मस्त विचार 761
मन- मस्तिष्क में उमड़- घुमड़ कर ही शांत नहीं होते, वे हम से वैसे ही गंदे एवं निरुपयोगी काम भी करा डालते हैं. भले इस से बाद में हमें शर्मिंदगी उठानी पड़े.
मन- मस्तिष्क में उमड़- घुमड़ कर ही शांत नहीं होते, वे हम से वैसे ही गंदे एवं निरुपयोगी काम भी करा डालते हैं. भले इस से बाद में हमें शर्मिंदगी उठानी पड़े.
ग़लतफ़हमी में पैदा होने वाले सवालों का जवाब खुद ही बना लेता है.
सारे आँसू दूर हो गए, ये तेरी ही बदौलत है ऐ मेरे यार, हम काँच से कोई कोहिनूर हो गए.
_ बल्कि समय पर न उठना शर्म की बात है..
वरना आँचल और कफ़न एक ही धागे से बनते है.