मस्त विचार 669
जब होता हूँ अकेला, लफ्जों की महफ़िल सजाता हूँ.
तेरे मेरे एहसास घोल कर एक नई गजल बनता हूँ.
तेरे मेरे एहसास घोल कर एक नई गजल बनता हूँ.
क्यूँकि वह अपना स्वभाव नहीं बदलता.
पहले रो- रोकर आपके दुःख दर्द पूछेंगे, फिर हंस हंस के जमाने वालों को बताएंगे.
बनावटी लोगों से संभल कर रहना,
क्योंकि मुसीबत चार दिन की और एहसान ज़िंदगी भर का.
मगर फिर भी अशान्ति वाले कार्य करने से बाज नहीं आता.
दुनिया में कोई भी व्यक्ति अशान्त रहना नहीं चाहता,