमें अच्छा लगता है खा लेते हैं.

सुविचार – कहां थे, कहां पहुँच गये – 1065

” कहां थे, कहां पहुँच गये “

*एक तौलिया से पूरा घर नहाता था।*

*दूध का नम्बर बारी-बारी आता था।*

*छोटा माँ के पास सो कर इठलाता था।*

*पिताजी से मार का डर सबको सताता था।*

*बुआ के आने से माहौल शान्त हो जाता था।*

*पूड़ी खीर से पूरा घर रविवार व् त्यौहार मनाता था।*

*बड़े भाई के कपड़े छोटे होने का इन्तजार रहता था।*

*स्कूल मे बड़े भाई की ताकत से छोटा रौब जमाता था।*

*बहन – भाई के प्यार का सबसे बड़ा नाता था।*

*धन का महत्व कभी कोई सोच भी न पाता था।*

*बड़े का बस्ता किताबें साईकिल कपड़े खिलोने पेन्सिल स्लेट स्टाईल चप्पल सब से छोटे का नाता था।*

*मामा – मामी नाना – नानी पर हक जताता था।*

*एक छोटी सी संदुक को अपनी जान से ज्यादा प्यारी तिजोरी बताता था।*

*~~ अब ~~*

तौलिया अलग हुआ, दूध अधिक हुआ,*

*माँ तरसने लगी, पिता जी डरने लगे,*

*बुआ से कट गये, खीर की जगह पिज्जा बर्गर मोमो आ गये,*

*कपड़े भी व्यक्तिगत हो गये, भाईयो से दूर हो गये,*

*बहन से प्रेम कम हो गया,*

*धन प्रमुख हो गया, अब सब नया चाहिये,*

*नाना आदि औपचारिक हो गये।*

*बटुऐ में नोट हो गये।*

*कई भाषायें तो सीखे मगर संस्कार भूल गये।*

*बहुत पाया मगर काफी कुछ खो गये।*

*रिश्तो के अर्थ बदल गये,*

*हम जीते तो लगते है*

*पर संवेदनहीन हो गये।*

*कृपया सोचें ,*

*कहां थे, कहां पहुँच गये।*

 

 

 

 

 

 

 

Collection of Thought 136

“When you can’t change the direction of the wind, just adjust your sails.

जब आप हवा की दिशा नहीं बदल सकते, तो बस अपने पाल को समायोजित करें.

सुविचार – “इंसानियत गंवा रहे हैं हम.!!” -1064

“इंसानियत गंवा रहे हैं हम.!!”

_ खूब तरक्की कर रहे हैं ना हम… खुद को झोक दिया है पैसा कमाने के लिए घर में सुख सुविधा भरने के लिए.. जब की अंदर से मन खाली है.
_ कहां से कहां पहुंच गए विकास के नाम पर.. हमे पता ही नही पीछे क्या छूट रहा है ???
_ कुछ रेत की तरह मुट्ठी से फिसल रहा है …जिसे सब हम जान रहे हैं…
_ जीवन की दौड़ इतनी तेज हो गई है कि उसको बचाने की चाहत रही नहीं है किसी में…वो है. ” हमारे अंदर की भावनाएं”
_ पहले पड़ोसी के घर में भी कुछ होता था ना उनके साथ साथ अगल-बगल रोज दुखी हो जाते थे …अब तो कोई फर्क नहीं पड़ता …
_ सीधी सी बात है.. सीधा सा कहना है लोगों का… अपने काम से मतलब रखिए ज्यादा अच्छा रहेगा भैया.. हम तो किसी के बीच में बोलते नहीं है..
_ और यह चीज अनायास …बोलते बोलते प्रथा के रूप ले रही है,
_ जबकि वास्तव में अगर हम इंसान है तो, इंसान को इंसान की जरूरत पड़ेगी ही…
_ हम समझ नहीं रहे हैं, हम क्या दे रहे हैं… अपने अगली पीढ़ी को… नकलीपन… अकेलापन… एकाकीपन..!!
_ जाने अनजाने हम उनको स्वार्थी बना रहे हैं खुद को स्वार्थी बन रहे हैं और आधुनिकता के नाम पर अपने आप को हमने मशीन बना लिया है …
_ जहां हम हर बात का हिसाब रखने लगे हैं हंसने का भी रोने का भी…
_ कब हमें हंसना है और कब हमें रोना है..
_ इतने हम प्रैक्टिकल हो गए हैं कि अपने इमोशंस को दिखाने में भी डरने लगे हैं कि लोग क्या कहेंगे और कहीं ना कहीं हमें भी दूसरों के भावनाएं नकली और कागजी लगने लगी हैं…
_ चीजों को तो हम बचा रहे हैं… इंसानियत गंवा रहे हैं.!!

मस्त विचार 975

हम रिश्तों को ओर अधिक बेहतरीन बना सकते हैं !

“अपनी सोच में छोटा सा बदलाव करके !

“कि सामने वाला गलत नही है !

“सिर्फ हमारी उम्मीद से थोड़ा अलग है.

सुविचार 1063

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ, जो बीते हुए समय को खरीद सके.

इसलिए हर पल खुश होकर जियो, व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो, सदा स्वस्थ रहो.

Quotes by मिशेल लेबोएफ

धन को बरबाद करने पर तो आप केवल निर्धन होते हैं, लेकिन समय को बरबाद करने पर आप जीवन का एक हिस्सा गंवा देते हैं. 

मस्त विचार 974

न हों पतझड़ तो बहारें किस काम कीं.

संघर्ष बिना ज़िन्दगी ये बस नाम की.

मुकाम पर पहुँचा तू अपने वजूद को.

हार जाएगा,परवाह की जो अंजाम की. 

मस्त विचार 973

चेहरे की हँसी से गम को भुला दो, कम बोलो पर सब कुछ बता दो,

खुद ना रूठो पर सब को हँसा दो,

यही राज है ज़िन्दगी का, कि जियो और जीना सीखा दो.

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