जिंदगी में जिसने खुद कभी मेहनत नहीं की, जिसने अपने हिस्से का पसीना नहीं बहाया, वही लोग सबसे ज़्यादा शिकायतों का पुलिंदा लेकर घूमते हैं.
_ इनके पास न कोई काम होता है, न कोई पहचान..- बस दूसरों की तरक्की पर उंगलियाँ उठाने का हुनर होता है.
_ झूठ इनके लिए सहारा नहीं, रोज़मर्रा की आदत है..
_ सच बोलना इन्हें उतना ही भारी लगता है.. जितना आईने में अपनी शक्ल देखना.
_ हर नाकामी का ठीकरा ये हालात पर फोड़ते हैं, हर सफलता में इन्हें साज़िश दिखती है.
_ खुद ने कभी जोखिम नहीं लिया, मगर दूसरों के फैसलों पर ज्ञान बाँटेंगे.. जैसे ज़िंदगी का ठेका इन्हीं के पास हो.
_ ये लोग शिकायत को अपनी पहचान बना लेते हैं, इनके शब्दों में मेहनत नहीं, जलन टपकती है, इनके तर्कों में सच्चाई नहीं, बहाने भरे होते हैं.
_ जो आगे बढ़ा, वो इनके लिए “गलत तरीके से” बढ़ा.. जो गिरा, वो “किस्मत का मारा” और खुद ? खुद हमेशा निर्दोष !!
_ सच तो ये है कि आलस की चादर ओढ़कर बैठे लोग जब समय की दौड़ में पीछे छूटते हैं, तो झूठ और शिकायत ही उनकी लाठी बन जाती है.
_ मेरा कहना सीधा है काम करो, परिणाम बोलेंगे.. वरना शिकायतें लिखने से इतिहास नहीं बनता, सिर्फ़ खुद की बेइज़्ज़ती दर्ज होती है.!!